खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद १ ] नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २४३ एवमेकत्वस्यापि न क्वचित्परिसमाप्तिः स्यात् । न हि तस्य तत्रैव वृत्तिः ; अन्य- स्यैकत्वाभावप्रसङ्गात् । अत एकत्वसङ्ख्यावत्यामेव व्यक्तौ द्व्यादिपरिसमाप्ति- रित्यविशेष एव । एकव्यक्तिगतैकत्वसङ्ख्याव्यक्तिर्नान्यत्रेति चेन्न । सत्ताव्यक्तेरप्येवम्भाव- प्रसङ्गात्, अननुगतत्वापत्तेश्च । सत्तैकैव जातिरूपा, एकत्वं तु प्रतिव्यक्ति भिन्नं गुणपदार्थ इति चेत्; नूनं वैशेषिकैर्विप्रलब्धोऽसि । कथमन्धथा सदेकप्रत्यययोरनुभवव्यवहारविशेषमपश्यन्नपि कानिचित् कानिचिदसम्बद्धान्यक्षराणि प्रलपसि । सत्त्वैकत्वयोः परापरत्वानुपपत्तेरेवं स्यादिति चेन्न । साम्यात् । जातिपरा- को परिसमाप्ति कहें, तो एकत्व की कहीं भी परिसमाप्ति न होगी। कारण जिन दो में द्वित्व रहता है, उनमें से प्रत्येक में एकत्व भी रहता ही है। अन्यथा वहाँ एकत्व का अभाव हो जायगा । एवञ्च वृत्तित्वमात्र ही परिसमाप्ति होने से एक प्रत्यक्ष व्यक्ति में भी द्वित्व की परिसमाप्ति ही है, अभाव नहीं । अतः लक्षण का असम्भव हो जायगा। समर्थन—एकव्यक्तिगत एकत्वसंख्या अन्यत्र नहीं रहती, अतः तत्रैववृत्तित्वरूप परिसमाप्ति एकत्व में हैं। खंडन—सत्ताव्यक्ति भी ऐसी ही हो जायगी। अर्थात् एक- व्यक्तिगत सत्ता अन्यत्र न रहेगी। यदि सत्ता को भी प्रतिव्यक्ति भिन्न मानें, तो 'इदं सत्', इदं सत्' यह अनुगत प्रतीति नहीं होगी। किञ्च—यदि एकत्व को प्रतिव्यक्ति- व्यावृत्त मानें, तो 'इदमेकम्', 'इदमेकम्' यह अनुगत प्रतीति न होगी। यदि उसे नाना मानें, तो सभी एकत्व का लक्षण में प्रवेश तो हो नहीं सकता, किन्तु एक ही एकत्व का निवेश हो सकता है। एवञ्च जिस प्रत्यक्ष-व्यक्तिगत एकत्व का निवेश करेंगे, उससे अन्य व्यक्ति में अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—जातिरूप होने से सत्ता एक ही है, किन्तु एकत्व तो गुणपदार्थ होने से प्रतिव्यक्ति भिन्न है। खंडन—निश्चय ही आप वैशेषिकों के वञ्चन में आ गये । अन्यथा सत्ता और एकत्व दोनों की प्रतीति या व्यवहार में भेद न देखते हुए भी युक्तिविरुद्ध, असम्बद्ध (एकत्व को गुण तथा सत्ता को जाति) क्यों कहते ? समर्थन—यदि एकत्व को जाति मानें, तो द्रव्यत्व के तुल्य उसका भी सत्ता के साथ पर-अपरभाव होना चाहिए। वह हो नहीं सकता; कारण सत्ता में सत्ता नहीं रहती और एकत्व रहता है तथा एकत्व में सत्ता है और एकत्व नहीं है। फलतः सांकर्य होने से एकत्व जाति ही नहीं, प्रत्युत गुण ही है। खंडन—यदि सांकर्य का परिहारमात्र ही