भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

२३० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम व्याप्त्यादिकमन्तरेणेति चेन्न । तस्यैव समर्थत्वेन स्वकालकथावैयर्थ्यात् । यथा च न तदपि, तथा वक्ष्यते । यत्तु कश्चिदाह—स्वप्रकाशानिषेधात् स्वकालाविच्छिन्नार्थप्रकाशकत्वासम्भव इति । तदयुक्तम्; वस्तुतो यः स्वकालस्तस्य विवक्षितत्वात् । वर्तमानप्रकाश- स्थेति निरुक्तिपर्यवसानात् । वर्तमानार्थस्य च सर्वानिर्वचनीयत्वात् । तथा चोक्तम् —'सम्बद्धं वर्तमानञ्च गृह्यते चक्षुरादिना ।' तस्मादस्मदुक्तमेव युक्तम् । षष्ठ-प्रत्यक्षलक्षण-खण्डनम् षोढासन्निकर्षेतराप्रयुक्तविषयनियमं ज्ञानं तथेति चेन्न । दोषवशजात- साक्षाद्बोधे तदसम्भवात् । प्रमासाक्षात्कारस्तावत् तथेति चेन्न । साक्षात्त्वेन प्रमेतरयोरविशिष्टतया साक्षात्त्वस्य साधारणस्यैव निर्वक्तव्यत्वात् । समर्थन—'व्याप्ति आदि के बिना ही जो ज्ञान स्वकाल से अवच्छिन्न जो अर्थ तद्विषयक हो, वह प्रत्यक्ष है।' खण्डन—यदि व्याप्ति का निवेश करना है, तो 'व्याप्ति के बिना जात जो ज्ञान, वह प्रत्यक्ष है', इतना ही लक्षण पर्याप्त है; 'स्वकाल से अवच्छिन्न जो अर्थ तद्विषयकत्व' का निवेश व्यर्थ है । साथ ही यह भी लक्षण निर्दोष नहीं है, यह आगे कहेंगे । कोई-कोई विद्वान् इस लक्षण में यह दोष देते हैं कि ज्ञान स्वप्रकाश नहीं है, अतः स्वज्ञान के कालरूप विशेषण से विशिष्ट अर्थ का ज्ञान न होने से यह लक्षण असम्भवग्रस्त है । किन्तु यह दोष युक्त नहीं, क्योंकि स्वकाल उपलक्षण है, विशेषण नहीं । अतः स्वप्रकाश न होने पर भी अन्य से ज्ञात स्वकाल से उपलक्षित अर्थ का ज्ञान हो सकता है । फलतः असम्भव नहीं है । प्रत्यक्ष वर्तमानविषयक होता है, यह सभी वादी मानते हैं । श्रीकुमारिल भट्ट ने भी कहा है कि वर्तमान और सम्बद्ध विषय को चक्षु ग्रहण करता है । षष्ठ प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन समर्थन—'षट् प्रकार के सन्निकर्ष से जो इतर हो, उसके द्वारा अप्रयुक्त जिस ज्ञान के विषय का नियम हो, वह प्रत्यक्ष है', ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—'इदं रजतम्' इस ज्ञान में रजतत्व का जो समवाय भासता है, उसका प्रयोजक दूरत्वरूप दोष है । अतः वहाँ अव्याप्ति हो जायगी । प्रमा और अप्रमा उभयरूप सामान्य से प्रत्यक्षज्ञान का यह लक्षण है । अतः प्रमा प्रत्यक्ष ही लक्ष्य है, ऐसा आप नहीं कह सकते ।