खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम उभयाभ्युपगमानुरोधित्वाच्च कथानियमस्य । अन्यथा स्वाभिप्रायमालम्ब्य तेनापि त्वद्वचसि यत्किंचिद्वागात्मनि दूषणेऽभिहिते कस्य जयो व्यवतिष्ठताम् ? प्रमाणाभ्युपगन्तुरेव यावन्नियमसंयन्त्रणा महती स्यात् । तस्मात् प्रमाणादिसत्त्वाभ्युपगमौदासीन्येन व्यवहारनियमेन समयं बद्ध्वा प्रवर्तितायां कथायां भवतेदं दूषणमुक्तमित्युचितमेव तथासति स्यात् । योऽयं भवान् स्वाभि- प्रायमपि नावधारयितुं शक्नोति, दूरतस्तस्मिन् पराभिसन्धानावधारणप्रत्याशा । रूप धर्मी कैसे सिद्ध होगा', वह भी नहीं बनेगा । अच्छा, किस मर्यादा (नियम) को मानकर प्रवृत्त शास्त्रार्थ में आप यह दोष देते हैं ? क्या प्रमाणादि के सत्त्व को मानकर वादी-प्रतिवादी दोनों से प्रवृत्त शास्त्रार्थ में, प्रमाण आदि के असत्त्व को मानकर दोनों से प्रवृत्त शास्त्रार्थों के में या एक से सत्त्व और अन्य से असत्त्व को मानकर प्रवृत्त शास्त्रार्थ में ? इनमें प्रथम विकल्प युक्त नहीं है, क्योंकि जो प्रमाणादि को मानते हैं, उनके प्रति 'प्रमाण आदि को न मानने पर व्यवहाररूप धर्मी कैसे सिद्ध होगा', यह दोष देना नहीं बनता । द्वितीय पक्ष में आप भी प्रमाण आदि के न माननेवाले सिद्ध होंगे । तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस शास्त्रार्थ के तुल्य ही अन्य शास्त्रार्थों के भी प्रमाणादि-स्वीकार के बिना ही सिद्ध होने से 'प्रमाणादि का स्वीकार शास्त्रार्थ-हेतु है' यह कथन असङ्गत हो जायगा । शास्त्रार्थ-नियम वादी-प्रतिवादी दोनों के स्वीकार पर निर्भर है । इसलिए भी केवल आपके स्वीकार से प्रमाणादि का स्वीकार शास्त्रार्थ-हेतु नहीं हो सकता । यदि शास्त्रार्थ- नियम को एक के स्वीकार का अनुरोधी मानें, तो इस नियम से प्रतिवादी स्वेच्छा से स्वीकृत 'हुँ फट्' शब्दोच्चारण रूप दोष दे, तो किसकी जय होगी ? बल्कि नियम के एकानुरोधी होने पर प्रमाणादि-स्वीकार को शास्त्रार्थ-हेतु माननेवाले को ही उससे महान् क्लेश होगा । अतः आपने प्रमाण आदि के सत्त्व-असत्त्व में उदा- सीनता से प्रवृत्त शास्त्रार्थ में 'यदि प्रमाणादि को न मानें, तो व्यवहाररूप धर्मी कैसे सिद्ध होगा' यह दोष दिया है, इस बात को हम दोनों यदि मान लें तो अच्छा ही है । जब आप अपना अभिप्राय जानने में असमर्थ हैं, तो 'प्रमाणादि- स्वीकार शास्त्रार्थ में हेतु नहीं है—यह हम कहते हैं, प्रमाणादि ही नहीं है—यह नहीं कहते' हमारे इस अभिप्राय के जानने की आपसे आशा तो अतिदूर है ।