खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २१५ वाक्यं नाप्तवाक्यत्वेन प्रयुज्यते वादिना । किन्तु व्याप्त्यादेः प्रतिपन्नस्यैव स्मारकम्, पूर्वाप्रतिपन्नस्य वा जिज्ञासोत्पादनद्वारेणेदानीमेव वादिनि प्रमाणोत्पा- दकमित्युक्तदोषानवकाश इति । न ; 'प्रत्यक्षतया व्यवहर्त्तव्याः' इति व्यवहारस्य किं विषयभेदो विशेषः, उत शब्दभेदः ? आद्ये यद्यसौ विषयविशिष्टं व्यवहारं नाज्ञासीत् , कथं साक्षात्कारिणि तस्य स्वकर्त्तव्यतां लक्षणवाक्यादप्यवगच्छेत् । न ह्यविदिताग्नि- रनुमानादप्यग्निसम्बन्धं बोधयितुं शक्यः । अथाज्ञासीत् तदा ज्ञातज्ञापन- वैयर्थ्यालक्षणरूपमनुमानं निष्प्रयोजनम् । अथ सामान्यतो जानाति—अस्ति कश्चिद्विषयः प्रत्यक्षव्यवहारस्य । विशेषतस्तु न जानाति , तं प्रतीदमुच्यते । न; किं सामान्यतो निमित्तवत्तां व्यवहारमात्रस्य जानाति, उत व्यवहारविशेषस्य ? आद्ये प्रकृतानुपयोगः, व्यवहारविशेषस्य प्रत्यक्षत्वरूप से व्यवहर्तव्य नहीं है, वह साक्षात्कारिप्रमिति नहीं है, जैसे अनुमिति । साक्षात्कारिप्रमितिरूप पक्ष साक्षात्कारिप्रमितित्वरूप हेतु से युक्त है; तस्मात् उक्त साध्य ( प्रत्यक्षत्व से व्यवहर्तव्यता ) से युक्त है।' इस पञ्चावयव वाक्य को वादी आप्तवाक्यरूप से प्रयोग नहीं करता; किन्तु पूर्वज्ञात व्याप्ति के स्मरणार्थ या पूर्व अज्ञात व्याप्ति के ( जिज्ञासा के उत्पादन द्वारा ) उस काल में ही ज्ञान के लिए प्रयोग करता है । अतः कोई दोष नहीं है । खण्डन — 'प्रत्यक्षत्वरूप से व्यवहर्तव्य है' इस वाक्य का क्या 'प्रत्यक्षत्वप्रकारक ज्ञानविषयत्व' अर्थ है या 'प्रत्यक्ष शब्द से अभिधेय' यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में यदि यह पुरुष प्रत्यक्षत्वप्रकारक ज्ञानविषयत्व को प्रथम से नहीं जानता, तो लक्षण-वाक्य से साक्षात्कारिप्रमिति में उसे कैसे जानेगा ? कारण जो अग्नि को नहीं जानता, वह धूम से पर्वत में अग्नि को जान नहीं सकता । यदि वह पहले से ही प्रत्यक्षत्वप्रकारक ज्ञानविषयत्व को जानता है, तो ज्ञात का ज्ञापन होने से अनुमान व्यर्थ है । समर्थन — जो पुरुष सामान्यरूप से जानता है कि प्रत्यक्ष-व्यवहार का कुछ विषय है । किन्तु विशेष रूप से यह नहीं जानता कि प्रत्यक्ष-व्यवहार का अमुक विषय है, उसके प्रति यह अनुमान-प्रयोग है, ऐसा कहेंगे। खण्डन — क्या वह व्यवहार- मात्र के विषय को सामान्यरूप से जानता है या व्यवहार-विशेष ( प्रत्यक्षत्व-व्यवहार ) के सामान्य से निमित्तवत्ता को जानता है ? प्रथम पक्ष में व्यवहारमात्र की निमित्तवत्ता सामान्य से जानता भी हो, तो उसका प्रकृत में कोई उपयोग नहीं है। कारण इदानीं