खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 264, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें५ परिच्छेद ] नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २४७ अथान्यावच्छिन्ने प्रमितित्वमन्यधर्मावच्छिन्ने चाभावत्रयसम्बन्धः, तदा— नास्ति त्वत्पक्षेऽपि प्रमितित्वस्य एकधर्मविशिष्टाश्रयत्वलक्षणमेकाश्रयत्वम्, विशिष्टेऽपि धर्मिण्याश्रितो धर्म्याश्रित एवेति कृत्वा च प्रमितित्वस्य अभावत्रय- समानाश्रयत्वेऽनुमित्यादित्रयेऽपि प्रसङ्गस्तदवस्थः । नापि द्वितीयः ; उपलक्षणीभूतेन केनचिद्धर्मेण योऽसावुपलक्षितो धर्मी, स एव खलु त्रित्वविशिष्टोऽपि, विशेषणवतोऽपि यावद्विशेष्यवस्तुनो विशेष्यवस्वात्मकत्वात् । यथा दण्ड्यपि पुरुषः पुरुष एव । एवञ्च सत्युपलक्षितादनन्यभूते त्रित्वविशिष्टेऽप्यनु- मित्यादौ प्रमितित्वमाश्रितं नियामकेनोपलक्षणेन उपलक्ष्याभेदव्यवस्थिततया तस्याप्यवच्छिन्नत्वात् । तथा चातिव्याप्तिर्वज्रलेपायिता । तथाप्युपलक्षणेन त्रित्वविशिष्टतया नोपलक्षितोऽसौ धर्मी, किन्तु स्वरूपेणेति चेन्न । उक्तमत्र । यदेव तदुपलक्षितं तदेव विशिष्टमपि । तथापि विशिष्टेन रूपेण त्रित्वविशिष्ट अनुमित्यादि त्रय में उक्त अभावत्रय को दिखा आये हैं और प्रमितित्व भी त्रित्वविशिष्ट अनुमित्यादि में है; कारण दोनों के नियामक एक ही हैं । अतः प्रमितित्वरूप विशेषण से अनुमित्यादि समुदाय में अतिव्याप्ति का वारण नहीं हो सकता । यदि अन्य धर्म से अवच्छिन्न ( नियमित ) आश्रय में प्रमितित्व तथा अन्य धर्म से अवच्छिन्न आश्रय में अभावत्रय मानें, तो आपके पक्ष में भी प्रमितित्व तथा अभाव- त्रय एकधर्मविशिष्ट प्रत्यक्ष में नहीं हैं, अतः असम्भव हो जायगा । यदि कहें कि यद्यपि अवच्छेदक-भेद है, तथापि प्रत्यक्षरूप धर्मी में प्रमितित्व और अभावत्रय दोनों हैं, अतः असम्भव नहीं है, तो अनुमिति आदि त्रय में भी त्रित्वविशिष्ट में अभावत्रय तथा प्रत्येक में अर्थात् प्रत्यक्षत्वविशिष्ट में प्रमितित्व भी है। अतः अतिव्याप्ति वैसी ही है। नियामक आश्रय में उपलक्षण है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं । कारण उपल- क्षणीभूत धर्म से उपलक्षित धर्मी ही त्रित्वरूप विशेषण से विशिष्ट भी है; क्योंकि विशे- षणवान् विशेष्य भी विशेष्यरूप ही होता है; जैसे दण्डीपुरुष भी पुरुष ही है । ऐसा होने पर उपलक्षित में प्रमितित्व होने से उपलक्षित से अनन्यभूत त्रित्वविशिष्ट अनुमिति आदि त्रय में भी प्रमितित्व है । कारण उपलक्ष्य के अभेदरूप से व्यवस्थित होने से त्रित्वविशिष्ट भी नियामक उपलक्षण से अवच्छिन्न है । अतः प्रत्यक्षलक्षण की अनुमित्यादि त्रय में अतिव्याप्ति वज्रलेपतुल्य हो गयी । समर्थन—यद्यपि उपलक्षित से अनन्यभूत त्रित्वविशिष्ट है; तथापि उपलक्षक से त्रित्वविशिष्ट रूप से उपलक्षित नहीं होता, किन्तु केवल धर्मीमात्र उपलक्षित होता है।