भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २१७ तत्र प्रत्यक्षशब्दप्रयोगो नास्ति यत्र साक्षात्कारित्वमस्ति तत्र सर्वत्रास्तीति यो जानीते, तं प्रति लक्षणाभिधानमिति स्यात् । स च व्यवहारान्तरवदन्वय- व्यतिरेकाभ्यामेव वाच्यवाचकभावमवधारितवानिति व्यर्थं लक्षणम् । एतेन—अनुमित्यादिव्यवच्छिन्नतया व्यवहर्त्तव्यमित्यप्युक्तानुमानसाध्यतया अभिधीयमानमपास्तं वेदितव्यम् । पूर्वप्रतिपन्नमेव वाच्यवाचकभावं लक्षणाभिधानेन स्मार्यत इति चेन्न । अवगत- समयस्य प्रत्यक्षशब्दादेव तत्स्मरणसम्भवात् व्यर्थता लक्षणाभिधानस्य स्यात् । अवगतशब्दार्थसम्बन्धः शब्दादेव स्मरन् यदि लक्षणेन स्मार्यते, तदा लक्षणा- वाक्यगत-पदकदम्बार्थस्मरणार्थमपि तल्लक्षणमभिधानीयमविशेषात् । एवं तल्लक्षणवाक्येऽपीत्यपर्यवसानं स्यात् । तो यही अर्थ हुआ कि 'जिस अर्थ में साक्षात्कारित्व नहीं, वहां प्रत्यक्ष शब्द का प्रयोग नहीं होता और जहां साक्षात्कारित्व है, वहाँ सर्वत्र प्रत्यक्ष शब्द का प्रयोग होता है' यह जो जानता है, उसीके लिए लक्षण का अभिधान है। एवञ्च वह पुरुष घट-पट आदि शब्दों के तुल्य अन्वय-व्यतिरेक से ही प्रत्यक्ष शब्द के भी वाच्यवाचकभाव का ज्ञान कर सकता है । फिर लक्षण का अभिधान व्यर्थ है । इसी प्रकार 'साक्षात्कारी प्रमितियाँ अनुमित्यादि-व्यवच्छिन्नत्वरूप से व्यवहर्तव्य हैं, साक्षात्कारित्वयुक्त होने से' इत्यादि निषेध्यव्यवहारसाधक अनुमान का भी खण्डन जानना चाहिए । कारण, अन्वय-व्यतिरेक से ही उक्त अर्थ सिद्ध हो जाने से लक्षण-कथन व्यर्थ हो जायगा । समर्थन—लक्षण के अभिधान से पुरुष को पूर्वज्ञात वाच्यवाचकभाव का स्मरण कराया जाता है । एवञ्च लक्षणाभिधान व्यर्थ नहीं है । खंडन—जिस पुरुष को समय ( संकेत ) का ज्ञान हो चुका है, वह तो 'प्रत्यक्ष' शब्द के श्रवण से ही संकेत का स्मरण कर सकता है । अतः उसके संकेतस्मरणार्थ लक्षण का अभिधान व्यर्थ ही है । यदि शब्द के श्रवण से ही संकेत का स्मर्ता पुनः लक्षणवाक्य से भी संकेत का स्मरण करता है—ऐसा मानें, तो अविशेषात् लक्षणवाक्यगत पदसमुदाय के अर्थ का स्मरण कराने के लिए भी उन-उनके लक्षणों का अभिधान करना होगा । इसी प्रकार उक्त पदार्थों के लक्षणवाक्यगत अनेक पदार्थों के भी लक्षण करने होंगे । अतः कहीं भी लक्षण के निर्माण की समाप्ति ही न होगी ।