खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २४५ भवताऽभ्युपगम्यत्वात् । अन्यथा प्रत्यक्षव्यक्तयस्तिस्रो न स्युः, तदेव हि त्रिरभि- धीयते यत्र त्रित्वं परिसमाप्यते । किञ्च—तथापि स एवातिव्यापकतादोषः । त्रित्वेनावच्छिन्नासु अनुमित्यादि- व्यक्तिषु त्वदभिहितमभावत्रयमस्तीति तत्र प्रत्यक्षलक्षणं गतमित्यतिव्याप्तिरुक्ता, तद्व्यावर्तनाय भवताऽभिधीयते—काचिदपि त्रित्वव्यक्तिर्यत्र न समाप्यत इति । न चैवमुक्ते साऽतिव्याप्तिर्निवर्तते, तत्राप्युक्तविशेषणस्य विद्यमानत्वात् । न हि त्रित्वावच्छिन्ने तस्मिन् त्रित्वव्यक्तिः काचिदपि समाप्यते, त्रित्वलक्षणैकोपाध्य- वच्छिन्ने तस्मिन् त्रित्वव्यक्त्यन्तरं भवदप्याश्रयान्तरमादाय वर्तते, न तु तत्रैव परिसमाप्यते । यत्र चोक्तमुपाधिभूतं त्रित्वं तेषु यदि त्रित्वसमाप्तिर्धर्मिषु दृश्येत, तदा तद्दर्शनेन तत्र धर्मिमात्रे लक्षणाव्यावृत्तिः सिद्धयेत्, न तु त्रित्वविशिष्टे धर्मिणि । तस्मादतिव्यापकत्वं तदवस्थमेव । मत में कैसे होगा ? कारण, वे ही तीन हैं, जिनमें त्रित्वसंख्या परिसमाप्त हो । अतः प्रत्यक्ष में भी सभी त्रित्वों का अभाव न होने से असंभव हो जायगा । किञ्च—ऐसा निवेश करने पर भी वहीं अतिव्याप्ति दोष है । देखिये, त्रित्व से युक्त अनुमिति आदि व्यक्ति में उक्त अभावत्रय है, अतः वहाँ प्रत्यक्ष का लक्षण चला जाने से अतिव्याप्ति हुई । उसकी व्यावृत्ति के लिए आप निवेश करते हैं कि 'कोई भी त्रित्वव्यक्ति जहाँ परिसमाप्त न हो, वह प्रत्यक्ष है।' ऐसा निवेश करने पर भी उक्त अतिव्याप्ति का वारण नहीं होता, कारण वहाँ भी त्रित्वविशिष्ट उक्त विशेषण विद्यमान है । अनुमिति आदि में भी किसी भी त्रित्वव्यक्ति के न होने से त्रित्वलक्षण एक उपाधि से अवच्छिन्न (युक्त) अनुमित्यादि त्रय में अंशतः आत्माश्रय होने के भय से वह त्रित्व तो है नहीं, अन्य त्रित्व है । किन्तु वह भी घट-पटादि अन्य आश्रयों का आदान करके है । केवल उसमें नहीं है, जहाँ उपाधिभूत त्रित्व है, कारण त्रित्वविशिष्ट समुदाय एक है । केवल उन धर्मियों में त्रित्व देखा जाता है, अतः धर्मीमात्र में लक्षण की व्यावृत्ति नहीं हो सकती । त्रित्वविशिष्ट धर्मी में व्यावृत्ति नहीं हो सकती । तस्मात् त्रित्वविशिष्ट में अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है ।