भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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२४६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अभावत्रयञ्च त्रित्वोपाध्यवच्छेदेन समुदिततामुपगतवति विशिष्टे धर्मिणि वर्तते, न स्वविशिष्टे, प्रत्येकमभावत्रयावस्थानस्य तेषु वक्तुमशक्यत्वात् । अथ मन्यसे तादृशस्य विशिष्टस्य प्रमितित्वेनैव व्यवच्छेदः । न ह्यभावत्रयवत् त्रित्वं विशेषणमाश्रयकोटावन्तर्भाव्य तासु धर्मिव्यक्तिषु प्रमितित्वं वर्तते । किन्तु तेषां धर्मिणां स्वरूपमात्रे उक्ताभावत्रयं प्रमितित्वञ्चेत्येतत् यत्रास्ति, तत्प्रत्यक्षमिति हि ब्रूम इति । न; भवताऽपि भिन्नभिन्नधर्मावच्छिन्नस्यैव धर्मिणः प्रमितित्वमभावत्रयवत्त्वं च अवश्यमभ्युपगन्तव्यम् । तथा हि—यदि प्रमितित्वस्य क्वाचित्कत्वे नियामकं नोच्यते, तदा सर्वा प्रमितिः स्यात्, न वा काचिदपि । सर्वत्र सत्ताऽसत्ता वा नियमेऽन्यानपेक्षया । नियामकाद्दि भावानां काचित्कत्वस्य सम्भवः ॥ ४२ ॥ तन्नियामकमाश्रये विशेषणीभूतं वा वक्तव्यम्, उपलक्षणीभूतं वा । आद्ये यदेव प्रमितित्वस्याऽऽश्रयविशेषणं तदेव यद्यभावत्रयस्यापि तस्य, तदा त्रित्वा- वच्छिन्नेऽनुमित्यादावभावत्रयस्य दर्शितत्वात्तत्र च प्रमितित्वेनापि त्रित्वावच्छिन्ने भवितव्यमिति प्रमितित्वान्न तद्व्यवच्छेदः । शब्दादि प्रमितियों के अभावत्रय त्रित्वरूप उपाधिविशिष्ट धर्मी में है, केवल धर्मी में नहीं है । एक-एक में दो अभावों के होने पर भी तीन अभाव नहीं हैं, कारण शब्दप्रमिति से शब्दप्रमितित्व का अभाव नहीं होता । समर्थन—प्रमितित्व के निवेश से ही अनुमिति आदि समुदाय में अतिव्याप्ति का वारण हो जायगा । कारण जैसे उक्त अभावत्रय त्रित्वविशिष्ट धर्मी में है, वैसे प्रमि- तित्व त्रित्वविशिष्ट धर्मी में नहीं है, किन्तु धर्मीमात्र में है । 'उक्त अभावत्रय तथा प्रमितित्व दोनों जहां एक में रहें, वह प्रत्यक्ष है' ऐसा हम कहते हैं । खंडन—आप भी किसी भिन्न धर्म से युक्त ही धर्मी में प्रमितित्व तथा उक्त अभावत्रय को मानेंगे । देखिये—यदि प्रमितित्व के क्वाचित्कत्व में कोई नियामक न कहा जाय, तो वस्तुमात्र ही प्रमिति हो जायगी या कुछ भी प्रमिति नहीं होगा । नियम में यदि अन्य की अपेक्षा न हो, तो सर्वत्र सत्ता या असत्ता हो जायगी । कारण भावों का क्वाचित्कत्व नियामक से होता है, उस नियामक को आश्रय में विशेषण मानेंगे या उपलक्षण ? प्रथम पक्ष में जो प्रमितित्व का नियामक आश्रय में विशेषण है, यदि वही अभावत्रय का नियामक भी आश्रय में विशेषण है, तो