भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 245

३२८ सानुवाद-खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम एतेन विषयान्तरज्ञानाजन्यत्वं तदिति प्रत्युक्तम् । सविकल्पकस्याधिक- व्यवच्छेदरूपविषयत्वात् तदवधिज्ञानजन्यत्वात् । स्वविषयानन्तर्गतार्थज्ञानाजन्यधीत्वं तत् । न च सप्रतियोगिकार्थप्रत्यक्षाव्याप्तिः, प्रतियोगिनोऽपि विशिष्टार्थप्रविष्टस्य तत्ताया इव प्रत्यभिज्ञायां प्रत्यक्षविषय- त्वोपगमात् ; अप्रतियोगित्वेन विशेषणाद्वेति चेत् । न ; स्वपदेनैव क्षारीकृतत्वात्, कार्यव्यक्तौ अजन्यताया दुरवधारणाच्च । समर्थन—'स्वविषय से अन्य जो विषय, उसके ज्ञान से अजन्य जो ज्ञान, वह प्रत्यक्ष है।' खण्डन—सविकल्पक ज्ञान भी स्वविषय अतद्व्यावृत्ति से अन्य जो वस्तुमात्र, तद्विषयक निर्विकल्पक ज्ञान से जन्य होता ही है। अतः सविकल्पक में अव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—अतद्व्यावृत्ति तद्भिन्न-भेदरूप है और भेदज्ञान नियमतः प्रतियोगिज्ञान से जन्य होता है। अतः अतद्व्यावृत्तिविषयक सविकल्पक ज्ञान प्रतियोगी- ज्ञान से जन्य होने के कारण उसमें अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—'स्वविषय के अनन्तर्गत जो अर्थ, तद्विषयक ज्ञान से अजन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण करेंगे। एवञ्च इस लक्षण के प्रतियोगिज्ञान से जन्य अभाव- ज्ञान में अव्याप्ति नहीं है, क्योंकि जैसे प्रत्यभिज्ञा में तत्ता भासती है, वैसे ही अभाव- ज्ञान में प्रतियोगी भी भासता है। अतः प्रतियोगी स्वविषय के अनन्तर्गत नहीं है। अथवा 'स्वविषय के अनन्तर्गत जो प्रतियोगी से भिन्न अर्थ, उससे अजन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है' ऐसा निवेश करें, तो भी कोई दोष नहीं होगा। खण्डन—स्वपद को यदि ज्ञानसामान्यपरक मानें, तो ज्ञान के विषय के अनन्तर्गत जो अर्थ, तद्विषयक ज्ञान से अजन्य होने से अनुमित्यादि में अव्याप्ति हो जायगी। अथवा ज्ञान के विषय के अनन्तर्गत जो अर्थ, तद्विषयक ज्ञान की असिद्धि होने से असम्भव हो जायगा। यदि स्वपद को ज्ञानव्यक्तिपरक कहें, तो जिस ज्ञानव्यक्ति का स्वपद से उपादान करेंगे, उससे अन्य व्यक्ति में अव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—अन्वयव्यतिरेक से कार्यकारणभाव गृहीत होता है। यदि कारणव्यक्ति के कार्य व्यक्ति में अन्वय-व्यतिरेक से कार्यकारणभाव का ग्रहण मानें, तो इन्द्रियानुमितिरूप ज्ञान का स्व से उत्तर दैववश उत्पन्न घटप्रत्यक्ष व्यक्ति में अन्वय-व्यतिरेक होने से उक्त प्रत्यक्ष में ज्ञान के अजन्यत्व का ग्रहण नहीं होगा, जिससे अव्याप्ति हो जायगी। यदि ज्ञानजातीय का प्रत्यक्षजातीय में अन्वय-व्यतिरेक न होने से प्रत्यक्ष में ज्ञान से अजन्यत्व का ग्रहण