खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
२३४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम हेतोरंशतः स्ववृत्तिः । साध्यविशेषणत्वे व्याप्तिग्राहिप्रत्यक्षेऽप्यव्यवधानाभावात् न साक्षात्त्वं स्यात् । अष्टम-प्रत्यक्षलक्षण-खण्डनम् अथ ज्ञानस्य जातिभेदः कश्चित्साक्षात्त्वम् । तत्रानुभवत्वेन परापरभावानुपपत्तिः, स्मृतेरपि साक्षात्कारित्वादिति केचित् । तन्न ; स्मृतेस्तथात्वानभ्युपगमात् । स्वप्नस्य तावत् स्मृतित्वासिद्धेः , सिद्धौ वा तत्र साक्षात्त्वारोपोपगमात् । भावनावलजस्य च कचिदालोकादिधर्मिकप्रियाद्याश्रयधर्मारोपत्वं शुक्तिरजतभ्रमवत्, निमीलितनयनादेश्च स्वप्नवदेव गतिरवगन्तव्येति । विशेषण कहें, तो 'वह्निः धूमव्यापकः' इस व्याप्तिप्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वहाँ साध्यविशेषणत्वेन धूमवैशिष्ट्य का व्यवधान होने से एतादृश अव्यवहित- वस्तुधीत्व ही नहीं रहता । अष्टम प्रत्यक्षलक्षण का खण्डन निर्वचन—'ज्ञान का जातिविशेष साक्षात्त्व है और वही साक्षात्त्व-जाति प्रत्यक्ष का लक्षण है' इस लक्षण में कोई आचार्य यह दोष देते हैं कि साक्षात्त्व स्मृति में भी होने से वह अनुभवत्व से अपर ( अल्पदेशवृत्ति ) नहीं है । साथ ही वह अनुमिति में न होने से पर ( अधिकदेशवृत्ति ) भी नहीं है । अर्थात् स्मृति में साक्षात्त्व है, अनुभवत्व नहीं है एवं अनुमिति में अनुभवत्व है, पर साक्षात्त्व नहीं है और प्रत्यक्ष- ज्ञान में दोनों हैं; अतः सङ्करदोष होने से साक्षात्त्व जाति नहीं हो सकती । किन्तु यह दोष युक्त नहीं है । कारण, स्मृति में साक्षात्त्व है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । यदि कहें कि स्वप्न स्मृति ही है, क्योंकि जाग्रत् में अनुभूत पदार्थ ही संस्कार के बल से स्वप्नदशा में प्रतीत होते हैं, तो यह कथन युक्त नहीं है । कारण, अननुभूत स्वशिरश्छेद आदि रूप भी कदाचित् स्वप्न में भासते हैं, अतः स्वप्न स्मृति नहीं है । फिर भी यदि स्वप्न को स्मृति मान, लें, तो भी वह बाह्य इन्द्रियों से अजन्य होने से प्रत्यक्षरूप नहीं है । स्वप्न में प्रत्यक्षत्व का आरोपमात्र होता है। कामी मनुष्य को भावना के बल जो कामिनी की प्रतीत होती है, वह भी प्रत्यक्षायमाण अर्थात् प्रत्यक्षरूप स्मृति नहीं है; किन्तु शुक्ति में रजत की प्रतीति के तुल्य आलोक में प्रियामुखादि का भ्रममात्र है। निमीलित नेत्रवाले मनुष्य को जो कभी किसी वस्तु की प्रतीति हो जाती है, वह भी स्वप्न के तुल्य स्मृति ही है। अतः स्मृति में प्रत्यक्षत्व न होने से साङ्कर्य नहीं है ।
[Header] परिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डने २३५
इदन्तु स्यात् — परमाण्वादिवुद्ध्यावनुव्यवस्यमानायां परमाणुप्रतीत्यंशेऽपि साक्षात्त्वमनुभूयत इत्यत्र न नः सम्प्रतिपत्तिः । अन्यथा लिङ्गबुद्धिलक्षणया प्रत्यासत्त्या वह्निरपि मानसप्रत्यक्ष एव, न लैङ्गिक इति परेण सुवचत्वात् । एवं प्रत्यभिज्ञायां पूर्वदेशकालस्थितिमस्य पश्यामीति कस्यानुभवो यद्वलात् तथाऽभ्यु- पेयम् । तस्मात्प्रतीतिकलहोऽयम् । यदि च साक्षात्त्वं जातिरध्यक्षमानिका, तदा प्रतीतौ कस्याश्चिदध्यक्षानध्यक्ष- विवादो न स्यात् । न हि घटादिप्रत्यक्षत्वे विवदन्ते । समर्थन -- तब तो प्रत्यक्षत्व जाति हो गयी और उसे लेकर प्रत्यक्ष का लक्षण किया ही जा सकता है । खण्डन—फिर भी प्रत्यक्षत्व जाति नहीं है । कारण, परोक्षत्व के साथ प्रत्यक्षत्व का सांकर्य है, क्योकि 'द्व्यणुकं स्वपरिमाणात् अणुतरपरिमाणारब्धम्, कार्यद्रव्यत्वात्, घटवत्' इस अनुमिति के बाद होनेवाले 'परमाणुमनुमिनोमि' इस अनुव्यवसाय में अनुमित्यंश में प्रत्यक्षत्व तथा परमाण्वंश में परोक्षत्व दोनों रहते हैं । यदि कहें कि परमाणु की अनुमिति आत्मा में है और आत्मा मनःसंयुक्त है, इस प्रकार ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति होने से परमाण्वंश में भी उक्त अनुव्यवसाय प्रत्यक्ष ही है, तो कहना पड़ेगा कि हमें ऐसा अनुभव नहीं होता । फिर भी ऐसा मानें, तो वह्निसम्बद्ध धूम का ज्ञान भी आत्मा में समवेत है ही और आत्मा मनःसंयुक्त है, इस तरह ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति होने से अनुमिति भी प्रत्यक्ष हो जायगी । किञ्च —'सोऽयं देवदत्तः' इस प्रत्यभिज्ञान में भी तत्ता-अंश में स्मृतित्व तथा इदन्ता-अंश में प्रत्यक्षत्व होने से सांकर्य है । इसलिए भी प्रत्यक्षत्व जाति नहीं है । किसके इदन्ता-अंश के तुल्य तत्ताविशिष्ट अंश में अर्थात् देवदत्त के पूर्वदेशकालसम्बन्ध अंश में 'पश्यामि' इत्याकारक अनुव्यवसाय अनुभवसिद्ध है, जिसके बल पर उस अंश में भी प्रत्यभिज्ञा को आप प्रत्यक्ष मानें ? तस्मात् 'तत्ता-अंश में प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्ष है' यह बात विवादग्रस्त है । किञ्च —प्रत्यक्षत्व को प्रत्यक्षरूप प्रमिति का विषय मानें, तो किसी-किसी प्रतीति में जो विवाद होता है कि 'यह ज्ञान प्रत्यक्ष है या नहीं ?', वह न होना चाहिए । अर्थात् कोई वायुज्ञान को प्रत्यक्ष तो कोई अनुमिति मानते हैं, इसी तरह कोई अभावज्ञान को प्रत्यक्ष तो कोई अनुपलब्धिरूप प्रमाण से जन्य प्रमित्यन्तर मानते हैं—वह मतभेद न होना चाहिए । कारण, घटादि के प्रत्यक्ष में तो किसीको विवाद ही नहीं होता कि घटज्ञान प्रत्यक्ष है या अनुमिति ।
