भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

परिच्छेद ] अनुमिति और परामर्श का खण्डन २५१ नापि द्वितीयः ; व्याप्त्युल्लेखिनः प्रमाणस्यानुमानत्वप्रसङ्गात् । तस्यापि व्याप्यत्व- ग्राहिताया अवश्यवक्तव्यत्वात् । अत एव द्वितीय-तृतीयविशेषणे अपि निरस्ते । धारावाहिनि तथात्वापत्तेः । गृहीतव्याप्तिनाऽपि युगपदुभयग्रहणे द्वावेतौ व्याप्यव्यापकाविति परामर्शस्यानु- मानत्वप्रसङ्गात् । न च तदनुमानमेव ; असन्दिग्धतया पक्षत्वाभावेन तद्धर्मस्य हेतोः सिद्धसाधनवदपक्षधर्मत्वात् । स्वार्थानुमाने नाऽयं दोष इति चेन्न । प्रत्यक्षलक्षणोपपत्त्या साक्षात्त्वासाक्षात्त्व- विरोधापत्तेः । हानि है' ? खंडन—क्या वस्तुतः जो हेतु व्याप्तिविशिष्ट है, उसका स्वरूप से परामर्श अनुमान है या व्याप्तिविशिष्टस्वरूप से हेतु का परामर्श अनुमान है ? प्रथम पक्ष में जिस पुरुष को व्याप्तिग्रह न हुआ हो, उसका 'पर्वतो धूमवान्' यह ज्ञान अनुमान हो जायगा । द्वितीय पक्ष में व्याप्ति को विषय करनेवाला 'धूमाग्नी व्याप्तौ' यह ज्ञान भी अनुमान हो जायगा । कारण व्याप्त्युल्लेखी उक्त ज्ञान का व्याप्यत्व भी विषय होता ही है । अतएव (उक्त दोष से ही) 'द्वितीय लिङ्गपरामर्श (यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निः) या तृतीय लिङ्गपरामर्श (धूमवांश्चायम्) अनुमान है' यह कथन भी युक्त नहीं है । किञ्च—धारावाही ज्ञान का द्वितीय या तृतीय 'पर्वतो धूमवान्' यह ज्ञान भी अनुमान हो जायगा । किञ्च—जहाँ व्याप्ति के प्रत्यक्ष के बाद 'धूमवह्नी व्याप्यव्यापकौ' यह मानस-ज्ञान हुआ, तो वह भी अनुमान हो जायगा । 'वह ज्ञान अनुमान ही है' ऐसी इष्टापत्ति नहीं कह सकते; कारण वहाँ साध्य का सन्देह न होने से पर्वत पक्ष नहीं है । अतः उस पर्वत में विद्यमान हेतु, सिद्धसाधनस्थल की तरह, पक्ष का धर्म ही नहीं हो सकता । समर्थन—स्वार्थ-अनुमान में अपक्षधर्मत्व दोष नहीं है । अतः व्याप्तिप्रत्यक्ष के अनन्तर जात 'धूमवह्नी व्याप्यव्यापकौ' यह धूमपरामर्श अनुमान ही है । खंडन—यदि उक्त परामर्श को अनुमान मान लें, तो उसके अनन्तर होनेवाला 'पर्वतो वह्निमान्' यह ज्ञान अनुमानजन्य होने से अनुमिति तथा चक्षु से अन्वित होने से प्रत्यक्ष भी होगा । एवञ्च अनुमितित्व और प्रत्यक्षत्व में सङ्कर हो जायगा । १ परार्थानुमान-स्थल में सिद्धसाधन दोष होने से वहाँ अतिव्याप्ति के वारणार्थ पक्ष- वृत्तित्व का निवेश आवश्यक है । फिर भी यह ग्रन्थ आपाततः है ।