खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 227, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंन स्यात् । तच्छब्देनानुगतार्थाभिधाने व्यवच्छेदकत्वाभावात् । घटज्ञानस्य च पटे प्रत्यक्षतया प्रामाण्यं प्रसज्येत । एतेन—इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यभिचारि प्रत्यक्षमित्यत्रापि दोषोऽय- मुक्तो द्रष्टव्यः, तादृशस्यापि ज्ञानस्य विषयान्तरे प्रत्यक्षत्वेन प्रामाण्यप्रसङ्गात् । यस्यार्थस्य सन्निकर्षात् यदुत्पद्यते ज्ञानं तत्तत्र प्रत्यक्षतया प्रमाणमित्यभिधाने तु यच्छब्दतच्छब्दसाधारणासाधारणार्थाभिधानविकल्पोक्तदोषप्रसङ्गः । अव्यभिचारिपदञ्च व्यर्थम् । न हि शुक्तौ रजतज्ञानं रजतेन्द्रियसन्निकर्षा- दुत्पन्नम् । संस्कारलक्षणा प्रत्यासत्ती रजतत्वेऽप्यस्तीति चेन्न । पूर्वानुभूतरजत- तादात्म्यस्य संस्काराभावादुक्तदोषतादवस्थ्यात् । गुरुमतानुसारेण सुतरां सन्निकर्षज ज्ञानपरक मान भी लें, तो व्यवच्छेद के न होने से घटज्ञान पट में प्रमाण हो जायगा । कारण, तत्-शब्द से पटज्ञान का भी परामर्श कर सकते हैं । 'इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्न अव्यभिचारिज्ञान प्रत्यक्ष है' इस लक्षण में भी घटज्ञान आत्मा में या पट में प्रत्यक्ष हो जायगा—यह दोष जानना चाहिए । यदि 'जिस वस्तु के सन्निकर्ष से जो ज्ञान उत्पन्न हो, वह ज्ञान उस विषय में प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण करें, तो यत्-यत् शब्द को एकज्ञानपरक मानें या ज्ञानसामान्यपरक, उभयथा पूर्वोक्त दोष होगा । यदि यत्-तद्घटित लक्षण करें, तो रजत के सन्निकर्ष से शुक्ति में रजतभ्रम न होने से रजत में प्रत्यक्ष नहीं होगा । फिर, 'अव्यभिचारी' विशेषण भी व्यर्थ हो जायगा; क्योंकि शुक्ति में रजतज्ञान रजत और इन्द्रिय के सन्निकर्ष से उत्पन्न नहीं है । अतः 'सन्निकर्षजत्व' विशेषण से ही उसकी व्यावृत्ति हो जायगी । संस्काररूप (चक्षुःसंयुक्त-आत्मसमवेत-पूर्वरजतप्रत्यय-संस्कारविषयत्व- रूप) प्रत्यासत्ति रजत में है, यह भी नहीं कह सकते । कारण, पूर्वानुभूत का ही संस्कार हुआ करता है । शुक्ति और रजततादात्म्य पूर्व में अनुभूत न होने से उसका संस्कार संभव ही नहीं है । यह तो भट्टमत में अव्यभिचारी विशेषण की व्यर्थता हुई । गुरुमत के अनुसार तो सुतरां उक्त विशेषण व्यर्थ है । कारण, वे तो भ्रमज्ञान मानते ही नहीं । किञ्च—शुक्ति में रजततया अवगाह्यमान ज्ञान का व्यवच्छेद करते हैं अथवा रजतत्वमात्र ज्ञान का ? पहले का व्यवच्छेद व्यर्थ है, पुरोवर्ती शुक्ति- निष्ठ रजतत्ववैशिष्ट्य (तादात्म्य) में संस्काररूप प्रत्यासत्ति न होने से सन्निकर्षजत्व