खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम हेतोरंशतः स्ववृत्तिः । साध्यविशेषणत्वे व्याप्तिग्राहिप्रत्यक्षेऽप्यव्यवधानाभावात् न साक्षात्त्वं स्यात् । अष्टम-प्रत्यक्षलक्षण-खण्डनम् अथ ज्ञानस्य जातिभेदः कश्चित्साक्षात्त्वम् । तत्रानुभवत्वेन परापरभावानुपपत्तिः, स्मृतेरपि साक्षात्कारित्वादिति केचित् । तन्न ; स्मृतेस्तथात्वानभ्युपगमात् । स्वप्नस्य तावत् स्मृतित्वासिद्धेः , सिद्धौ वा तत्र साक्षात्त्वारोपोपगमात् । भावनावलजस्य च कचिदालोकादिधर्मिकप्रियाद्याश्रयधर्मारोपत्वं शुक्तिरजतभ्रमवत्, निमीलितनयनादेश्च स्वप्नवदेव गतिरवगन्तव्येति । विशेषण कहें, तो 'वह्निः धूमव्यापकः' इस व्याप्तिप्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वहाँ साध्यविशेषणत्वेन धूमवैशिष्ट्य का व्यवधान होने से एतादृश अव्यवहित- वस्तुधीत्व ही नहीं रहता । अष्टम प्रत्यक्षलक्षण का खण्डन निर्वचन—'ज्ञान का जातिविशेष साक्षात्त्व है और वही साक्षात्त्व-जाति प्रत्यक्ष का लक्षण है' इस लक्षण में कोई आचार्य यह दोष देते हैं कि साक्षात्त्व स्मृति में भी होने से वह अनुभवत्व से अपर ( अल्पदेशवृत्ति ) नहीं है । साथ ही वह अनुमिति में न होने से पर ( अधिकदेशवृत्ति ) भी नहीं है । अर्थात् स्मृति में साक्षात्त्व है, अनुभवत्व नहीं है एवं अनुमिति में अनुभवत्व है, पर साक्षात्त्व नहीं है और प्रत्यक्ष- ज्ञान में दोनों हैं; अतः सङ्करदोष होने से साक्षात्त्व जाति नहीं हो सकती । किन्तु यह दोष युक्त नहीं है । कारण, स्मृति में साक्षात्त्व है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । यदि कहें कि स्वप्न स्मृति ही है, क्योंकि जाग्रत् में अनुभूत पदार्थ ही संस्कार के बल से स्वप्नदशा में प्रतीत होते हैं, तो यह कथन युक्त नहीं है । कारण, अननुभूत स्वशिरश्छेद आदि रूप भी कदाचित् स्वप्न में भासते हैं, अतः स्वप्न स्मृति नहीं है । फिर भी यदि स्वप्न को स्मृति मान, लें, तो भी वह बाह्य इन्द्रियों से अजन्य होने से प्रत्यक्षरूप नहीं है । स्वप्न में प्रत्यक्षत्व का आरोपमात्र होता है। कामी मनुष्य को भावना के बल जो कामिनी की प्रतीत होती है, वह भी प्रत्यक्षायमाण अर्थात् प्रत्यक्षरूप स्मृति नहीं है; किन्तु शुक्ति में रजत की प्रतीति के तुल्य आलोक में प्रियामुखादि का भ्रममात्र है। निमीलित नेत्रवाले मनुष्य को जो कभी किसी वस्तु की प्रतीति हो जाती है, वह भी स्वप्न के तुल्य स्मृति ही है। अतः स्मृति में प्रत्यक्षत्व न होने से साङ्कर्य नहीं है ।