भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्व-खण्डन ५ प्रमाणादीनि भवता प्रवर्त्तितोऽयं व्यवहार इति शतकृत्वस्त्वंया उच्यमानेऽपि नास्माकमादरः । अन्यथा अभ्युपगम्य प्रमाणादीनि भवता प्रवर्त्तितोऽयं व्यवहार इत्येतावता भवदीयो व्यवहाराभास इत्यस्माभिरपि वक्तुं शक्यत एव । ननु यदि प्रमाणादीनि न सन्ति, तदा व्यवहार एव धर्मी कथं सिद्ध्येत, दूषणादिव्यवस्था वा कथं स्यात् ? सर्वविधिनिषेधानां प्रमाणाधीनत्वात् । मैवम् ; न ब्रूमो वयं न सन्ति प्रमाणादीनीति स्वीकृत्य कथाऽऽरभ्येति । किन्नाम सन्ति न सन्ति वा प्रमाणादीनीत्यस्यां चिन्तायामुदासीनैः यथा स्वीकृत्य तानि व्यवह्रियन्ते, तथा व्यवहारिभिरेव कथा प्रवर्त्यतामिति । अन्यथा न सन्ति प्रमाणादीनीति मतमस्माकमारोप्य यदिदं भवता दूषणमुक्तम्, तदपि वक्तुं न शक्यम् । कीदृशीं मर्यादामलम्ब्य प्रवृत्तायां कथायामिदं दूषणमुक्तम् ? किं प्रमाणादीनां सत्त्वमभ्युपगम्य उभाभ्यां वादिभ्यां प्रवर्त्तितायां कथायाम्, उतासत्त्व- मभ्युपेत्य, अथैकेन सत्त्वमपरेणासत्त्वमङ्गीकृत्य ? नाद्यः, अभ्युपगतप्रमाणादिसत्त्वं प्रति एतादृशपर्यनुयोगानवकाशात् । द्वितीये स्वतोऽव्यापत्तेः । न तृतीयः, तथैव कथान्तरस्यापि प्रसक्तेः । मीमांसकों के वचनों को साधन-बाधन में असमर्थ कहते हैं । प्रमाणादि-स्वीकार साधन-बाधन-शक्ति का कारण न होने पर भी यदि आप हमारे वचन में आभा- सत्व (दोष) न दिखा सकें, तो सौ बार भी कहें कि 'प्रमाणादि न मानकर प्रवृत्त होने से आपका यह वाग्व्यवहार प्रमाणाभास (अप्रमाण) है', फिर भी आपके उस वचन में हमें कोई आदर न होगा । फिर यदि वचन में आभासत्व न दिखाकर भी साधन में अक्षमत्व का प्रतिपादन करते रहें, तो हम भी कह सकते हैं कि प्रमाणादि को मानकर प्रवृत्त होने से आपका वचन भी साधन में अक्षम है । समर्थन — यदि प्रमाणादि नहीं हैं, तो वाग्व्यवहाररूप धर्मी (अङ्गी) कैसे सिद्ध होगा और दूषण आदि की व्यवस्था भी कैसे होगी, क्योंकि सभी विधि-निषेध प्रमाण के ही अधीन हैं । खण्डन — हम यह नहीं कहते कि 'प्रमाण आदि नहीं हैं' ऐसा मानकर शास्त्रार्थ का आरम्भ करिये । किन्तु प्रमाणादि हैं या नहीं, इस चिन्ता से उदासीन होकर जैसा आप मानते हैं, वैसा ही मानकर शास्त्रार्थ का आरम्भ करना चाहिए । अन्यथा (प्रमाणादि-स्वीकार को यदि शास्त्रार्थ का अङ्ग मानें तो) 'प्रमाणादि नहीं हैं' ऐसा मेरा मत मानकर जो आप दोष देते हैं कि 'यदि प्रमाणादि नहीं हैं तो व्यवहार-