खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अनुमिति और परामर्श का खण्डन २५३ यत्त्वस्य व्यक्त्यन्तरेऽसम्भवात् सामान्यतो व्यक्तिविषयत्वस्य चातिप्रसञ्जकत्वात् । किञ्च—धूमवत्त्वादेर्यदा कदाचिदग्निमत्त्वं वा प्रतीयते तदानीं वाऽग्निमत्त्वं पर्वतादेः ? नाद्यः ; तदानीमिव अन्यदाऽप्यग्न्यर्थिप्रवृत्तेस्तत्र प्रसङ्गात् । न द्वितीयः ; तदानीमग्निमत्तया व्याप्त्यनवगमात् । तदेति धूमकालोऽपेक्षित इति चेन्न । क्वचिद्देशेऽन्यदाऽपि धूमस्यावस्थान- मस्तीति कालान्तरस्यापि धूमकालत्वात् । तद्धूमकालोऽपेक्षित इति चेन्न । तच्छब्दस्य व्यक्तिविशेषवचनत्वे अप्रतीतव्याप्तिकत्वम्, यत्किञ्चिद्व्यक्तिवचनत्वे चोक्तदोषापत्तिः । रूप से व्याप्यविषयक हो' इस वाक्य का क्या पर्वतादिनिष्ठ तत्तद् धूमादिविषयक हो, यह अर्थ विवक्षित है या सामान्यतः व्यक्तित्वाधिकरण-विषयक हो, यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में अरण्यादिगत धूम-परामर्श में अव्याप्ति हो जायगी, कारण लक्षण में पर्वतगत धूमव्याप्ति विशेष होने से अरण्यगत धूम में उक्त लक्षण का असम्भव है । द्वितीय पक्ष में सामान्यतः व्यक्तित्वाधिकरण प्रत्यभिज्ञान का भी विषय है, अतः पूर्वोक्त प्रत्यभिज्ञा में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—धूम से पर्वत में जिस किसी काल से सम्बद्ध वह्नि की प्रतीति होती है या उसी काल से सम्बद्ध वह्नि की ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण जैसे उस काल में अग्नि के लिए मनुष्यों की प्रवृत्ति होती है, वैसे ही अन्यकाल में भी होने लगेगी। द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं; कारण तात्कालिकत्वरूप से अग्नि की धूम वे व्याप्ति नहीं है, किन्तु अग्नित्वरूप से ही अग्नि की धूम में व्याप्ति है । निर्वचन—'यदा यदा धूमस्तदा तदा वह्निः' ईदृश व्याप्तिग्रह में काल भासता ही है, अतः धूमकालिक अग्नि की अनुमिति हो ही सकती है। खंडन—किसी देश में दूसरे काल में भी धूम रहता है, अतः अन्य काल भी धूमकाल होने से उस काल में भी अग्न्यर्थी की प्रवृत्ति होनी चाहिए । निर्वचन—'तद्-शब्द परामर्शविषय धूमपरक है, अतः अन्य काल में अग्न्यर्थी की प्रवृत्ति नहीं होगी। खंडन—यदि तद्-शब्द को परामर्शविषय तत्-तद् धूमव्यक्तिपरक मानें, तो तत्तद् धूमव्यक्तिविशेष में तो विशेषरूप से व्याप्तिग्रह है नहीं। फिर अनुमिति में उस काल का स्फुरण कैसे होगा ? यदि तद्-शब्द को जिस व्यक्ति में व्याप्तिग्रह हुआ है, उस व्यक्तिपरक मानें, तो सम्भव है कि अन्य काल में विद्यमान धूम में भी,