भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

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२४४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम परत्वश्रौव्यमेव च क्वाप्येकन्यूनवृत्तित्वे प्रमाणं स्यात् । क्व तथेति चेन्न । शैलेऽनलस्यानुमायां क्व हस्तांवितस्त्यादौ तदंश इत्यांनिश्चयवददोषत्वात् । नन्वस्तु मा वाऽऽसीदेकत्वमनुगतम्, किमनेनात्र निरूपितेन ? द्वित्वादि यत्र न समाप्यते, अभिहिताभावत्रयं चास्ति तत्प्रत्यक्षमिति । मैवम् ; अनुमित्यादि- त्रयेऽपि न त्रित्वं परिसमाप्तम् । एवं सत्यन्यानि त्रीणि न स्युः । अन्या सा त्रित्वव्यक्तिर्याऽन्यत्रेति चेन्न । त्रित्वव्यक्तेः कस्याश्चिदनुमित्यादि- त्रये समाप्यभावात् । काचिदपि त्रित्वव्यक्तिर्यत्र न समाप्यत इति चेन्न । अव्यापकत्वात् । प्रत्यक्षत्वस्य च त्रित्वव्यक्तेश्चावश्यं सामानाधिकरण्यस्य वैशेषिकमतव्युत्थितेन करना है, तो सत्ता को गुण और एकत्व को जाति मानकर कीजिये, क्या हानि है । किञ्च—'सत्ता और एकत्व दोनों में एक पर तथा एक अपर है, एक व्यक्ति में वृत्ति जातिद्वय होने से; जैसे द्रव्यत्व' यह अनुमान ही एकत्व के न्यूनवृत्तित्व में प्रमाण है । समर्थन—फिर भी इस अनुमिति से 'सत्ता अपर जाति है या एकत्व ?' इस विशेष का निश्चय तो होता ही नहीं । खंडन— अनुमिति में यह दोष नहीं है; कारण अनुमिति से सर्वत्र सामान्यरूप से ही निश्चय होता है, विशेषरूप से नहीं । पर्वत में धूम से वह्नि की अनुमिति में भी वह्नि हस्तपरिमित है या वितस्तिपरिमित, ऐसा कोई विशेष निश्चय कहाँ होता है ? समर्थन—एकत्व अनुगत हो या न हो, यहाँ इस निरूपण से क्या प्रयोजन है, 'द्वित्व आदि की परिसमाप्ति जहाँ न हो और उक्त अभावत्रय हों, वह प्रत्यक्ष है' यही प्रत्यक्ष का लक्षण करेंगे । खण्डन—अनुमिति आदि त्रय में भी यावत् त्रित्वव्यक्ति की परिसमाप्ति नहीं है । यदि अनुमित्यादि त्रय में ही त्रित्व की परिसमाप्ति मानें, तो अन्यत्र ( 'प्रमेयादीनि त्रीणि यहाँ' ) त्रित्व न रहेगा । समर्थन—अन्यत्र जो त्रित्व व्यक्ति है, वह अन्य ही है । अर्थात् अनुमिति आदि निष्ठ त्रित्व की परिसमाप्ति उसीमें है । लक्षण में एकैक ( यत्किंचित् ) त्रित्व की परिसमाप्ति ही अभिप्रेत है । खण्डन—फिर तो यत्किञ्चित् त्रित्वव्यक्ति की परिसमाप्ति का अभाव अनुमित्यादि त्रय में भी है । समर्थन—'किसी भी त्रित्वव्यक्ति की परिसमाप्ति जहाँ न हो, वह प्रत्यक्ष है ।' खंडन—आप वैशेषिक ( कणाद मुनि के अनुयायी ) नहीं हैं । अतः प्रत्यक्ष में त्रित्व- संख्या को अवश्य मानेंगे । यदि न मानें, तो 'प्रत्यक्षव्यक्तयस्तिस्रः' ऐसा व्यवहार आपके