खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 226, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०६ दोषस्तदवस्थः । यदि तु ज्ञानजातीयमात्रव्यक्तिविशेषपरामर्शः, तदाऽव्यापकत्वम्, प्रतिज्ञानं तच्छब्दार्थस्य भेदात् । नहि यत्त्वं तत्त्वं वा किञ्चिदनुगतं रूपमस्ति । अत एवात्मविषयत्वानुयोगवत् त्रिपुटीप्रत्यक्षवादिनि घटज्ञानस्य घटादौ प्रत्यक्षतया प्रामाण्यानुयोगो द्रष्टव्यः, चक्षुःसन्निकर्षाभावात् । अन्यथा तस्येष्ट- प्रसङ्गकत्वात् । तदर्थं यदिन्द्रियसन्निकर्षोत्पन्नमिति विशेषणप्रक्षेपे यत्तच्छब्दार्थस्यासाधा- रण्यादव्याप्यापत्तेः । यदि तु यत्तच्छब्दार्थावनुगतौ स्यातां पुनरप्यन्यत्र ‘घटो- ऽयमि’ति ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वेन प्रमाणता प्रसज्येत । अथ ‘अन्यव्यतिरिक्त’ इति विशेषणं प्रक्षिपसि, तदाऽन्यविषयस्य प्रत्यक्षता विषय' ऐसा निवेश करें—‘यत्, तत्’ को ज्ञानमात्रपरक मानें, तो फिर भी घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा । कारण, यत्-ज्ञान पद से आत्मज्ञान का भी ग्रहण हो सकता है । यदि घटज्ञान व्यक्तिपरक हो, तो घटज्ञान में तो समन्वय हो जायगा; पर अन्यत्र सर्वत्र अव्याप्ति हो जायगी । कारण, निखिल ज्ञानों में वृत्ति यत्त्व-तत्त्व कोई अनुगत धर्म नहीं है, जिसे प्रवृत्तिनिमित्त मानकर ज्ञानमात्र का यत्-शब्द से ग्रहण हो सके । जो प्रभाकर आदि ज्ञान में त्रिपुटी ( ज्ञाता, ज्ञान ज्ञेय, इन तीनों ) का भान मानते हैं, उनके मत में घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष इष्ट ही है । अतः उनके मत में घटज्ञान पट में प्रत्यक्ष हो जायगा, यह दोष जानना चाहिए । समर्थन—‘जिस वस्तु और इन्द्रिय के सन्निकर्ष से उत्पन्न जो ज्ञान हो, वह ज्ञान उस वस्तु में प्रत्यक्ष है ।’ अतः घटज्ञान पट में प्रत्यक्ष नहीं है । खंडन—यदि यत्-शब्द को अनुगत तत्-तत् ज्ञानव्यक्तिपरक मानें, तो अन्य ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी । यत्त्व-तत्त्व को अनुगत मान भी लें, तब भी ‘घटोऽयम्’ यह ज्ञान पट में प्रत्यक्ष हो जायगा । समर्थन—‘जिस वस्तु तथा इन्द्रिय के सन्निकर्ष से जो ज्ञान होता है, वह ज्ञान उससे जो अन्य, उस अन्य से व्यतिरिक्त वस्तु में प्रत्यक्ष है ।’ अतः घटज्ञान पट में प्रत्यक्ष नहीं है । खंडन—अन्यविषयक प्रत्यक्ष के लक्ष्य न होने से वह प्रत्यक्ष न कहा जायगा । अथवा लक्ष्यभूत अन्यविषयक प्रत्यक्ष में भी उक्त लक्षण का समन्वय हो जाने से अतिव्याप्ति होगी । तत्-शब्द को किसी अनुगमक रूप से २७