भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम , द्वितीये किं कृतोऽसौ व्यवहारस्य विशेष इति विकल्पित- न्तरेण न निस्तारः । एतेन सर्वस्यैव लक्ष्यस्य स्वीकारः परासनीयः । तथा हि— नाव्यापत्त्या प्रमामात्रात्ते तेऽर्थाः स्वीक्रियोचिताः । तद्वियस्तदुरीकारे स्वाश्रयं कश्चिकित्सतु ॥ ३५ ॥ अथान्यः स विशेषश्चेत् तद्धीत्वं कश्चिदिष्यते । दत्तः साकारवादाय विष्टरः स्पष्टमेव तत् ॥ ३६ ॥ व्यवहारविशेष ( प्रत्यक्षत्व-व्यवहार ) की चिन्ता है । द्वितीय पक्ष में अर्थात् यदि कहें कि प्रत्यक्ष-व्यवहार के सामान्य से निमित्तवत्ता जानता है, तो यह विकल्प होता है कि प्रत्यक्ष-व्यवहार से जो विशेष है, वह प्रत्यक्षज्ञानकृत है या प्रत्यक्षशब्दकृत ? ऐसा विकल्प होने पर दोनों पक्षों में मूलकथित दोष हो जायगा । इस अग्रिम युक्ति से भी लक्षणमात्र खण्डित हो जाता है । देखिये—'इयं पृथिवीति व्यवहर्तव्या गन्धवत्त्वात्, व्यतिरेकेण अबाविवत्' इत्यादि लक्षण से लक्ष्य का स्वीकार संभव नहीं । कारण, लक्षण से जायमान प्रमामात्र से तत्तत् लक्ष्य का स्वीकार करेंगे या पृथिव्यादि लक्ष्यविशिष्ट प्रमा से ? पहला नहीं कह सकते, अर्थात् लक्षण से जायमान अनुमितिरूप प्रमामात्र से लक्ष्य की सिद्धि नहीं हो सकती । कारण, प्रमामात्र समस्त अर्थसाधारण है; अतः एक प्रमा से सभी अर्थों की सिद्धि हो जायगी । द्वितीय पक्ष भी संभव नहीं, अर्थात् लक्ष्यविशिष्ट प्रमा से भी लक्ष्य की सिद्धि नहीं हो सकती । कारण, लक्ष्यविशिष्ट प्रमा में लक्ष्य भी विशेषण है, अतः अंशतः लक्ष्य से लक्ष्य की सिद्धि होने से आत्माश्रय हो जायगा ॥ ३५ ॥ समर्थन— लक्ष्यविशिष्टबुद्धित्व बुद्धि का ही धर्मविशेष है, लक्ष्य का वैशिष्ट्य नहीं । अतः लक्ष्यविशिष्ट प्रमा से लक्ष्य की सिद्धि में आत्माश्रय नहीं है । खण्डन— यदि तद्विषयवैशिष्ट्य को बुद्धि का धर्म मानें, तो बुद्धि साकार हो जायगी, निराकार न रहेगी । कारण जबतक साकार घटादि से बुद्धि का अभेद न मानें, तबतक घटादि- विषयवैशिष्ट्य बुद्धि का धर्म नहीं हो सकता । एवञ्च 'अर्थेनैव विशेषो हि निराकारतया धिया' इस स्वसिद्धान्त की हानि और 'सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः' इस बौद्ध-सिद्धान्त का अभ्युपगम हो जायगा ॥ ३६ ॥