२३६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [प्रथम क्वचिदस्फुटत्वाद्विवाद इति चेत् । मैवम्; निरंशे वस्तुनि कः स्फुटत्वाव- भासः । यद्येकार्थसमवायिभिर्भूयोभिः सहोपलम्भः, स ज्ञानत्वादिवत् साक्षात्त्वेऽपि तर्हीति ज्ञानादित्वे न विवादः, साक्षात्त्वे त्विति विशेषो वाच्यः । दर्शनकृतो हि विवादो न मात्सर्येण वाङ्मात्रेण वा, किन्तु तत्त्वाभिमानादेव । प्रत्यक्षार्थधर्मिकायां चानुमायां साक्षात्त्व-परोक्षत्वसङ्करो दुर्वारः । परोक्षत्वं न जातिः, किन्तु साक्षात्त्वमेव तथा। केवलं तु साक्षात्त्वाभावः परोक्षत्वमिति चेन्न । अस्यार्थस्याऽविनिगन्तव्यत्वापत्तेः । सर्वज्ञमनुमन्यमानस्य च मते दृष्टलिङ्गादेरीश्वरस्य लिङ्ग्यादिवद्भावपरोक्षत्वेनापि विरोधः । समर्थन—वायुज्ञान में प्रत्यक्षत्व का स्फुट अवभास ( समग्र रूप से अर्थ का ग्रहण ) न होने से ही वहाँ मतभेद होता है । खण्डन—प्रत्यक्षत्व जाति निरंश ( अखण्ड ) है, अतः उसका स्फुट अवभास क्या वस्तु है ? यदि कहें कि ज्ञानरूप एक अर्थ में समवायी जो ज्ञानत्व, अनुभवत्व, अपरोक्षत्व आदि बहुत-से धर्म हैं, उनके सहित अवभास ही 'स्फुट अवभास' है, तो वह स्फुट अवभास ज्ञानत्व की तरह प्रत्यक्षत्व में भी है । फिर ज्ञानत्व आदि में तो विवाद होता नहीं और प्रत्यक्षत्व में विवाद होता है, इसमें कोई विशेष कारण कहना होगा । यह दर्शनकारों ( परीक्षकों ) का विवाद है, अतः वह ईर्ष्या या वाङ्मात्र से नहीं, किन्तु तत्त्व के अभिमान से है । अर्थात् हम जो कहते हैं, वह प्रामाणिक है, इस अभिमान से ही वह विवाद चलता है । इसलिए अपने पक्ष की सिद्धि के निमित्त अपने कथित अर्थ में आपको कोई विनिगमक बताना ही पड़ेगा । किञ्च—जहां धर्मी ( पक्ष ) प्रत्यक्ष है, उस अनुमिति में पक्षांश में प्रत्यक्षत्व तथा साध्यांश में परोक्षत्व होने से भी दोनों में साङ्कर्य है । समर्थन—परोक्षत्व जाति नहीं है, किन्तु प्रत्यक्षत्व का अभाव ही परोक्षत्व है । अतः साङ्कर्य नहीं है । खण्डन—यह कथन भी युक्त नहीं, कारण परोक्षत्व ही जाति है और उसका अभाव ही प्रत्यक्षत्व है, ऐसा न मानने में कोई विनिगमक नहीं है । किञ्च—जो आचार्य सर्वज्ञ ईश्वर को अनुमितिसिद्ध मानते हैं, उनके मत में ईश्वर को धूमज्ञान के अनन्तर जो वह्नि का ज्ञान होता है, वह ईश्वरीय ज्ञान होने से प्रत्यक्ष है तथा लिङ्गज्ञान के अनन्तर होने से परोक्ष भी है । अतः उस ज्ञान में प्रत्यक्षत्व और परोक्षत्व का साङ्कर्य हो जाने से प्रत्यक्षत्व जाति नहीं है ।
परिच्छेद ] अग्रिम प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २३७ लिङ्गादिधीजन्यत्वमनुमितित्वादौ प्रयोजकमिति चेत् ; साक्षात्त्वेऽपि तर्हीन्द्रिय- सन्निकर्षादिजन्यत्वमिति साक्षादपि सा न स्यात् । व्यञ्जकोपाधिनियता च जातिरिष्यते । न च तदत्र; उक्तप्रकारबाधात् । न च व्यञ्जकनियमानभ्युपगत्या न तद्गतोपगम्यमिति वाच्यम्; 'किं मया दृष्टं तथा किं वा केन चित्कथितमि'ति संशयानुपपत्तेः। प्राग्भूतायां स्मर्यमाणायां तद्बुद्धौ त्वन्मते मनसा ज्ञानरूपया प्रत्यासत्त्या प्रत्यक्षीक्रियमाणायां साक्षात्त्वाग्रहो विना व्यञ्जकाभावं कथं स्यात् । अर्थधर्मश्च साक्षात्त्वमिति स्वप्रकाशवादे निरस्तम् । समर्थन—लिङ्गज्ञत्व अनुमितित्व का प्रयोजक है । ईश्वरीय ज्ञान नित्य होने से वह अनुमिति नहीं हो सकता । खंडन—यदि ऐसा ही है, तो इन्द्रियसन्निकर्षजत्व भी प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है । उसके न होने से ईश्वरीय ज्ञान प्रत्यक्ष भी न कहलायेगा । ईश्वरीय ज्ञान को सभी आचार्य अपरोक्ष मानते हैं। अतः 'ईश्वरीय ज्ञान अपरोक्ष नहीं है' इसे आप इष्टापत्ति भी नहीं कह सकते । किञ्च—जाति व्यञ्जक धर्म से नियत ही हुआ करती है । उपर्युक्त इन्द्रियार्थसन्नि- कर्षोत्पन्नज्ञानत्व आदि व्यञ्जकों के खण्डित हो जाने से प्रत्यक्षत्व का कोई व्यञ्जक ही नहीं है । इसलिए भी प्रत्यक्षत्व जाति नहीं है । समर्थन—'जाति व्यञ्जक उपाधि से नियत ही होती है' इस नियम को हम नहीं मानते । खंडन—इस नियम को न मानें, तो 'क्या मैंने उसे देखा था या किसीने सुनाया था' इस प्रकार दृष्ट पदार्थ के विषय में कभी-कभी जो सन्देह हो जाता है, वह नहीं होगा । कारण, प्राग्काल में ज्ञात उक्त बुद्धि का स्मरण होने या तुम्हारे मत में ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति से प्रत्यक्ष होने पर उसमें प्रत्यक्षत्व जाति का अनिश्चय ( सन्देह ) हो ही नहीं सकता । जो जाति को व्यञ्जक उपाधि से नियत मानते हैं, उनके मतमें व्यक्ति का ग्रहण होने पर भी व्यञ्जक के अनिश्चय से जाति का कदाचित् अनिश्चय हो भी सकता है । 'साक्षात्त्व ज्ञात का नहीं, किन्तु ज्ञेय का धर्म है और तद्विषयक होने से ही ज्ञान में साक्षात्त्व-व्यवहार होता है' इसका खण्डन तो स्वप्रकाश ( कर्मलक्षण के खण्डन ) के प्रस्ताव में कर ही चुके हैं ।
२३८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तथापि अबाधितसाक्षात्त्वबुद्धिव्यवहारबलादन्तः पदार्थान्तरमपि साक्षात्त्व- मननुमत्य न निस्तारोऽस्ति, भ्रान्तेरप्यभ्रान्तिपूर्वकत्वादिति चेन्न । तस्यापि साक्षाद्ग्रहे क्वचिदपि तद्विवादो न स्यादित्यादिदोषसाम्यात् । अनुमानादिवेद्यत्वे च लिङ्गाद्यनुपपत्तेः, क्व च व्याप्त्यादिग्रह इत्यादिदुरुत्तरपरम्परैव स्यात् । सप्तपदार्थ- नियमसाधनानि च न कथं परिपन्थीनि स्युरिति । लिङ्गादिजत्वाभावसमुदायवती धीः साक्षादिति चेन्न । परोक्षविषयसंशयादा- वतिव्याप्तेः । ईदृशी प्रमा तथेति चेन्न । प्रत्यक्षभ्रमाव्याप्तेः । अनुमानादिन्यवच्छेद्यतत्तदसाधारणकारणाजनिता धीः साक्षादिति चेन्न । एवं हि प्रत्यक्षतत्तदपरव्यतिरिक्ता धीरनुमानादिरिति वैपरीत्यमेव कुतो न समर्थन—तब भी अबाधित साक्षात्त्वबुद्धि या व्यवहार के बल से [ साङ्कर्य होने से जाति न होने पर भी ] साक्षात्त्व को पदार्थान्तर माने बिना तो निर्वाह ही न होगा । कारण, भ्रान्ति भी प्रमापूर्वक ही होती है । खंडन—उस पदार्थान्तर साक्षात्त्व को यदि प्रत्यक्षज्ञान का विषय मानें, तो कहीं भी सन्देह न होना चाहिए, यह पूर्वोक्त दोष स्थिर ही है । किञ्च—साक्षात्त्वबुद्धि या व्यवहार अनिर्वचनीय साक्षात्त्व से भी हो सकता है । अतः कोई लिङ्ग या अनुपपत्ति भी नहीं है, जिससे साक्षात्त्व की सिद्धि हो सके । साथ ही जबतक किसी व्यक्ति में साक्षात्त्व का प्रत्यक्ष न हो, तबतक व्याप्तिग्रह भी नहीं हो सकता । एवं साक्षात्त्व को पदार्थान्तर मानने में ‘सात ही पदार्थ हैं, अष्टम नहीं’ यह आपका नियम भी बाधक है । निर्वचन—‘लिङ्गजन्त्व का अभाव, शब्दजन्यत्व का अभाव तथा सादृश्य- जन्यत्व का अभाव—इस अभावत्रितय से युक्त बुद्धि ही ‘साक्षात्-धी’ है’ ऐसा कहेंगे । खंडन—‘परमाणु जगत् के कारण हैं या प्रधान ?’ इस परोक्षविषयक सन्देह में, ‘प्रधान ही जगत् का कारण है’ इस भ्रम में तथा ‘सा मे माता’ इस स्मृति में अतिव्याप्ति हो जायगी । ‘उक्त अभावत्रयविशिष्ट प्रमा प्रत्यक्ष है’ यह नहीं कह सकते, कारण प्रत्यक्षभ्रम में अव्याप्ति हो जायगी । अप्रमा-साधारण प्रत्यक्षमात्र प्रस्तुत होने से ‘प्रत्यक्षप्रमा ही लक्ष्य है’ यह कथन भी अयुक्त है । समर्थन—‘अनुमिति, उपमिति, शाब्दबोध, परोक्ष, सन्देह, भ्रम, स्मृति आदि जो व्यवच्छेद्य हैं, उन ( व्यवच्छेद्यों ) के असाधारण कारणों से अजन्य बुद्धि प्रत्यक्ष है ।’ खण्डन—इसी तरह अनुमिति आदि के भी ‘प्रत्यक्षादि तत्तत् व्यवच्छेद्यों के असाधारण
परिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २३६ स्यादित्यविनिगम्यत्वं स्यात् । तेषु व्यवच्छेद्येषु एकद्वयादिपरिहाय व्यवच्छेद्य- हेत्वजनितत्वेनापि साक्षात्त्ववत्तत्र तत्रानुगतबुद्ध्याद्यन्तरापत्तेः । व्यवहारे सति निमित्तानुसरणम्, न तु निमित्तानुसरणेन व्यवहार इति चेन्न । निमित्तस्य अनत्यापत्तिद्वारस्यैव कल्प्यत्वात् । तत्तज्जनितत्वाभावो हि तेनैव रूपेण अनुगतव्यवहारप्रत्ययावाद्ध्यात्, न त्वन्येनापि । तथात्वे यावत्परिदृष्टव्यक्तिविशेषान्यत्वेन व्यवहारोपपत्तौ गोत्वाद्युच्छेदप्रसङ्गः । तस्मात्-- विधिजः प्रत्ययोऽन्योऽयं व्यतिरेकासमर्थनः । नैवं चेदपराधं ते किमन्यापोहवादिना ॥ ४१ ॥ कारणों से अजन्यज्ञान अनुमिति आदि हैं' ऐसे लक्षण कर सकते हैं। एवञ्च अन्योन्याश्रय हो जायगा । किञ्च—'प्रत्यक्ष और अनुमिति इन दोनों में वृत्ति, प्रत्यक्षादि त्रय में वृत्ति या चतुष्टय में वृत्ति तत्-तत् व्यवच्छेद्यों के असाधारण कारणों से अजन्यज्ञान' इस प्रकार एक लक्षण होने से प्रत्यक्षादि दो या तीन में भी अनुगत बुद्धि या व्यवहार हो जायगा । समर्थन—प्रत्यक्ष आदि दो या तीन में अनुगत व्यवहार होता ही नहीं, अतः अनुगत लक्षणरूप निमित्त की कल्पना ही नहीं होगी। कारण, व्यवहार के अनुसार ही निमित्त की कल्पना होती है, निमित्त के अनुसार व्यवहार की नहीं। खण्डन—यह ठीक है कि व्यवहार के अनुसार ही लक्षणरूप निमित्त की कल्पना होती है; किन्तु निमित्त की कल्पना भी ऐसी ही होनी चाहिए, जिसमें कोई अतिप्रसङ्ग का द्वार न हो । पूर्वोक्त दोष होने से पूर्वोक्त लक्षणरूप निमित्त ऐसा नहीं है ! किञ्च—यदि अनुमिति आदि तत्तत् व्यवच्छेद्यों के असाधारण कारणों से जन्यत्वाभाव को प्रत्यक्ष कहें, तो उक्त लक्षण उक्त जन्यत्वाभावरूप से ही अनुगत व्यवहार या अनुगत प्रतीति का निमित्त होगा, प्रत्यक्षत्वरूप से व्यवहार या प्रतीति का निमित्त नहीं होगा । यदि उक्त जन्यत्वाभावरूप से ही प्रत्यक्ष-व्यवहार या प्रतीति की उपपत्ति मानें, तो परिदृष्ट अश्वादि व्यक्ति से अन्यत्व रूप से ही गवादि-प्रतीति की भी उपपत्ति हो जायगी । फिर गोत्वादि का भी उच्छेद हो जायगा । तस्मात् 'इदं प्रत्यक्षम्' अथवा 'अयं गौः' इत्यादि विधिमुख से जायमान ज्ञान ही प्रत्यक्ष है,'यही कहना होगा । एवञ्च व्यतिरेक अर्थात् उक्त जन्यत्वाभावरूप लक्षण से उसका समर्थन नहीं हो सकता । यदि ऐसा न मानें, तो उन अपोहवादी बौद्धों का क्या अपराध है कि उनकी बात न मानी जाय ?
२४० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम नवम-प्रत्यक्षलक्षणा-खण्डनम् शब्दानुमानोपमानजप्रमितिव्यतिरिक्तत्वे सति प्रमितित्वं प्रत्यक्षलक्षण- मभिधाय यः कोऽपि न त्रपते, स प्रष्टव्यः—किं प्रत्येकमिदं लक्षणम्, उत मिलितम् ? नाद्यः; प्रत्येकं व्यभिचारात् । द्वितीये किं मिलितानां निषेधः, उत निषेधानां मिलितत्वम् ? नाद्यः; प्रत्येकमेव व्यभिचारात् । न हि प्रत्येकमनुमित्यादौ मिलिततद्रूपसम्भवः । नापि द्वितीयः; मिलितास्वनुमित्यादिषु निषेधमेलकसम्भवे- ऽपि प्रत्यक्षत्वानभ्युपगमात् । न बह्वाश्रयाणामुक्तनिषेधानां लक्षणत्वम्, अपि त्वेकाश्रयाणामिति चेन्न । समुदायिभेदेऽपि समुदायस्यानुमित्यादिवत् एकतोपचारबीजाविशेषाभ्युपगम इति हि वक्ष्यते । नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन ‘शब्दज, अनुमानज और उपमानज प्रमितियों से भिन्न जो प्रमिति हो, वह प्रत्यक्ष है’ ऐसा लक्षण कहकर जो लज्जित नहीं होते, उनसे पूछना चाहिए कि क्या इनमें प्रत्येक लक्षण है या मिलित ? इनमें प्रत्येक अर्थात् ‘शब्दजप्रमितिव्यतिरिक्तप्रमितित्वम्’ आदि तो लक्षण नहीं कह सकते, कारण शब्दजप्रमितिव्यतिरिक्त प्रमितित्व अनुमिति में अतिव्याप्त है । इसी तरह अन्यत्र भी लक्षणों की अतिव्याप्ति जाननी चाहिए । यदि मिलित लक्षण कहें, तो ‘शब्दज तथा अनुमानज तथा उपमानज प्रतीतिसमुदाय से व्यतिरिक्त प्रमितित्व’ लक्षण है या ‘शब्दज प्रमिति का जो भेद तथा अनुमानज प्रमिति का जो भेद तथा उपमानज प्रमिति का जो भेद—एतत् भेदत्रयविशिष्ट प्रमितित्व है ? इनमें प्रथम पक्ष में समुदाय का भेद प्रत्येक में होने से प्रत्येक में अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि प्रत्येक अनुमिति आदि समुदायरूप नहीं है । द्वितीय कल्प में अनुमित्यादि त्रयसमुदाय में प्रत्येक अनुमिति आदि का भेदत्रय होने से अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—‘शब्दादि प्रतीतियों के भेदत्रय से युक्त जो एक प्रतीति है, वह प्रत्यक्ष है ।’ अनुमित्यादि त्रयसमुदाय में एकत्व नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं । खंडन— यद्यपि समुदाय के एकदेश अनुमित्यादि अनेक हैं, किन्तु समुदाय एक ही है, अर्थात् प्रत्येक अनुमिति आदि में गुणरूप एकत्व न होने पर भी जैसे औपचारिक एकत्व-व्यवहार होता है, वैसे ही अनुमित्यादि समुदाय में भी उपचार से एकत्व-व्यवहार हो सकता है । कारण उपचार का बीज परोक्षत्वरूप एक धर्म अनुमित्यादित्रय में भी विद्यमान है ।
