भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

१६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम लक्षणावत्त्वमेव तत् स्यात्, तदाऽऽत्माश्रयापातः स्यात् । स्वरूपमिति चेन्न । स्वरूपस्य प्रतिकरणं भिन्नतया एकपरित्यागेन अपरत्र लक्षणं गतमित्यतिव्यापकं स्यात्, न हि चक्षुषः स्वरूपं श्रोत्रस्येति । किञ्च—एवमिन्द्रियादेः प्रमाणत्वं न स्यात्, अतद्गतोऽप्यनुमात्रादेः प्रमातृत्वात् । नासौ प्रत्यक्षमिति चेन्न । नेदमपि हि प्रत्यक्षमात्रस्य लक्षणं भवता क्रियते । ननु यद्यपीन्द्रियादेर्विशेषतो व्यावृत्तिस्तदपि तज्जातीयकरणमात्रतया तज्जातीयमात्रस्य अव्यावृत्तिरेव । न ह्यनुमित्यादावपि अकरणजातीयवान् प्रमिमीते इति । न ; करणतया साधारणभावस्याद्याऽपि निर्णेतुमशक्यत्वात् । उक्त लक्षणविशिष्ट को ही लक्ष्य कहें, तो विशिष्टवृत्ति धर्म विशेषण में भी रहता है । अतः लक्ष्यवृत्ति लक्षण का लक्ष्य में विशेषणरूप 'स्व' में वृत्तित्व होने से आत्माश्रय हो जायगा । यदि स्वरूप को लक्ष्य कहें, तो प्रतिव्यक्ति स्वरूप व्यावृत्त होने के कारण श्रोत्र के स्वरूप को लक्ष्य मानें, तो चक्षु में अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—'जिससे युक्त ही प्रमाता प्रमिति करे' इत्यादि सावधारण लक्षण करने पर चक्षुरादि में अव्याप्ति हो जायगी। कारण चक्षु के सहकार के बिना भी लिङ्गपरामर्श आदि से अनुमिति आदि प्रमितियाँ होती हैं। अतः चक्षु से युक्त ही प्रमाता प्रमिति करता है, यह नियम नहीं रहा। समर्थन—यद्यपि चक्षुःसहकार के बिना भी अनुमिति होती है, तथापि प्रत्यक्ष तो चक्षुःसहकार के बिना नहीं होता, अतः व्यभिचार नहीं है। खंडन—यदि आप प्रत्यक्ष प्रमाण का यह लक्षण करते होते तथा लक्षण में प्रत्यक्ष-प्रमा का निवेश होता, तो ऐसा कहना उचित भी था । किन्तु आप तो प्रमाणमात्र का लक्षण करते हैं तथा प्रमितिसामान्य का लक्षण में निवेश है। अतः चक्षुरादि के बिना भी अनुमिति आदि के होने से चक्षुरादि में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जिस जातीय से युक्त ही प्रमाता प्रमिति करता हो, वह प्रमाण है' ऐसा निवेश करने पर अव्याप्ति नहीं होगी। कारण, अनुमिति में चक्षुरादि की व्यावृत्ति होने पर भी चक्षुर्जातीय परामर्श की व्यावृत्ति नहीं होगी । खंडन—परामर्श में चक्षुर्जातीयत्व करणत्व से अन्य कुछ हो नहीं सकता और उस करणत्व का निर्वचन अभीतक हुआ नहीं है। अतः जातीयत्वघटित लक्षण भी असङ्गत है ।