खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 266, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अनुमिति और परामर्श का खण्डन २४६ व्याप्तस्य पक्षधर्मत्वमिति चेन्न । संशयस्योपलक्षणत्वे तत्र दृष्ट्वाऽपि व्यापकं तत्परामर्शेऽतिप्रसङ्गात् । अत एव न तस्य वर्तमानस्य अतत्कालेऽप्युपलक्षणत्वात् । विशेषणत्वे चानुमाय व्यापकं धर्मिनाशावदप्रवृत्त्यापत्तेः । पक्षधर्माद्धेतोः पक्षांशे विशेष्ये साध्यसिद्धिः, ईदृशश्च वैयधिकरण्यमिष्टमेवे- त्यतो नैवमिति चेन्न । पक्षमादाय वैयधिकरण्ये नियतसामानाधिकरण्य- लक्ष्णव्याप्तिलोपापत्तेः । तथापि विशेष्यमादाय साऽस्त्येवेति चेन्न । साध्यविशेषसिद्धिरपि यत्र निर्वचन— व्याप्तिविशिष्ट धूमादि का पक्षवृत्तित्व ही लिङ्ग है । खण्डन—इस पक्ष में भाव-व्युत्पत्ति के निराशार्थ आपको पक्षवृत्तित्वपदघटित पक्ष-पदार्थ यही कहना होगा कि 'जिस धर्मी में साध्य का सन्देह हो, वह पक्ष है।' एवञ्च यहाँ 'सन्देह' पक्ष में उपलक्षण है या विशेषण ? यदि उपलक्षण मानें, तो जहाँ पर्वत में वह्नि का प्रत्यक्ष होने पर भी धूम का परामर्श होता है, वहाँ धूमपरामर्शी अनुमान तथा धूम लिङ्ग कहा जायगा । 'वर्तमान सन्देह से उपलक्षित धर्मी में वृत्ति व्याप्तिविशिष्ट धूमादि ही लिङ्ग है । प्रकृत स्थल में सन्देह वर्तमान नहीं है, अतः अतिप्रसङ्ग नहीं' यह भी नहीं कह सकते; कारण भूत, भविष्यत् भी [ गुरुटीका, कुरु-क्षेत्र इत्यादि स्थल में ] गुरु, कुरु, उपलक्षण देखे जाते हैं । भावार्थ यह है कि 'वर्तमान' विशेषण ही होता है, उपलक्षण नहीं । अतः यदि सन्देह में 'वर्तमान' विशेषण हो, तो वह सन्देह धर्मी का विशेषण हुआ, उपलक्षण नहीं । फिर यदि सन्देह को धर्मी का विशेषण मान लें, तो वह्नि का अनुमान हो जाने के बाद तदर्थ प्रवृत्ति न होनी चाहिए, कारण धर्मी का नाश होने पर धर्म के लिए प्रवृत्ति नहीं होती । यहां वह्नि की अनुमिति हो जाने पर तो सन्देह नष्ट हो जाने से सन्देहविशिष्ट धर्मी का भी नाश हो ही जाता है । निर्वचन--सन्देहविशिष्ट पर्वत में विद्यमान धूम से केवल पर्वत में वह्नि की अनुमिति होती है और साध्यसिद्धि से सन्देह नष्ट होने पर भी पर्वत विद्यमान ही रहता है । अतः धर्मी के नाश के तुल्य अप्रवृत्ति नहीं होगी । हेतु और साध्य के बीच इस प्रकार का ( हेतु समग्र पक्ष में रहे और साध्य पक्ष के एक अंश धर्मीमात्र में रहे, यह ) वैयधिकरण्य होता हो, तो वह हमें इष्ट ही है । खण्डन—यदि सन्देहविशिष्ट पर्वत में धूम और केवल पर्वत में वह्नि को मानें, तो साधन में नियत-सामानाधिकरण्यरूप साध्य की व्याप्ति ही न रहेगी, अर्थात् व्याप्यसिद्धि हो जायगी । निर्वचन — यदि सन्देहविशिष्ट पर्वत में धूम है, तो केवल पर्वत में है ही; क्योंकि ३२