परिच्छेद ] नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २४१ असमुदायत्वे सतीत्यपि विवक्षितमिति चेन्न । समुदायत्वविशिष्ट एवांशतः स्वात्मनि वृत्तिविरोधभयेन असमुदायत्वस्यैष्टव्यत्वेन तादृशि प्रसङ्गो दुर्वारः । ज्ञानस्यैवं विवक्षितमिति चेन्न । विशिष्टस्यापि ज्ञानस्य ज्ञानत्वादेव । एकेति च किमाश्रयव्यक्त्यभेदो विवक्षितः, उताभिन्नजातीयता, उतैकोपा- धिकता, उतैकसङ्ख्यायोगिता, उत द्व्यादिसङ्ख्यायोगाभावः ? आद्ये तद्विशिष्टस्याव्यापकतादोषः, व्यक्त्यात्मनोऽभेदस्य व्यावृत्तत्वात् धर्मिणा च लक्षणविशेषणेऽलक्ष्यधर्मत्वं धर्मस्य स्यात्, स्वस्यैव स्वधर्मत्वानुपपत्तेः । आश्रयाभेदस्योपलक्षणत्वे प्रागुक्तदोषः । समर्थन—उक्त लक्षण में समुदाय से भिन्नत्व का भी निवेश है, अतः अनुमित्यादि- त्रय के समुदाय में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—यदि कहें कि समुदायत्वविशिष्ट में भी समुदायत्व मानेंगे, तो विशिष्टवृत्ति धर्म विशेषणवृत्ति अवश्य होने से अंशतः आत्माश्रय हो जायगा । अतः समुदायत्वविशिष्ट भी असमुदाय होने से पुनः अनुमित्यादि समुदाय में अतिव्याप्ति ही है । समर्थन—उक्त लक्षण में 'प्रमितित्व' का भी निवेश करेंगे । एवञ्च समुदाय प्रमिति न होने से उसमें अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—समुदायत्वविशिष्ट अनुमित्यादि प्रमिति है, अतः समुदाय भी प्रमिति ही है । किञ्च—लक्षण में निविष्ट 'एक' शब्द से लक्षणाश्रय लक्ष्य व्यक्ति का अभेद अभिप्रेत है या एक ( अभिन्न ) जाति का आश्रयत्व अथवा एक उपाधि का आश्रयत्व या एकत्वसंख्या का योग या द्वित्व आदि संख्या का योगाभाव ? प्रथम कल्प में एक ही प्रत्यक्ष व्यक्ति का संग्रह हो सकने से लक्षण व्यक्त्यन्तर में अव्याप्त हो जायगा । यदि 'एकलक्ष्याश्रयत्व' लक्षण में विशेषण दें, तो लक्षण लक्ष्य का धर्म न हो सकेगा । कारण जैसे स्व का धर्म स्व नहीं होता, वैसे ही स्वविशिष्ट भी स्व का धर्म नहीं हो सकता । यदि कहें कि लक्ष्य व्यक्ति का अभेद लक्षण में विशेषण नहीं, किन्तु उपलक्षण है, अतः उक्त दोष नहीं; तो उपलक्षण व्यावर्य से बहिर्भूत होने के कारण तद्व्यावृत्त अभावत्रयमात्र ही लक्षण होगा, जो अनुमित्यादि में भी रहेगा । एवञ्च पूर्वोक्त दोष तदवस्थ ही है । ३१
२४२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम द्वितीये तदेवाभिन्नजातीयत्वं लक्षणमस्तु, अवश्यं तया प्राथम्येन प्रतीय- मानत्वात् । न तृतीयः ; परोक्षप्रमितित्वस्यानुमित्यादिषु मिलितास्वपि भावात् । नापि चतुर्थः ; वैशेषिकपक्षे गुणतया तदभावात् , भावे वाऽनुमित्यादित्रय- वृत्तीनां त्रयाणामप्यभावानामेकत्वसङ्ख्यासामानाधिकरण्यसम्भवात्, मिलिताना- मप्येकसमुदायापेक्षया तथात्वात् । नापि पञ्चमः ; वैशेषिकमतानुसारेण अनुमित्यादित्रयेऽपि तदभावस्य तुल्य- त्वात् । अतदनुसारे प्रत्यक्षव्यक्तिष्वपि द्वयादिसङ्ख्यायोगात् । तथापि नैकस्यां प्रत्यक्षव्यक्तौ द्वयादिपरिसमाप्तिः, द्वयादिसङ्ख्यापरि- समाप्यभावश्च तदभावशब्देन विवक्षित इति चेन्न । का हि परिसमाप्तिर्या एकस्यां व्यक्तौ नास्तीत्युच्यते ? तत्रैव वृत्तिर्द्वयादेः परिसमाप्तिः, सैकस्यां व्यक्तौ नास्तीति चेन्न । द्वितीय या तृतीय कल्प में यदि वह जाति या उपाधि प्रत्यक्षत्व या अर्थजत्व ही हो, तो उन्हींको लक्षण मान लें; प्रकृत लक्षण व्यर्थ है । कारण, उक्त लक्षण में विशेषण होने से वह जाति या उपाधि अवश्य ज्ञेय है, साथ ही उन्हें लक्षण मानने में लाघव भी है । यदि यत्किञ्चित् एक जाति या एक उपाधि का ग्रहण हो, तो परोक्षत्वरूप जाति या उपाधि अनुमित्यादि त्रय में भी है । अतः अनुमित्यादि समुदाय में अतिव्याप्ति हो जायगी । चतुर्थ कल्प में वैशेषिक के मत के अनुसार एकत्वसंख्या गुण होने से वह प्रत्यक्ष ( रूप गुण ) में नहीं रह सकती, अतः असम्भव हो जायगा । अन्य मतों के अनुसार अनुमित्यादित्रय में उक्त अभावत्रय भी है तथा समुदाय की अपेक्षा एकत्वसंख्या भी है; अतः अनुमित्यादि-समुदाय में अतिव्याप्ति हो जायगी । पंचम कल्प में वैशेषिक के मत के अनुसार अनुमित्यादित्रय में भी द्वित्वादि संख्या का अभाव होने से अतिव्याप्ति हो जायगी तथा अन्य मत के अनुसार प्रत्यक्ष में भी ( 'एक, दो, तीन प्रत्यक्ष' इस प्रकार ) द्वयादि संख्या रहने से असम्भव हो जायगा । समर्थन—तब भी एक प्रत्यक्ष व्यक्ति में द्वित्व आदि सङ्ख्या की परिसमाप्ति ( पर्याप्ति ) नहीं है और द्वयादि की परिसमाप्ति का अभाव ही तदभाव पद से विवक्षित है, अतः असम्भव नहीं होगा। खंडन—द्वित्वादि संख्या की परिसमाप्ति क्या है, जो एक व्यक्ति में नहीं है ? समर्थन—केवल उसीमें वृत्तित्व द्वित्व की परिसमाप्ति है । वह एक ही व्यक्ति में नहीं है, कारण द्वित्व दो व्यक्तियों में रहता है । खंडन—यदि तत्रैववृत्तित्व
परिच्छेद १ ] नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २४३ एवमेकत्वस्यापि न क्वचित्परिसमाप्तिः स्यात् । न हि तस्य तत्रैव वृत्तिः ; अन्य- स्यैकत्वाभावप्रसङ्गात् । अत एकत्वसङ्ख्यावत्यामेव व्यक्तौ द्व्यादिपरिसमाप्ति- रित्यविशेष एव । एकव्यक्तिगतैकत्वसङ्ख्याव्यक्तिर्नान्यत्रेति चेन्न । सत्ताव्यक्तेरप्येवम्भाव- प्रसङ्गात्, अननुगतत्वापत्तेश्च । सत्तैकैव जातिरूपा, एकत्वं तु प्रतिव्यक्ति भिन्नं गुणपदार्थ इति चेत्; नूनं वैशेषिकैर्विप्रलब्धोऽसि । कथमन्धथा सदेकप्रत्यययोरनुभवव्यवहारविशेषमपश्यन्नपि कानिचित् कानिचिदसम्बद्धान्यक्षराणि प्रलपसि । सत्त्वैकत्वयोः परापरत्वानुपपत्तेरेवं स्यादिति चेन्न । साम्यात् । जातिपरा- को परिसमाप्ति कहें, तो एकत्व की कहीं भी परिसमाप्ति न होगी। कारण जिन दो में द्वित्व रहता है, उनमें से प्रत्येक में एकत्व भी रहता ही है। अन्यथा वहाँ एकत्व का अभाव हो जायगा । एवञ्च वृत्तित्वमात्र ही परिसमाप्ति होने से एक प्रत्यक्ष व्यक्ति में भी द्वित्व की परिसमाप्ति ही है, अभाव नहीं । अतः लक्षण का असम्भव हो जायगा। समर्थन—एकव्यक्तिगत एकत्वसंख्या अन्यत्र नहीं रहती, अतः तत्रैववृत्तित्वरूप परिसमाप्ति एकत्व में हैं। खंडन—सत्ताव्यक्ति भी ऐसी ही हो जायगी। अर्थात् एक- व्यक्तिगत सत्ता अन्यत्र न रहेगी। यदि सत्ता को भी प्रतिव्यक्ति भिन्न मानें, तो 'इदं सत्', इदं सत्' यह अनुगत प्रतीति नहीं होगी। किञ्च—यदि एकत्व को प्रतिव्यक्ति- व्यावृत्त मानें, तो 'इदमेकम्', 'इदमेकम्' यह अनुगत प्रतीति न होगी। यदि उसे नाना मानें, तो सभी एकत्व का लक्षण में प्रवेश तो हो नहीं सकता, किन्तु एक ही एकत्व का निवेश हो सकता है। एवञ्च जिस प्रत्यक्ष-व्यक्तिगत एकत्व का निवेश करेंगे, उससे अन्य व्यक्ति में अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—जातिरूप होने से सत्ता एक ही है, किन्तु एकत्व तो गुणपदार्थ होने से प्रतिव्यक्ति भिन्न है। खंडन—निश्चय ही आप वैशेषिकों के वञ्चन में आ गये । अन्यथा सत्ता और एकत्व दोनों की प्रतीति या व्यवहार में भेद न देखते हुए भी युक्तिविरुद्ध, असम्बद्ध (एकत्व को गुण तथा सत्ता को जाति) क्यों कहते ? समर्थन—यदि एकत्व को जाति मानें, तो द्रव्यत्व के तुल्य उसका भी सत्ता के साथ पर-अपरभाव होना चाहिए। वह हो नहीं सकता; कारण सत्ता में सत्ता नहीं रहती और एकत्व रहता है तथा एकत्व में सत्ता है और एकत्व नहीं है। फलतः सांकर्य होने से एकत्व जाति ही नहीं, प्रत्युत गुण ही है। खंडन—यदि सांकर्य का परिहारमात्र ही
