भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

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२५२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अव्यापकविषयत्वे सतीति चेन्न । व्याप्यविषयत्वाभावप्रसङ्गात् । व्याप्यत्वं हि सप्रतियोगिकग्रहणम्, तथा चैतस्य व्याप्यमिदमिति गृह्यते । तथा च सति व्यापकस्यापि विशेषणस्य ग्रहणमवश्यं वक्तव्यम् । अन्यथा विशिष्टग्रहणस्य वक्तुमशक्यत्वात् । विशेषतो व्यापकाविषयत्वे सतीति चेन्न । 'अग्निधूमौ व्याप्तावि'त्याप्तोपदेशाद्, वा पूर्वं भूयोगृहीतवह्निधूमसाहचर्यस्य वह्निधूमाग्रहणकाले विमर्शवशाद् वा जाय- मानव्याप्तिग्रहस्य व्याप्यपरामर्शोऽनुमानं स्यात् । न परामर्शः प्रत्ययमात्रं येन प्रथमग्रहणे प्रसङ्गः स्यात् । किन्न‍ाम ? प्रत्यभि- ज्ञानमिति चेन्न । विचारादाप्तोपदेशाद्वा प्रतीत्य व्याप्तिं पुनराप्तोपदेशाद्विचाराद्वा यैव मया व्याप्तिर्गृहीता सैवेयमिति प्रत्यभिजानानस्य व्याप्तिज्ञानमनुमानं स्यात् । विशेषतो व्याप्यविषयत्वे सतीति चेन्न । अव्यापकत्वप्रसङ्गात् । एकव्यक्तिविष- निर्वचन—'व्यापकाविषयक जो व्याप्यपरामर्श वह अनुमान है' ऐसा कहेंगे। खंडन—जो व्यापक को विषय न करे, ऐसा व्याप्यविषयक ज्ञान हो ही नहीं सकता, कारण व्याप्य व्यापक से निरूपित ही होता है । अर्थात् 'इसका यह व्याप्य है' ऐसा ही व्याप्य का ज्ञान होता है । अतः व्याप्ति में विशेषणरूप से व्यापक अवश्य भासता है । अन्यथा विशेषण के भान के बिना विशिष्ट का भान ही न सकेगा । निर्वचन—'जिस ज्ञान का विशेषरूप से व्यापक विषय न हो, ऐसा जो व्याप्य परामर्श वह अनुमान है' ऐसा कहेंगे । खंडन—'धूमाग्नी व्याप्यव्यापकौ' इस आप्त के उपदेश से या पूर्वकाल में जिस पुरुष को बार-बार वह्नि-धूम का साहचर्यज्ञान हुआ हो, उस पुरुष के वह्नि-धूम के अप्रत्यक्षकाल में विचार (तर्क) से जात व्याप्य- परामर्श अनुमान हो जायगा । कारण शाब्द या मानस होने से उक्त ज्ञानों में व्यापक विशेष रूप से नहीं भासता । समर्थन—हम ज्ञानमात्र को नहीं, किन्तु प्रत्यभिज्ञा को परामर्श कहते हैं । उक्त- शाब्द या मानस ज्ञान प्रत्यभिज्ञारूप नहीं हैं, अतः उनमें अनुमान-लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—तब तो विचार या आप्तोपदेश से व्याप्तिज्ञान होने के बाद जायमान विचार या आप्तोपदेश से जो व्याप्ति गृहीत हुई थी, वही यह है' इत्याकारक व्याप्ति-प्रत्यभिज्ञा भी अनुमान हो जायगी । निर्वचन—विशेषरूप से व्याप्यविषयक परामर्श को ही अनुमान कहेंगे । अर्थात् 'जिसका विषय विशेषरूप से व्यापक नहीं हो, वह अनुमान है ।' खण्डन—'विशेष