खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तावन्नोपलक्षितमिति चेत्, मोपलक्षि। अविशिष्टे नापि तन्नोपलक्षितमेव; अन्यथा प्रकृतेऽपि वैयधिकरण्यापत्तेः। तदास्तामुल्लसत्पल्लवदलनविलसितेनेति। तदेवं लक्षणान्तरेऽपि प्रतिपादितोऽयं दूषणसमूहः स्वयमूहनीयः। एतदेव परामृश्य भट्टैरिदमुदाहृतम् । लक्षणस्याऽभिधानन्तु केनांशेनोपयुज्यते ॥ ४३ ॥ अन्याभिप्रायोक्तमपि हि तत्सामान्यतोऽप्युपपद्यमानमेवेति । अथ अनुमान-खण्डने अनुमिति-परामर्श-खण्डनम् अनुमानमपि किमुच्यते ? करणपक्षे लिङ्गपरामर्शोऽनुमानमिति चेत्, किं लिङ्गत्वम् ? खंडन—जो उपलक्षित है, वही त्रित्वविशिष्ट भी है। यदि कहें कि त्रित्वविशिष्टरूप से उपलक्षित नहीं है, तो न सही। अविशिष्टरूप से भी तो उपलक्षित नहीं है। अन्यथा यदि अविशिष्टत्व रूप से उपलक्षित में प्रमितित्व मानें, तो अविशिष्टत्व से उपलक्षित में प्रमितित्व तथा प्रत्यक्षत्वादिविशिष्टरूप से उक्त अभावत्रय होने से प्रत्यक्ष में भी भिन्न- अवच्छेद से प्रमितित्व और अभावत्रय है। अतः प्रत्यक्ष में असंभव हो जायगा। तस्मात् शङ्कारूप पल्लव जिसमें उल्लसित हैं, ऐसे वचनों का आडम्बर व्यर्थ है। इसी प्रकार अन्य लक्षणों में भी इन दूषणसमूहों का स्वयं ऊह करना चाहिए। इसी बात को विचारकर भट्टजी ने कहा है कि लक्षण का अभिधान किसी अंश में उपयोगी नहीं है। यद्यपि भट्टजी ने धर्म में नोदना (विधि) ही प्रमाण है या नोदना प्रमाण ही है, प्रत्यक्षादि लक्षण अनुपयोगी हैं—इस प्रस्ताव में यह कहा है, तथापि लक्षण-सामान्य में भी भट्टजी का कथन उपयोगी हो सकता है, क्योंकि लक्षणमात्र उक्त प्रकार से खण्डित हैं। अनुमान-खण्डन के अन्तर्गत अनुमिति और परामर्श का खण्डन खण्डनकर्ता—अनुमान भी क्या वस्तु है? अर्थात् प्रत्यक्ष की तरह ही अनुमान का लक्षण भी वक्ष्यमाण दोषों से बाधित होने के कारण अनुमान भी अनिर्वचनीय ही है। समर्थन—'अनुमीयतेऽनेनेति अनुमानम्' यह करणव्युत्पत्ति-पक्ष स्वीकारकर लिङ्ग- परामर्श को ही अनुमान कहेंगे। खंडन—इस लक्षण के घटक लिङ्ग का निर्वचन होना चाहिए। अतः पहले यह कहिये कि लिङ्ग क्या वस्तु है ?