२४४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम परत्वश्रौव्यमेव च क्वाप्येकन्यूनवृत्तित्वे प्रमाणं स्यात् । क्व तथेति चेन्न । शैलेऽनलस्यानुमायां क्व हस्तांवितस्त्यादौ तदंश इत्यांनिश्चयवददोषत्वात् । नन्वस्तु मा वाऽऽसीदेकत्वमनुगतम्, किमनेनात्र निरूपितेन ? द्वित्वादि यत्र न समाप्यते, अभिहिताभावत्रयं चास्ति तत्प्रत्यक्षमिति । मैवम् ; अनुमित्यादि- त्रयेऽपि न त्रित्वं परिसमाप्तम् । एवं सत्यन्यानि त्रीणि न स्युः । अन्या सा त्रित्वव्यक्तिर्याऽन्यत्रेति चेन्न । त्रित्वव्यक्तेः कस्याश्चिदनुमित्यादि- त्रये समाप्यभावात् । काचिदपि त्रित्वव्यक्तिर्यत्र न समाप्यत इति चेन्न । अव्यापकत्वात् । प्रत्यक्षत्वस्य च त्रित्वव्यक्तेश्चावश्यं सामानाधिकरण्यस्य वैशेषिकमतव्युत्थितेन करना है, तो सत्ता को गुण और एकत्व को जाति मानकर कीजिये, क्या हानि है । किञ्च—'सत्ता और एकत्व दोनों में एक पर तथा एक अपर है, एक व्यक्ति में वृत्ति जातिद्वय होने से; जैसे द्रव्यत्व' यह अनुमान ही एकत्व के न्यूनवृत्तित्व में प्रमाण है । समर्थन—फिर भी इस अनुमिति से 'सत्ता अपर जाति है या एकत्व ?' इस विशेष का निश्चय तो होता ही नहीं । खंडन— अनुमिति में यह दोष नहीं है; कारण अनुमिति से सर्वत्र सामान्यरूप से ही निश्चय होता है, विशेषरूप से नहीं । पर्वत में धूम से वह्नि की अनुमिति में भी वह्नि हस्तपरिमित है या वितस्तिपरिमित, ऐसा कोई विशेष निश्चय कहाँ होता है ? समर्थन—एकत्व अनुगत हो या न हो, यहाँ इस निरूपण से क्या प्रयोजन है, 'द्वित्व आदि की परिसमाप्ति जहाँ न हो और उक्त अभावत्रय हों, वह प्रत्यक्ष है' यही प्रत्यक्ष का लक्षण करेंगे । खण्डन—अनुमिति आदि त्रय में भी यावत् त्रित्वव्यक्ति की परिसमाप्ति नहीं है । यदि अनुमित्यादि त्रय में ही त्रित्व की परिसमाप्ति मानें, तो अन्यत्र ( 'प्रमेयादीनि त्रीणि यहाँ' ) त्रित्व न रहेगा । समर्थन—अन्यत्र जो त्रित्व व्यक्ति है, वह अन्य ही है । अर्थात् अनुमिति आदि निष्ठ त्रित्व की परिसमाप्ति उसीमें है । लक्षण में एकैक ( यत्किंचित् ) त्रित्व की परिसमाप्ति ही अभिप्रेत है । खण्डन—फिर तो यत्किञ्चित् त्रित्वव्यक्ति की परिसमाप्ति का अभाव अनुमित्यादि त्रय में भी है । समर्थन—'किसी भी त्रित्वव्यक्ति की परिसमाप्ति जहाँ न हो, वह प्रत्यक्ष है ।' खंडन—आप वैशेषिक ( कणाद मुनि के अनुयायी ) नहीं हैं । अतः प्रत्यक्ष में त्रित्व- संख्या को अवश्य मानेंगे । यदि न मानें, तो 'प्रत्यक्षव्यक्तयस्तिस्रः' ऐसा व्यवहार आपके
परिच्छेद ] नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २४५ भवताऽभ्युपगम्यत्वात् । अन्यथा प्रत्यक्षव्यक्तयस्तिस्रो न स्युः, तदेव हि त्रिरभि- धीयते यत्र त्रित्वं परिसमाप्यते । किञ्च—तथापि स एवातिव्यापकतादोषः । त्रित्वेनावच्छिन्नासु अनुमित्यादि- व्यक्तिषु त्वदभिहितमभावत्रयमस्तीति तत्र प्रत्यक्षलक्षणं गतमित्यतिव्याप्तिरुक्ता, तद्व्यावर्तनाय भवताऽभिधीयते—काचिदपि त्रित्वव्यक्तिर्यत्र न समाप्यत इति । न चैवमुक्ते साऽतिव्याप्तिर्निवर्तते, तत्राप्युक्तविशेषणस्य विद्यमानत्वात् । न हि त्रित्वावच्छिन्ने तस्मिन् त्रित्वव्यक्तिः काचिदपि समाप्यते, त्रित्वलक्षणैकोपाध्य- वच्छिन्ने तस्मिन् त्रित्वव्यक्त्यन्तरं भवदप्याश्रयान्तरमादाय वर्तते, न तु तत्रैव परिसमाप्यते । यत्र चोक्तमुपाधिभूतं त्रित्वं तेषु यदि त्रित्वसमाप्तिर्धर्मिषु दृश्येत, तदा तद्दर्शनेन तत्र धर्मिमात्रे लक्षणाव्यावृत्तिः सिद्धयेत्, न तु त्रित्वविशिष्टे धर्मिणि । तस्मादतिव्यापकत्वं तदवस्थमेव । मत में कैसे होगा ? कारण, वे ही तीन हैं, जिनमें त्रित्वसंख्या परिसमाप्त हो । अतः प्रत्यक्ष में भी सभी त्रित्वों का अभाव न होने से असंभव हो जायगा । किञ्च—ऐसा निवेश करने पर भी वहीं अतिव्याप्ति दोष है । देखिये, त्रित्व से युक्त अनुमिति आदि व्यक्ति में उक्त अभावत्रय है, अतः वहाँ प्रत्यक्ष का लक्षण चला जाने से अतिव्याप्ति हुई । उसकी व्यावृत्ति के लिए आप निवेश करते हैं कि 'कोई भी त्रित्वव्यक्ति जहाँ परिसमाप्त न हो, वह प्रत्यक्ष है।' ऐसा निवेश करने पर भी उक्त अतिव्याप्ति का वारण नहीं होता, कारण वहाँ भी त्रित्वविशिष्ट उक्त विशेषण विद्यमान है । अनुमिति आदि में भी किसी भी त्रित्वव्यक्ति के न होने से त्रित्वलक्षण एक उपाधि से अवच्छिन्न (युक्त) अनुमित्यादि त्रय में अंशतः आत्माश्रय होने के भय से वह त्रित्व तो है नहीं, अन्य त्रित्व है । किन्तु वह भी घट-पटादि अन्य आश्रयों का आदान करके है । केवल उसमें नहीं है, जहाँ उपाधिभूत त्रित्व है, कारण त्रित्वविशिष्ट समुदाय एक है । केवल उन धर्मियों में त्रित्व देखा जाता है, अतः धर्मीमात्र में लक्षण की व्यावृत्ति नहीं हो सकती । त्रित्वविशिष्ट धर्मी में व्यावृत्ति नहीं हो सकती । तस्मात् त्रित्वविशिष्ट में अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है ।
२४६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अभावत्रयञ्च त्रित्वोपाध्यवच्छेदेन समुदिततामुपगतवति विशिष्टे धर्मिणि वर्तते, न स्वविशिष्टे, प्रत्येकमभावत्रयावस्थानस्य तेषु वक्तुमशक्यत्वात् । अथ मन्यसे तादृशस्य विशिष्टस्य प्रमितित्वेनैव व्यवच्छेदः । न ह्यभावत्रयवत् त्रित्वं विशेषणमाश्रयकोटावन्तर्भाव्य तासु धर्मिव्यक्तिषु प्रमितित्वं वर्तते । किन्तु तेषां धर्मिणां स्वरूपमात्रे उक्ताभावत्रयं प्रमितित्वञ्चेत्येतत् यत्रास्ति, तत्प्रत्यक्षमिति हि ब्रूम इति । न; भवताऽपि भिन्नभिन्नधर्मावच्छिन्नस्यैव धर्मिणः प्रमितित्वमभावत्रयवत्त्वं च अवश्यमभ्युपगन्तव्यम् । तथा हि—यदि प्रमितित्वस्य क्वाचित्कत्वे नियामकं नोच्यते, तदा सर्वा प्रमितिः स्यात्, न वा काचिदपि । सर्वत्र सत्ताऽसत्ता वा नियमेऽन्यानपेक्षया । नियामकाद्दि भावानां काचित्कत्वस्य सम्भवः ॥ ४२ ॥ तन्नियामकमाश्रये विशेषणीभूतं वा वक्तव्यम्, उपलक्षणीभूतं वा । आद्ये यदेव प्रमितित्वस्याऽऽश्रयविशेषणं तदेव यद्यभावत्रयस्यापि तस्य, तदा त्रित्वा- वच्छिन्नेऽनुमित्यादावभावत्रयस्य दर्शितत्वात्तत्र च प्रमितित्वेनापि त्रित्वावच्छिन्ने भवितव्यमिति प्रमितित्वान्न तद्व्यवच्छेदः । शब्दादि प्रमितियों के अभावत्रय त्रित्वरूप उपाधिविशिष्ट धर्मी में है, केवल धर्मी में नहीं है । एक-एक में दो अभावों के होने पर भी तीन अभाव नहीं हैं, कारण शब्दप्रमिति से शब्दप्रमितित्व का अभाव नहीं होता । समर्थन—प्रमितित्व के निवेश से ही अनुमिति आदि समुदाय में अतिव्याप्ति का वारण हो जायगा । कारण जैसे उक्त अभावत्रय त्रित्वविशिष्ट धर्मी में है, वैसे प्रमि- तित्व त्रित्वविशिष्ट धर्मी में नहीं है, किन्तु धर्मीमात्र में है । 'उक्त अभावत्रय तथा प्रमितित्व दोनों जहां एक में रहें, वह प्रत्यक्ष है' ऐसा हम कहते हैं । खंडन—आप भी किसी भिन्न धर्म से युक्त ही धर्मी में प्रमितित्व तथा उक्त अभावत्रय को मानेंगे । देखिये—यदि प्रमितित्व के क्वाचित्कत्व में कोई नियामक न कहा जाय, तो वस्तुमात्र ही प्रमिति हो जायगी या कुछ भी प्रमिति नहीं होगा । नियम में यदि अन्य की अपेक्षा न हो, तो सर्वत्र सत्ता या असत्ता हो जायगी । कारण भावों का क्वाचित्कत्व नियामक से होता है, उस नियामक को आश्रय में विशेषण मानेंगे या उपलक्षण ? प्रथम पक्ष में जो प्रमितित्व का नियामक आश्रय में विशेषण है, यदि वही अभावत्रय का नियामक भी आश्रय में विशेषण है, तो
५ परिच्छेद ] नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २४७ अथान्यावच्छिन्ने प्रमितित्वमन्यधर्मावच्छिन्ने चाभावत्रयसम्बन्धः, तदा— नास्ति त्वत्पक्षेऽपि प्रमितित्वस्य एकधर्मविशिष्टाश्रयत्वलक्षणमेकाश्रयत्वम्, विशिष्टेऽपि धर्मिण्याश्रितो धर्म्याश्रित एवेति कृत्वा च प्रमितित्वस्य अभावत्रय- समानाश्रयत्वेऽनुमित्यादित्रयेऽपि प्रसङ्गस्तदवस्थः । नापि द्वितीयः ; उपलक्षणीभूतेन केनचिद्धर्मेण योऽसावुपलक्षितो धर्मी, स एव खलु त्रित्वविशिष्टोऽपि, विशेषणवतोऽपि यावद्विशेष्यवस्तुनो विशेष्यवस्वात्मकत्वात् । यथा दण्ड्यपि पुरुषः पुरुष एव । एवञ्च सत्युपलक्षितादनन्यभूते त्रित्वविशिष्टेऽप्यनु- मित्यादौ प्रमितित्वमाश्रितं नियामकेनोपलक्षणेन उपलक्ष्याभेदव्यवस्थिततया तस्याप्यवच्छिन्नत्वात् । तथा चातिव्याप्तिर्वज्रलेपायिता । तथाप्युपलक्षणेन त्रित्वविशिष्टतया नोपलक्षितोऽसौ धर्मी, किन्तु स्वरूपेणेति चेन्न । उक्तमत्र । यदेव तदुपलक्षितं तदेव विशिष्टमपि । तथापि विशिष्टेन रूपेण त्रित्वविशिष्ट अनुमित्यादि त्रय में उक्त अभावत्रय को दिखा आये हैं और प्रमितित्व भी त्रित्वविशिष्ट अनुमित्यादि में है; कारण दोनों के नियामक एक ही हैं । अतः प्रमितित्वरूप विशेषण से अनुमित्यादि समुदाय में अतिव्याप्ति का वारण नहीं हो सकता । यदि अन्य धर्म से अवच्छिन्न ( नियमित ) आश्रय में प्रमितित्व तथा अन्य धर्म से अवच्छिन्न आश्रय में अभावत्रय मानें, तो आपके पक्ष में भी प्रमितित्व तथा अभाव- त्रय एकधर्मविशिष्ट प्रत्यक्ष में नहीं हैं, अतः असम्भव हो जायगा । यदि कहें कि यद्यपि अवच्छेदक-भेद है, तथापि प्रत्यक्षरूप धर्मी में प्रमितित्व और अभावत्रय दोनों हैं, अतः असम्भव नहीं है, तो अनुमिति आदि त्रय में भी त्रित्वविशिष्ट में अभावत्रय तथा प्रत्येक में अर्थात् प्रत्यक्षत्वविशिष्ट में प्रमितित्व भी है। अतः अतिव्याप्ति वैसी ही है। नियामक आश्रय में उपलक्षण है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं । कारण उपल- क्षणीभूत धर्म से उपलक्षित धर्मी ही त्रित्वरूप विशेषण से विशिष्ट भी है; क्योंकि विशे- षणवान् विशेष्य भी विशेष्यरूप ही होता है; जैसे दण्डीपुरुष भी पुरुष ही है । ऐसा होने पर उपलक्षित में प्रमितित्व होने से उपलक्षित से अनन्यभूत त्रित्वविशिष्ट अनुमिति आदि त्रय में भी प्रमितित्व है । कारण उपलक्ष्य के अभेदरूप से व्यवस्थित होने से त्रित्वविशिष्ट भी नियामक उपलक्षण से अवच्छिन्न है । अतः प्रत्यक्षलक्षण की अनुमित्यादि त्रय में अतिव्याप्ति वज्रलेपतुल्य हो गयी । समर्थन—यद्यपि उपलक्षित से अनन्यभूत त्रित्वविशिष्ट है; तथापि उपलक्षक से त्रित्वविशिष्ट रूप से उपलक्षित नहीं होता, किन्तु केवल धर्मीमात्र उपलक्षित होता है।
२४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तावन्नोपलक्षितमिति चेत्, मोपलक्षि। अविशिष्टे नापि तन्नोपलक्षितमेव; अन्यथा प्रकृतेऽपि वैयधिकरण्यापत्तेः। तदास्तामुल्लसत्पल्लवदलनविलसितेनेति। तदेवं लक्षणान्तरेऽपि प्रतिपादितोऽयं दूषणसमूहः स्वयमूहनीयः। एतदेव परामृश्य भट्टैरिदमुदाहृतम् । लक्षणस्याऽभिधानन्तु केनांशेनोपयुज्यते ॥ ४३ ॥ अन्याभिप्रायोक्तमपि हि तत्सामान्यतोऽप्युपपद्यमानमेवेति । अथ अनुमान-खण्डने अनुमिति-परामर्श-खण्डनम् अनुमानमपि किमुच्यते ? करणपक्षे लिङ्गपरामर्शोऽनुमानमिति चेत्, किं लिङ्गत्वम् ? खंडन—जो उपलक्षित है, वही त्रित्वविशिष्ट भी है। यदि कहें कि त्रित्वविशिष्टरूप से उपलक्षित नहीं है, तो न सही। अविशिष्टरूप से भी तो उपलक्षित नहीं है। अन्यथा यदि अविशिष्टत्व रूप से उपलक्षित में प्रमितित्व मानें, तो अविशिष्टत्व से उपलक्षित में प्रमितित्व तथा प्रत्यक्षत्वादिविशिष्टरूप से उक्त अभावत्रय होने से प्रत्यक्ष में भी भिन्न- अवच्छेद से प्रमितित्व और अभावत्रय है। अतः प्रत्यक्ष में असंभव हो जायगा। तस्मात् शङ्कारूप पल्लव जिसमें उल्लसित हैं, ऐसे वचनों का आडम्बर व्यर्थ है। इसी प्रकार अन्य लक्षणों में भी इन दूषणसमूहों का स्वयं ऊह करना चाहिए। इसी बात को विचारकर भट्टजी ने कहा है कि लक्षण का अभिधान किसी अंश में उपयोगी नहीं है। यद्यपि भट्टजी ने धर्म में नोदना (विधि) ही प्रमाण है या नोदना प्रमाण ही है, प्रत्यक्षादि लक्षण अनुपयोगी हैं—इस प्रस्ताव में यह कहा है, तथापि लक्षण-सामान्य में भी भट्टजी का कथन उपयोगी हो सकता है, क्योंकि लक्षणमात्र उक्त प्रकार से खण्डित हैं। अनुमान-खण्डन के अन्तर्गत अनुमिति और परामर्श का खण्डन खण्डनकर्ता—अनुमान भी क्या वस्तु है? अर्थात् प्रत्यक्ष की तरह ही अनुमान का लक्षण भी वक्ष्यमाण दोषों से बाधित होने के कारण अनुमान भी अनिर्वचनीय ही है। समर्थन—'अनुमीयतेऽनेनेति अनुमानम्' यह करणव्युत्पत्ति-पक्ष स्वीकारकर लिङ्ग- परामर्श को ही अनुमान कहेंगे। खंडन—इस लक्षण के घटक लिङ्ग का निर्वचन होना चाहिए। अतः पहले यह कहिये कि लिङ्ग क्या वस्तु है ?
