भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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२५० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम व्याप्तिबलायातं सामान्यं तत्र सामान्यप्रतीत्यपर्यवसानबलादेवेति सामान्यविशेष- सिद्ध्यनुपयोगिनी पक्षधर्मता त्वदिष्ट्रा केवलं सिद्धसाधनपरिहाराय अनुमिति- कारणत्वेनैष्टव्या । सिद्धसाधनञ्च न स्वार्थानुमाने दोष इति नानुमितिमात्रहेतु- निवेशिनी सेति । मोक्षमार्गेहिं— आगमेनानुमानेन ध्यानात्प्रत्यक्षेण च । त्रेधाऽऽत्मनि प्रमाणानां संप्लवः स्वार्थमिष्यते ॥ ४४ ॥—इति । एतेन संशययोग्यताऽपि निरस्ता । व्याप्त्वमिति चेत् ; किं वस्तुगत्या व्याप्यस्य स्वरूपेण परामर्शोऽनुमानं व्याप्यतया वा ? नाद्यः ; अगृहीतव्याप्तिनाऽपि धूमादिपरामर्शस्यानुमानताप्रसङ्गात् । विशिष्ट में वृत्ति धर्म विशेष्य में भी रहता है । अतः पर्वत में साध्य तथा साधन दोनों, रहने से व्याप्ति का विलोप नहीं होगा । खण्डन—फिर भी पक्षधर्मत्व का निवेश व्यर्थ ही है । कारण, पर्वत में व्याप्तिविशिष्ट धूम के ज्ञान से ही वहाँ सामान्यतः वह्नि का ज्ञान होगा और वह सामान्य विशेषज्ञान के बिना अपर्यवसित होने से विशेष वह्नि का भी ज्ञापक हो जायगा । अतः पक्षधर्मत्व के निवेश का सामान्य या विशेषरूप से साध्य की सिद्धि में कोई उपयोग नहीं रहा । अब केवल सिद्धसाधनरूप दोष की निवृत्ति में ही उसका उपयोग कहा जा सकता है । किन्तु सिद्धसाधन स्वार्थानुमान में दोष नहीं है, क्योंकि मुमुक्षुओं के आगम ( श्रवण ), अनुमान ( मनन ) और ध्यान ( निदिध्यासनरूप प्रत्यक्ष ) तीनों आत्मा में होने से प्रमाणत्रय का एक में सङ्कर तथा शब्दसिद्ध आत्मा में अनुमिति भी देखने में आती है । अतः अनुमितिमात्र में पक्षधर्मता को कारण नहीं कहा जा सकता । निर्वचन—'सन्देहयोग्य साध्य से विशिष्ट पर्वतादि पक्ष है तथा उक्त पक्ष में वृत्ति व्याप्तिविशिष्ट धूमादि हेतु ही लिङ्ग है ।' खंडन—व्यापक वह्नि आदि का प्रत्यक्ष होने पर भी धूमादि हेतु का ज्ञान ( परामर्श ) हो जायगा; क्योंकि साध्य का निश्चय होने पर भी साध्य-सन्देह की योग्यता है ही, कारण योग्यता यावद्द्रव्यभावि हुआ करती है । अन्यथा उक्त पक्ष में कालान्तर में भी संशय न होने से अनुमिति न होगी । निर्वचन—'व्याप्तिविशिष्ट लिङ्ग है और उसका परामर्श ही अनुमान है' इतना ही अनुमान का लक्षण कहेंगे । पक्षधर्मत्व का लिङ्गलक्षण में निवेश न रहे, तो क्या