खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम एवमन्यस्मिन्नपि बहौ पदार्थे जाग्रति विप्रतिपत्तयः, तल्लक्षणानि कस्मान्नोक्तानि ? तदास्तामेकत्र विस्तराभिनिवेशः । तृतीय प्रत्यक्षलक्षण-खण्डनम् किञ्च तत्साक्षात्कारित्वम् ? सविशेषार्थप्रकाशत्वमिति चेन्न । सविशेषत्वस्योपलक्षणत्वेऽनुमानादिव्याप्तिः। विशेषणत्वे च यदि विशेषशृङ्खलाया विश्रान्तिस्तदा शेषविशेषस्य बोधे प्रत्यक्षलक्षणहीनत्वेन आमूलमप्रत्यक्षतापातः। यद्यविश्रान्तिस्तदा तादृशस्यैव व्याप्तिग्रहादनुमायामपि तादृशीसिद्धिरिति साक्षात्कारित्वापत्तिः । वस्तु का वाचक, यह विवाद है। ऐसे ही अन्य बहुत-से पदार्थों में विप्रतिपत्तियाँ हैं। फिर उन सबका निरूपण आप क्यों नहीं करते ? तस्मात् एकत्र ( प्रत्यक्ष- लक्षणमात्र में ) विस्तार का अभिनिवेश व्यर्थ ही है। तृतीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन किञ्च—जिस ‘साक्षात्कारित्व’ को आप प्रत्यक्ष का लक्षण कहते हैं, वह साक्षात्कारित्व ही क्या है ? अर्थात् विकल्पसह होने से उसका निर्वचन ही नहीं किया जा सकता। समर्थन—वर्तुलत्व, पृथुबुध्नोदरत्व आदि विशेषों से सहित जो घटादि विषय हैं, उनका ज्ञान ही साक्षात्कारी पदार्थ है। खंडन—विशेष के साहित्य को यदि उपलक्षण मानें, अर्थात् विशेष जिसमें स्वरूप से रहता हो—विशेष भी ज्ञान में भासता हो, यह नियम नहीं है—यदि ऐसा मानें, तो अनुमिति आदि में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। कारण अनुमिति के विषय वह्नि आदि में भी वस्तुरूप से विशेष विद्यमान ही है। यदि विशेष के साहित्य को विशेषण मानें, तो विशेषशृङ्खला (परम्परा) का कहीं विश्राम मानते हैं या नहीं ? कहीं विश्राम मानें, तो जिस विशेष में अन्य विशेष नहीं है, उस विशेष का ज्ञान प्रत्यक्ष न होगा। अतः उस विशेष अंश में उस विशेष से विशिष्ट का ज्ञान भी प्रत्यक्ष न कहलायेगा। इसी तरह मूलप्रत्यक्ष- पर्यन्त उस विशेष अंश में प्रत्यक्षता नहीं होगी। यदि विशेषशृङ्खला का विश्राम न मानें, तो अनवस्था दोष का प्रसङ्ग होगा। किञ्च—सभी विशेष स्वविशेष के साथ ही प्रत्यक्ष में भासेंगे। एवञ्च यावत् विशेषविशिष्ट साध्य-साधन में ही व्याप्तिग्रह होने से अनुमिति में भी यावत् विशेषों का भान हो जायगा। अतः अनुमिति में भी साक्षात्कारित्व ( प्रत्यक्षत्व ) हो जायगा।