परिच्छेद ] अनुमिति और परामर्श का खण्डन २४६ व्याप्तस्य पक्षधर्मत्वमिति चेन्न । संशयस्योपलक्षणत्वे तत्र दृष्ट्वाऽपि व्यापकं तत्परामर्शेऽतिप्रसङ्गात् । अत एव न तस्य वर्तमानस्य अतत्कालेऽप्युपलक्षणत्वात् । विशेषणत्वे चानुमाय व्यापकं धर्मिनाशावदप्रवृत्त्यापत्तेः । पक्षधर्माद्धेतोः पक्षांशे विशेष्ये साध्यसिद्धिः, ईदृशश्च वैयधिकरण्यमिष्टमेवे- त्यतो नैवमिति चेन्न । पक्षमादाय वैयधिकरण्ये नियतसामानाधिकरण्य- लक्ष्णव्याप्तिलोपापत्तेः । तथापि विशेष्यमादाय साऽस्त्येवेति चेन्न । साध्यविशेषसिद्धिरपि यत्र निर्वचन— व्याप्तिविशिष्ट धूमादि का पक्षवृत्तित्व ही लिङ्ग है । खण्डन—इस पक्ष में भाव-व्युत्पत्ति के निराशार्थ आपको पक्षवृत्तित्वपदघटित पक्ष-पदार्थ यही कहना होगा कि 'जिस धर्मी में साध्य का सन्देह हो, वह पक्ष है।' एवञ्च यहाँ 'सन्देह' पक्ष में उपलक्षण है या विशेषण ? यदि उपलक्षण मानें, तो जहाँ पर्वत में वह्नि का प्रत्यक्ष होने पर भी धूम का परामर्श होता है, वहाँ धूमपरामर्शी अनुमान तथा धूम लिङ्ग कहा जायगा । 'वर्तमान सन्देह से उपलक्षित धर्मी में वृत्ति व्याप्तिविशिष्ट धूमादि ही लिङ्ग है । प्रकृत स्थल में सन्देह वर्तमान नहीं है, अतः अतिप्रसङ्ग नहीं' यह भी नहीं कह सकते; कारण भूत, भविष्यत् भी [ गुरुटीका, कुरु-क्षेत्र इत्यादि स्थल में ] गुरु, कुरु, उपलक्षण देखे जाते हैं । भावार्थ यह है कि 'वर्तमान' विशेषण ही होता है, उपलक्षण नहीं । अतः यदि सन्देह में 'वर्तमान' विशेषण हो, तो वह सन्देह धर्मी का विशेषण हुआ, उपलक्षण नहीं । फिर यदि सन्देह को धर्मी का विशेषण मान लें, तो वह्नि का अनुमान हो जाने के बाद तदर्थ प्रवृत्ति न होनी चाहिए, कारण धर्मी का नाश होने पर धर्म के लिए प्रवृत्ति नहीं होती । यहां वह्नि की अनुमिति हो जाने पर तो सन्देह नष्ट हो जाने से सन्देहविशिष्ट धर्मी का भी नाश हो ही जाता है । निर्वचन--सन्देहविशिष्ट पर्वत में विद्यमान धूम से केवल पर्वत में वह्नि की अनुमिति होती है और साध्यसिद्धि से सन्देह नष्ट होने पर भी पर्वत विद्यमान ही रहता है । अतः धर्मी के नाश के तुल्य अप्रवृत्ति नहीं होगी । हेतु और साध्य के बीच इस प्रकार का ( हेतु समग्र पक्ष में रहे और साध्य पक्ष के एक अंश धर्मीमात्र में रहे, यह ) वैयधिकरण्य होता हो, तो वह हमें इष्ट ही है । खण्डन—यदि सन्देहविशिष्ट पर्वत में धूम और केवल पर्वत में वह्नि को मानें, तो साधन में नियत-सामानाधिकरण्यरूप साध्य की व्याप्ति ही न रहेगी, अर्थात् व्याप्यसिद्धि हो जायगी । निर्वचन — यदि सन्देहविशिष्ट पर्वत में धूम है, तो केवल पर्वत में है ही; क्योंकि ३२
२५० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम व्याप्तिबलायातं सामान्यं तत्र सामान्यप्रतीत्यपर्यवसानबलादेवेति सामान्यविशेष- सिद्ध्यनुपयोगिनी पक्षधर्मता त्वदिष्ट्रा केवलं सिद्धसाधनपरिहाराय अनुमिति- कारणत्वेनैष्टव्या । सिद्धसाधनञ्च न स्वार्थानुमाने दोष इति नानुमितिमात्रहेतु- निवेशिनी सेति । मोक्षमार्गेहिं— आगमेनानुमानेन ध्यानात्प्रत्यक्षेण च । त्रेधाऽऽत्मनि प्रमाणानां संप्लवः स्वार्थमिष्यते ॥ ४४ ॥—इति । एतेन संशययोग्यताऽपि निरस्ता । व्याप्त्वमिति चेत् ; किं वस्तुगत्या व्याप्यस्य स्वरूपेण परामर्शोऽनुमानं व्याप्यतया वा ? नाद्यः ; अगृहीतव्याप्तिनाऽपि धूमादिपरामर्शस्यानुमानताप्रसङ्गात् । विशिष्ट में वृत्ति धर्म विशेष्य में भी रहता है । अतः पर्वत में साध्य तथा साधन दोनों, रहने से व्याप्ति का विलोप नहीं होगा । खण्डन—फिर भी पक्षधर्मत्व का निवेश व्यर्थ ही है । कारण, पर्वत में व्याप्तिविशिष्ट धूम के ज्ञान से ही वहाँ सामान्यतः वह्नि का ज्ञान होगा और वह सामान्य विशेषज्ञान के बिना अपर्यवसित होने से विशेष वह्नि का भी ज्ञापक हो जायगा । अतः पक्षधर्मत्व के निवेश का सामान्य या विशेषरूप से साध्य की सिद्धि में कोई उपयोग नहीं रहा । अब केवल सिद्धसाधनरूप दोष की निवृत्ति में ही उसका उपयोग कहा जा सकता है । किन्तु सिद्धसाधन स्वार्थानुमान में दोष नहीं है, क्योंकि मुमुक्षुओं के आगम ( श्रवण ), अनुमान ( मनन ) और ध्यान ( निदिध्यासनरूप प्रत्यक्ष ) तीनों आत्मा में होने से प्रमाणत्रय का एक में सङ्कर तथा शब्दसिद्ध आत्मा में अनुमिति भी देखने में आती है । अतः अनुमितिमात्र में पक्षधर्मता को कारण नहीं कहा जा सकता । निर्वचन—'सन्देहयोग्य साध्य से विशिष्ट पर्वतादि पक्ष है तथा उक्त पक्ष में वृत्ति व्याप्तिविशिष्ट धूमादि हेतु ही लिङ्ग है ।' खंडन—व्यापक वह्नि आदि का प्रत्यक्ष होने पर भी धूमादि हेतु का ज्ञान ( परामर्श ) हो जायगा; क्योंकि साध्य का निश्चय होने पर भी साध्य-सन्देह की योग्यता है ही, कारण योग्यता यावद्द्रव्यभावि हुआ करती है । अन्यथा उक्त पक्ष में कालान्तर में भी संशय न होने से अनुमिति न होगी । निर्वचन—'व्याप्तिविशिष्ट लिङ्ग है और उसका परामर्श ही अनुमान है' इतना ही अनुमान का लक्षण कहेंगे । पक्षधर्मत्व का लिङ्गलक्षण में निवेश न रहे, तो क्या
परिच्छेद ] अनुमिति और परामर्श का खण्डन २५१ नापि द्वितीयः ; व्याप्त्युल्लेखिनः प्रमाणस्यानुमानत्वप्रसङ्गात् । तस्यापि व्याप्यत्व- ग्राहिताया अवश्यवक्तव्यत्वात् । अत एव द्वितीय-तृतीयविशेषणे अपि निरस्ते । धारावाहिनि तथात्वापत्तेः । गृहीतव्याप्तिनाऽपि युगपदुभयग्रहणे द्वावेतौ व्याप्यव्यापकाविति परामर्शस्यानु- मानत्वप्रसङ्गात् । न च तदनुमानमेव ; असन्दिग्धतया पक्षत्वाभावेन तद्धर्मस्य हेतोः सिद्धसाधनवदपक्षधर्मत्वात् । स्वार्थानुमाने नाऽयं दोष इति चेन्न । प्रत्यक्षलक्षणोपपत्त्या साक्षात्त्वासाक्षात्त्व- विरोधापत्तेः । हानि है' ? खंडन—क्या वस्तुतः जो हेतु व्याप्तिविशिष्ट है, उसका स्वरूप से परामर्श अनुमान है या व्याप्तिविशिष्टस्वरूप से हेतु का परामर्श अनुमान है ? प्रथम पक्ष में जिस पुरुष को व्याप्तिग्रह न हुआ हो, उसका 'पर्वतो धूमवान्' यह ज्ञान अनुमान हो जायगा । द्वितीय पक्ष में व्याप्ति को विषय करनेवाला 'धूमाग्नी व्याप्तौ' यह ज्ञान भी अनुमान हो जायगा । कारण व्याप्त्युल्लेखी उक्त ज्ञान का व्याप्यत्व भी विषय होता ही है । अतएव (उक्त दोष से ही) 'द्वितीय लिङ्गपरामर्श (यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निः) या तृतीय लिङ्गपरामर्श (धूमवांश्चायम्) अनुमान है' यह कथन भी युक्त नहीं है । किञ्च—धारावाही ज्ञान का द्वितीय या तृतीय 'पर्वतो धूमवान्' यह ज्ञान भी अनुमान हो जायगा । किञ्च—जहाँ व्याप्ति के प्रत्यक्ष के बाद 'धूमवह्नी व्याप्यव्यापकौ' यह मानस-ज्ञान हुआ, तो वह भी अनुमान हो जायगा । 