भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] सप्तम प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २३३ अव्यवहितधीत्वं साक्षाद्धीत्वमिति चेन्न । व्यवधानविकल्पानुपपत्तेः । यदि द्रव्यविशेषान्तरावस्थितिव्य॑वधिः, तदानीमप्रत्यक्षविभुधियां साक्षात्त्वापत्तिः । अथ ज्ञापकज्ञानपूर्वसत्ता व्यवधानम्; तदा परत्वाद्यप्रत्यक्षतापत्तिरिति । विशिष्टवैशिष्ट्यं व्यवधानमिति चेन्न । धूमविशिष्टे वह्निवैशिष्ट्यमिति स्वरूप- स्थितौ तथात्वे कार्यकारणभावविरोधः । प्रतीतौ धूमवैशिष्ट्यस्य धर्मिविशेषणत्वे समर्थन—इन्द्रियों से अव्यवहित वस्तु की धी साक्षात्-धी ( प्रत्यक्ष ) है । खंडन—अव्यवहितत्व का ज्ञान व्यवधान के निरूपण के अधीन है और वह व्यवधान विकल्पसह होने से दुर्निरूप्य है । अतः यह लक्षण भी ठीक नहीं । देखिये, यदि ज्ञेय और इन्द्रियों के बीच द्रव्य-विशेष की स्थिति को व्यवधान कहें, तो विभु ( आकाशादि ) की अनुमितिरूप बुद्धि में अतिव्याप्ति हो जायगी । कारण, ज्ञेय ( आकाशादि ) और इन्द्रिय दोनों के मध्य कोई द्रव्य नहीं है । यदि ज्ञापक ( स्वजनक ) ज्ञान की ( स्व की उत्पत्ति से ) पूर्वसत्ता को व्यवधान कहें, तो ह्रस्वत्वादि तथा परत्वादि ज्ञान भी प्रतियोगी-ज्ञान से जन्य हैं । अतः ह्रस्वत्वादि ज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी । यदि केवल विशिष्टवैशिष्ट्य को व्यवधान कहें, तो 'दण्डी पुरुषः' इस प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी । एतदर्थ यदि धूमादि हेतु से विशिष्ट पर्वतादि पक्ष में वह्न्यादि साध्य का वैशिष्ट्य अनुमान का, सादृश्यविशिष्ट का संज्ञावैशिष्ट्य उपमान का और शब्दविशिष्ट देशजात्यादिवैशिष्ट्य शब्द का व्यवधान मानें, तो वह भी नहीं कह सकते । कारण, धूमविशिष्ट में स्वरूपेण प्रथम वह्नि का वैशिष्ट्य होता है और तद्ग्राहित्व अनुमान का व्यवधान कहते हैं, अथवा धूमवैशिष्ट्य का ग्रहणकर वह्नि- वैशिष्ट्यग्राहक प्रतीति में धूमवैशिष्ट्य के प्राथम्य को व्यवधान कहते हैं ? दोनों ही नहीं कह सकते । यदि प्रथम पक्ष मानें, तो कार्यकारणभाव में विरोध हो जायगा । अर्थात् कारण होने से वह्नि धूम से प्रथम ही सिद्ध है, फिर धूमविशिष्ट में ही वह्नि- वैशिष्ट्य रहता है, यह कैसे हो सकता है ? यदि प्रतीति में धूमविशिष्ट में वह्निवैशिष्ट्य का व्यवधान कहें, तो पूछा जायगा कि यह धूमवैशिष्ट्य किसमें विशेषण है—धर्मी में या साध्य में ? यदि धर्मी ( पर्वत ) में धूमवैशिष्ट्य को विशेषण मानें, तो 'धूमवान् पर्वतो वह्निमान् धूमवत्त्वात्' ऐसा ज्ञान का आकार होने से अंशतः आत्माश्रय हो जायगा; क्योंकि विशिष्टवृत्ति धर्म विशेषणवृत्ति भी होता है । यदि धूमवैशिष्ट्य साध्य का ३०