भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

५१२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम तस्य चान्यत एव सिद्धेः । अन्त्ये किं त्वदभिधानमाप्तोपदेशतया साक्षात्कारित्वं बोधयति, उत लिङ्गादिभावेन ? न तावच्चरमः ; त्वद्वचनस्य साक्षात्कारित्वाविना- भावादेर्दर्शयितुमशक्यत्वात् । नापि प्रथमः ; वादिनं प्रति भवत आप्तत्वासिद्धेः । सिद्धौ हि प्रतिज्ञामात्रादेव साध्यसिद्धेर्हेत्वाद्यभिधानमनर्थकं सर्वत्र स्यात् । अथ मन्यसे यः साक्षात्कारित्वमन्यतो जानाति, प्रत्यक्षव्यवहारनिदानतया च न जानाति, तं प्रति प्रत्यक्षव्यवहारनिदानत्वमस्य ज्ञाप्यते लक्षणवादिना । तच्चानुमानभावेनैव, नाप्तोपदेशतया । अत एव च लक्षणं केवलव्यतिरेक्यनु- मानमाचक्ष्महे । तथथा—श्रावणादिप्रमितयः साक्षात्कारिप्रमितयो वा प्रत्यक्षत्वेन व्यवहर्तव्याः, साक्षात्कारिप्रमितित्वात् ; न यत्प्रत्यक्षतया व्यवह्रियते न तत्साक्षात्कारि, यथानुमितिः ; तथा चैताः ; तस्मात्तथा । एतदनुमानप्रतिपादकश्च है । कारण, अभिधान का प्रयोजन लक्षण-ज्ञान से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है और उसे आपने साधनान्तर से मान लिया है । एवञ्च पुनरपि आपका लक्षणाभिधान व्यर्थ ही है । यदि आप अपने लक्षण-वाक्य से लक्षण का अवगम मानें, तो पूछा जा सकता है कि क्या वह लक्षण-वाक्य आप्तोपदेश के रूप में साक्षात्कारित्व-लक्षण का बोध कराता है या हेत्वादिविधया ? अन्तिम पक्ष नहीं मान सकते; आपके वचन का साक्षात्कारित्व से अविनाभाव न होने से उसे लिङ्गत्वेन बोधक नहीं कहा जा सकता । 'लिङ्गादि' यहाँ 'आदि'पद से अर्थापत्ति, उपमान आदि का भी ग्रहण है । एवञ्च कोई अनुपपत्ति या सादृश्यज्ञान न होने से आपका वचन अर्थापत्ति, उपमान आदि रूप से भी बोधक न हो सकेगा । यदि आप्तोपदेशरूप में आपका वचन लक्षण का बोध कराता है, तो वह भी ठीक नहीं । कारण, वादी आपको आप्त ही नहीं मानता । यदि वह आपको आप्त मान ले, तो प्रतिज्ञामात्र से ही साध्य-सिद्धि हो जाने से सर्वत्र हेत्वादि का अभिधान व्यर्थ ही हो जायगा । समर्थन— जो पुरुष साक्षात्कारित्व को अन्य हेतु ( प्रत्यक्ष आदि ) से जानते हैं, किन्तु उसमें प्रत्यक्षत्व-व्यवहार की कारणता नहीं जानते, उनके प्रति प्रत्यक्षत्व- व्यवहार की कारणता लक्षण से बोधित होती है । वह बोधन भी आप्तवाक्यरूप से नहीं, किन्तु परार्थ-अनुमानरूप से होता है । अतएव हम लोग लक्षण को 'व्यतिरेकी अनुमान' कहते हैं । वह अनुमान इस प्रकार है—'श्रावण आदि प्रमितियाँ या साक्षात्कारी प्रमितियाँ प्रत्यक्षत्वरूप से व्यवहर्तव्य हैं, साक्षात्कारिप्रमितित्व से युक्त होने से; जो