'वह ज्ञान अनुमान ही है' ऐसी इष्टापत्ति नहीं कह सकते; कारण वहाँ साध्य का सन्देह न होने से पर्वत पक्ष नहीं है । अतः उस पर्वत में विद्यमान हेतु, सिद्धसाधनस्थल की तरह, पक्ष का धर्म ही नहीं हो सकता । समर्थन—स्वार्थ-अनुमान में अपक्षधर्मत्व दोष नहीं है । अतः व्याप्तिप्रत्यक्ष के अनन्तर जात 'धूमवह्नी व्याप्यव्यापकौ' यह धूमपरामर्श अनुमान ही है । खंडन—यदि उक्त परामर्श को अनुमान मान लें, तो उसके अनन्तर होनेवाला 'पर्वतो वह्निमान्' यह ज्ञान अनुमानजन्य होने से अनुमिति तथा चक्षु से अन्वित होने से प्रत्यक्ष भी होगा । एवञ्च अनुमितित्व और प्रत्यक्षत्व में सङ्कर हो जायगा । १ परार्थानुमान-स्थल में सिद्धसाधन दोष होने से वहाँ अतिव्याप्ति के वारणार्थ पक्ष- वृत्तित्व का निवेश आवश्यक है । फिर भी यह ग्रन्थ आपाततः है ।
२५२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अव्यापकविषयत्वे सतीति चेन्न । व्याप्यविषयत्वाभावप्रसङ्गात् । व्याप्यत्वं हि सप्रतियोगिकग्रहणम्, तथा चैतस्य व्याप्यमिदमिति गृह्यते । तथा च सति व्यापकस्यापि विशेषणस्य ग्रहणमवश्यं वक्तव्यम् । अन्यथा विशिष्टग्रहणस्य वक्तुमशक्यत्वात् । विशेषतो व्यापकाविषयत्वे सतीति चेन्न । 'अग्निधूमौ व्याप्तावि'त्याप्तोपदेशाद्, वा पूर्वं भूयोगृहीतवह्निधूमसाहचर्यस्य वह्निधूमाग्रहणकाले विमर्शवशाद् वा जाय- मानव्याप्तिग्रहस्य व्याप्यपरामर्शोऽनुमानं स्यात् । न परामर्शः प्रत्ययमात्रं येन प्रथमग्रहणे प्रसङ्गः स्यात् । किन्नाम ? प्रत्यभि- ज्ञानमिति चेन्न । विचारादाप्तोपदेशाद्वा प्रतीत्य व्याप्तिं पुनराप्तोपदेशाद्विचाराद्वा यैव मया व्याप्तिर्गृहीता सैवेयमिति प्रत्यभिजानानस्य व्याप्तिज्ञानमनुमानं स्यात् । विशेषतो व्याप्यविषयत्वे सतीति चेन्न । अव्यापकत्वप्रसङ्गात् । एकव्यक्तिविष- निर्वचन—'व्यापकाविषयक जो व्याप्यपरामर्श वह अनुमान है' ऐसा कहेंगे। खंडन—जो व्यापक को विषय न करे, ऐसा व्याप्यविषयक ज्ञान हो ही नहीं सकता, कारण व्याप्य व्यापक से निरूपित ही होता है । अर्थात् 'इसका यह व्याप्य है' ऐसा ही व्याप्य का ज्ञान होता है । अतः व्याप्ति में विशेषणरूप से व्यापक अवश्य भासता है । अन्यथा विशेषण के भान के बिना विशिष्ट का भान ही न सकेगा । निर्वचन—'जिस ज्ञान का विशेषरूप से व्यापक विषय न हो, ऐसा जो व्याप्य परामर्श वह अनुमान है' ऐसा कहेंगे । खंडन—'धूमाग्नी व्याप्यव्यापकौ' इस आप्त के उपदेश से या पूर्वकाल में जिस पुरुष को बार-बार वह्नि-धूम का साहचर्यज्ञान हुआ हो, उस पुरुष के वह्नि-धूम के अप्रत्यक्षकाल में विचार (तर्क) से जात व्याप्य- परामर्श अनुमान हो जायगा । कारण शाब्द या मानस होने से उक्त ज्ञानों में व्यापक विशेष रूप से नहीं भासता । समर्थन—हम ज्ञानमात्र को नहीं, किन्तु प्रत्यभिज्ञा को परामर्श कहते हैं । उक्त- शाब्द या मानस ज्ञान प्रत्यभिज्ञारूप नहीं हैं, अतः उनमें अनुमान-लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—तब तो विचार या आप्तोपदेश से व्याप्तिज्ञान होने के बाद जायमान विचार या आप्तोपदेश से जो व्याप्ति गृहीत हुई थी, वही यह है' इत्याकारक व्याप्ति-प्रत्यभिज्ञा भी अनुमान हो जायगी । निर्वचन—विशेषरूप से व्याप्यविषयक परामर्श को ही अनुमान कहेंगे । अर्थात् 'जिसका विषय विशेषरूप से व्यापक नहीं हो, वह अनुमान है ।' खण्डन—'विशेष
परिच्छेद ] अनुमिति और परामर्श का खण्डन २५३ यत्त्वस्य व्यक्त्यन्तरेऽसम्भवात् सामान्यतो व्यक्तिविषयत्वस्य चातिप्रसञ्जकत्वात् । किञ्च—धूमवत्त्वादेर्यदा कदाचिदग्निमत्त्वं वा प्रतीयते तदानीं वाऽग्निमत्त्वं पर्वतादेः ? नाद्यः ; तदानीमिव अन्यदाऽप्यग्न्यर्थिप्रवृत्तेस्तत्र प्रसङ्गात् । न द्वितीयः ; तदानीमग्निमत्तया व्याप्त्यनवगमात् । तदेति धूमकालोऽपेक्षित इति चेन्न । क्वचिद्देशेऽन्यदाऽपि धूमस्यावस्थान- मस्तीति कालान्तरस्यापि धूमकालत्वात् । तद्धूमकालोऽपेक्षित इति चेन्न । तच्छब्दस्य व्यक्तिविशेषवचनत्वे अप्रतीतव्याप्तिकत्वम्, यत्किञ्चिद्व्यक्तिवचनत्वे चोक्तदोषापत्तिः । रूप से व्याप्यविषयक हो' इस वाक्य का क्या पर्वतादिनिष्ठ तत्तद् धूमादिविषयक हो, यह अर्थ विवक्षित है या सामान्यतः व्यक्तित्वाधिकरण-विषयक हो, यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में अरण्यादिगत धूम-परामर्श में अव्याप्ति हो जायगी, कारण लक्षण में पर्वतगत धूमव्याप्ति विशेष होने से अरण्यगत धूम में उक्त लक्षण का असम्भव है । द्वितीय पक्ष में सामान्यतः व्यक्तित्वाधिकरण प्रत्यभिज्ञान का भी विषय है, अतः पूर्वोक्त प्रत्यभिज्ञा में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—धूम से पर्वत में जिस किसी काल से सम्बद्ध वह्नि की प्रतीति होती है या उसी काल से सम्बद्ध वह्नि की ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण जैसे उस काल में अग्नि के लिए मनुष्यों की प्रवृत्ति होती है, वैसे ही अन्यकाल में भी होने लगेगी। द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं; कारण तात्कालिकत्वरूप से अग्नि की धूम वे व्याप्ति नहीं है, किन्तु अग्नित्वरूप से ही अग्नि की धूम में व्याप्ति है । निर्वचन—'यदा यदा धूमस्तदा तदा वह्निः' ईदृश व्याप्तिग्रह में काल भासता ही है, अतः धूमकालिक अग्नि की अनुमिति हो ही सकती है। खंडन—किसी देश में दूसरे काल में भी धूम रहता है, अतः अन्य काल भी धूमकाल होने से उस काल में भी अग्न्यर्थी की प्रवृत्ति होनी चाहिए । निर्वचन—'तद्-शब्द परामर्शविषय धूमपरक है, अतः अन्य काल में अग्न्यर्थी की प्रवृत्ति नहीं होगी। खंडन—यदि तद्-शब्द को परामर्शविषय तत्-तद् धूमव्यक्तिपरक मानें, तो तत्तद् धूमव्यक्तिविशेष में तो विशेषरूप से व्याप्तिग्रह है नहीं। फिर अनुमिति में उस काल का स्फुरण कैसे होगा ? यदि तद्-शब्द को जिस व्यक्ति में व्याप्तिग्रह हुआ है, उस व्यक्तिपरक मानें, तो सम्भव है कि अन्य काल में विद्यमान धूम में भी,