भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 235

२१८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ननु प्रतिवादिनं प्रति लक्षणाभिधानं नार्थवत्, तेन वाद्याप्तभावानङ्गीकारात् । किन्तु शिष्यार्थं लक्षणमुच्यते शास्त्रे । स हि शास्त्रस्य कर्तारमाप्तमेव मन्यते । तस्मात् शिष्यं प्रत्याप्तवचनतयैव लक्षणवाक्यमर्थं प्रतिपादयिष्यति गुरुणा गीयमानम्—'यस्त्वया साक्षात्कारीशब्दार्थः प्रतीतः, स एव प्रत्यक्षशब्दार्थः' इति । मैवम्; यदि वादिनं प्रति न शास्त्रं किन्तु शिष्यं प्रति, तदा प्रतिज्ञामात्रा- देवाऽऽप्तवचनात् शिष्यस्यार्थनिश्चयोत्पत्तेः हेत्वाद्यभिधानमनर्थकमापन्नं शास्त्रे । अथ भवतु तत्प्रतिवादिनमपि प्रति शास्त्रे वाक्यं यत्र हेत्वादुपात्तम् । लक्षणवाक्यन्तु शिष्यमेव प्रति प्रयोजकं प्रतिपन्नशास्त्रकाराप्तभावमिति मन्यसे । तदप्यनुपपन्नम्; शास्त्रान्तरसाध्यत्वादस्यार्थस्य । अस्ति समयग्राहकं शास्त्रं मुनिभिः प्रणीतं नामलिङ्गानुशासन-व्याकरणादि । यदि च शास्त्रान्तरसाध्योऽप्यर्थो भवदीयशास्त्रस्य विषयः, तर्हि प्रकृतिप्रत्ययविभागेन साधनमपि शब्दानां कुतो न व्युत्पाद्यते, लिङ्गं वा शब्दानां कुतो नाभिधीयते ? तदज्ञानेऽपि पराजयो जायत एव । समर्थन—प्रतिवादी के लिए लक्षण का अभिधान नहीं है, क्योंकि वह वादी को आप्त ही नहीं मानता । किन्तु शिष्य के लिए ही शास्त्र में लक्षण कहा जाता है । वही शास्त्रकर्ता को आप्त मानता है । अतः गुरु के द्वारा कहा गया लक्षणवाक्य आप्तवचन रूप से ही इस प्रकार अर्थ-प्रतिपादन करता है कि 'तुम साक्षात्कारी शब्द का जो अर्थ जानते हो, वही प्रत्यक्ष शब्द का अर्थ है ।' खण्डन—यदि शास्त्र वादी के लिए नहीं, अपितु शिष्य के लिए है, तो प्रतिज्ञामात्र से ही आप्तवचनत्वेन शिष्य अर्थ का निश्चय कर लेगा । एवञ्च शास्त्र में हेतु आदि का अभिधान अनर्थक हो जायगा । समर्थन—जिस शास्त्रीय वाक्य में हेतु आदि का अभिधान हो, वह भले ही प्रतिवादी के लिए रहे । किन्तु लक्षणवाक्य तो उसी शिष्य के लिए है, जो शास्त्रकर्ता को आप्त जानता है । खंडन—आपके इस कथन के अनुसार तो लक्षणनिर्माण का प्रयोजन संकेतग्रह ही हुआ । वह युक्त नहीं, क्योंकि यह प्रयोजन शास्त्रान्तरसाध्य है । मुनियों द्वारा प्रणीत नामलिङ्गानुशासन (कोश), व्याकरण आदि बहुत से शास्त्र शक्तिग्राहक हैं ही । यदि अन्य शास्त्र से बोध्य अर्थ भी आपके शास्त्र के विषय हों, तो आप प्रकृति-प्रत्यय के विभाग द्वारा शब्दों का साधन क्यों नहीं करते और शब्दों के लिङ्ग भी क्यों नहीं बताते ? कारण, उनके अज्ञान से भी तो पराजय होती ही है ।