भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 610 में से

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पृष्ठ 228

परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २११ विशेषणवैयर्थ्याच्चैन व्यभिचारानङ्गीकारात् । रजतत्ववैशिष्ट्ये पुरोवर्तिनस्तदभावात् । तस्मिन्नेव वांशेऽप्रामाण्यम्, न तु रजतत्वमात्रे, तस्यान्यत्र सत्त्वात् । अथ साक्षात्कारित्वं प्रत्यक्षलक्षणमुच्यते तदा साक्षात्कारिभ्रमेऽपि प्रसङ्गः । अव्यभिचारित्वेन विशेषितं तल्लक्षणमिति वा भेदाग्रहव्यतिरिक्तविभ्रमाभावो वेति चेत् । न ; विकल्पानसहत्वात् । किमवगतमिदं लक्षणं फलहेतुः , अनवगतं वा ? न तावच्चरमः ; तदभिधानवैयर्थ्यप्रसङ्गात् । अभिधानस्य ज्ञानोत्पादोपयोगित्वात् तस्य चानवगतस्यैव फलसाधकत्वाभ्युपगमात् । आद्ये किमन्यस्मात्तदवगमः , उत त्वदीयाल्लक्षणवाक्यात् ? यद्यन्यस्मात् , कृतममुना लक्षणाभिधानप्रयासेन । अभिधानस्य ज्ञानोत्पादातिरिक्तप्रयोजनाभावात् विशेषण से ही उसका व्यवच्छेद हो जायगा । दूसरे का भी व्यवच्छेद संभव नहीं । उक्त ज्ञान वैशिष्ट्यांश (तादात्म्य) में ही भ्रम में रजतत्व नहीं है । कारण, रजतत्व देशान्तर में भी होने से तद्गोचर ज्ञान भी प्रमाण होने के कारण व्यवच्छेद्य ही नहीं है । समर्थन—साक्षात्कारित्व ही प्रत्यक्ष का लक्षण कहेंगे । खंडन—प्रत्यक्ष-भ्रम में अतिप्रसङ्ग होने से वह लक्षण अयुक्त है । समर्थन—भ्रम में अतिव्याप्ति के वारणार्थ लक्षण में 'अव्यभिचारित्व' का भी निवेश कर देंगे । अथवा प्रभाकर के मत में भेदाग्रह से भिन्न भ्रमज्ञान होता नहीं, अर्थात् ज्ञानमात्र प्रमा ही है । तब तो अव्यभिचारी विशेषण देने का भी कुछ काम नहीं है । खण्डन—यह लक्षण भी विकल्प को सह नहीं सकता । देखिये—क्या अवगत (ज्ञात) लक्षण व्यावृत्ति या व्यवहाररूप फल का कारण है या अनवगत (अज्ञात), अर्थात् साक्षात्कारित্বরূপ लक्षण स्वयं ज्ञात होकर इतरव्यवच्छेद-ज्ञान का कारण है अथवा अपनी सत्तामात्र से कारण है ? यदि अन्तिम पक्ष मानें, तो लक्षण का अभिधान ही व्यर्थ हो जायगा । केवल ज्ञानोत्पादकत्वेन अभिधान की सार्थकता होने पर भी प्रकृत में आपने अज्ञात लक्षण को ही इतरव्यवच्छेदक प्रतीति का जनक मान लिया है । अतः यहाँ लक्षण का अभिधान व्यर्थ ही है । यदि प्रथम मानें, अर्थात् अवगत लक्षण ही व्यावृत्ति या व्यवहार का जनक है, तो वह भी विकल्पासह ही है । अर्थात् लक्षण का अवगम प्रमाणान्तर से मानेंगे या अपने लक्षण-वाक्य से ही ? यदि प्रमाणान्तर से, तो आपका यह लक्षणाभिधान-प्रयास व्यर्थ

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