खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 236, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २१६ अथ वाऽस्तु व्याकरणादिविषयं विहाय नामव्युत्पादनं कथमपि भवच्छास्त्रस्य विषयः ; तथापि न्यूनतरत्वमस्मिन् विषये भवदीयशास्त्रस्य — बहूनि नामानि विद्यन्ते कोषान्तरवर्तीनि, कुतो न व्युत्पादितानि तानीति । प्रथास्मिन् शास्त्रे येषां शब्दानामुपयोगस्तेषामनेन व्युत्पादनम् , न सर्वेषामित्युच्यते; तथापि यथैक- वाक्यगतस्य पदस्य लक्षणव्युत्पादनमेवं तल्लक्षणवाक्यगतपदस्यापीति अप्रर्य- वसानमापतितं शास्त्रस्य, तत्तल्लक्षणवाक्यप्रयोग एव तेषां तेषां पदानां शास्त्रे जातोपयोगत्वात् । अथ नानालक्षणप्रणेतॄणां वादिनां विप्रतिपत्तेः प्रत्यक्षादिशब्दार्थ एव व्युत्पाद्यते संशयनिरासाय, नान्येोऽसंशयत्वादिति मन्यसे; तथाप्यनुपपत्तिः । अस्ति हि वाऽऽदीनामर्थे वाच्यता-द्योत्यताविवादः । अस्ति च छिदुरादिपदाना मर्थे कर्मकर्तृत्वाकर्मकर्तृत्वे विवादः । अस्ति च भावशब्दस्य स्वरूपसत्त्वसत्तासामान्या- द्यर्थत्वे । अस्ति चाधिकरणशब्दार्थस्य पतनप्रतिबन्धकत्वसमवायित्वादौ । अथवा शब्द-साधुत्वादि व्याकरण शास्त्र के विषयों को छोड़ दें और केवल नामव्युत्पादन ही कथञ्चित् आपके शास्त्र का विषय मान लें, तो भी इस विषय में आपके शास्त्र की न्यूनता ही रही कि अन्य भी बहुत से नाम कोशों में हैं, उनका व्युत्पादन आपने क्यों नहीं किया ? यदि कहें कि 'जिन शब्दों का प्रकृत शास्त्र में उपयोग है, उन्हींका निरूपण यहाँ किया गया है, अन्य का नहीं', तो जैसे 'अव्यभिचारि- साक्षात्कारिज्ञानं प्रत्यक्षम्' इस वाक्यगत 'प्रत्यक्ष' पद का लक्षण (अर्थ-व्युत्पादन) किया जाता है, वैसे ही उस लक्षणवाक्यगत पदों के भी लक्षणान्तर करने होंगे । इस रीति से शास्त्र का कहीं पर्यवसान ही न होगा । पदान्तर-व्युत्पादन का कोई उपयोग नहीं, ऐसी भी बात नहीं; उन-उन लक्षणवाक्यों के प्रयोग में ही उन-उन पदों का उपयोग है ही । समर्थन—नाना प्रकार के लक्षण-प्रणेता वादियों की प्रत्यक्षादि-लक्षणों में विप्रतिपत्तियाँ होने से सन्देह के निराशार्थ ही प्रत्यक्षादि शब्दों के अर्थों का निरूपण करते हैं, अन्य का नहीं । कारण, अन्यत्र सन्देह ही नहीं है । खंडन—यदि सन्दिग्ध का ही निरूपण करना है, तो 'च, वा' आदि निपातों के अर्थों में भी वाच्यत्व-द्योत्यत्व का विवाद है । 'छिदुर' आदि शब्दों में कर्तृप्रत्यय है या कर्मकर्तृ-प्रत्यय यह विवाद है । इसी तरह 'भाव' शब्द स्वरूपसत् का या सत्तासामान्यविशिष्ट का वाचक है, यह विप्रतिपत्ति है तथा 'अधिकरण' शब्द द्रव्यसमवायी का वाचक है या पतनप्रतिबन्धक