खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 246, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] पञ्चम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २२६
तज्जातीये तज्जातीयव्यभिचारशङ्कग्रहे च कार्यैकजातये च पूर्ववत्पतनमिति । स्वकालावच्छिन्नार्थबोधत्वं साक्षात्त्वमित्यपि न । स्वार्थाविवेचनात् । कथञ्च अनुमानादिव्यवच्छेदः ? तत्र व्याप्त्यादिप्रविष्टकालनियतार्थत्वम्, यत्रापि चन्द्रोदयसमुद्रवृद्ध्यादौ स्व- कालार्थत्वं तत्रापि व्याप्तिप्रविष्टतैव तादृशत्वस्य प्रयोजिकेति चेन्न । कथमप्यस्तु, तथापि स्वकालावच्छिन्नार्थत्वस्य सम्भवात् । न च यज्जातीयमेवमेवेति विशेषः ; साजात्यस्य वैलक्षण्यस्याग्रतः सिद्धौ किमन्येन । न च तदपीति वक्ष्यते । मानें, तो लक्षण के ज्ञान से पूर्व प्रत्यक्षत्व का ग्रह अवश्य मानेंगे । अन्यथा अजन्यत्व- घटित उक्त लक्षण का ज्ञान ही न होगा । यदि प्रत्यक्षत्व का ज्ञान अन्य से सिद्ध है, तो लक्षण का प्रणयन ही व्यर्थ हो जायगा । समर्थन—'स्व ( ज्ञान ) का जो काल, उससे अवच्छिन्न अर्थ का ज्ञान प्रत्यक्ष है ।' खंडन—'स्व' शब्द से यदि ज्ञानसामान्य का ग्रहण करें, तो यत्किञ्चित् ज्ञान के काल से अवच्छिन्न अतीत, अनागत अर्थ भी हैं । अतः तद्विषयक अनुमिति आदि में अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि 'स्व' से एक प्रत्यक्ष व्यक्ति का उपादान करें, तो अन्य व्यक्ति में अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—अनुमिति भी स्वकाल से अवच्छिन्न वस्तु का ही ग्रहण करती है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—अनुमिति-विषय में बोधकाल से अवच्छिन्नत्व 'यदा धूमस्तदा वह्निः' इत्याकारक व्याप्तिग्रह के अधीन है । 'अयं पूर्णचन्द्रोदयः स्वकालिकसमुद्रवृद्ध्यादिमान् चन्द्रोदयत्वात्, पूर्वचन्द्रोदयवत्' इस स्थल में भी ( जहाँ स्वकाल साध्य में प्रविष्ट है ) अनुमिति-विषय में 'यदा चन्द्रोदयस्तदा स्वकालिकसमुद्रवृद्धिः' इत्याकारक व्याप्ति ही बोधकालावच्छिन्नत्व की प्रयोजक है । खंडन—बोधकाल से अवच्छिन्नत्व का कोई भी प्रयोजक हो, इससे क्या हुआ ? बोधकाल से अवच्छिन्नविषयक होने से अनुमिति में अतिव्याप्ति वैसी ही बनी है । समर्थन—'यज्जातीय ज्ञान, स्वकाल से अवच्छिन्न जो अर्थ तद्विषयक ही हो, वह प्रत्यक्ष है ।' अनुमितिजातीय ज्ञान स्वकाल से अनवच्छिन्न अतीत, अनागत अर्थ- विषयक भी होता है । अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—जबतक प्रत्यक्षत्वरूप साजात्य का ग्रह न हो, तबतक उक्त लक्षण का ज्ञान नहीं हो सकता । यदि प्रत्यक्षत्व का ज्ञान नहीं हो सकता और वह अन्य चिन्हों से सिद्ध है, तो लक्षण व्यर्थ है । सिवा इसके प्रत्यक्षत्व की सिद्धि भी नहीं हो सकती, यह आगे कहेंगे ।