खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम द्वितीये तदेवाभिन्नजातीयत्वं लक्षणमस्तु, अवश्यं तया प्राथम्येन प्रतीय- मानत्वात् । न तृतीयः ; परोक्षप्रमितित्वस्यानुमित्यादिषु मिलितास्वपि भावात् । नापि चतुर्थः ; वैशेषिकपक्षे गुणतया तदभावात् , भावे वाऽनुमित्यादित्रय- वृत्तीनां त्रयाणामप्यभावानामेकत्वसङ्ख्यासामानाधिकरण्यसम्भवात्, मिलिताना- मप्येकसमुदायापेक्षया तथात्वात् । नापि पञ्चमः ; वैशेषिकमतानुसारेण अनुमित्यादित्रयेऽपि तदभावस्य तुल्य- त्वात् । अतदनुसारे प्रत्यक्षव्यक्तिष्वपि द्वयादिसङ्ख्यायोगात् । तथापि नैकस्यां प्रत्यक्षव्यक्तौ द्वयादिपरिसमाप्तिः, द्वयादिसङ्ख्यापरि- समाप्यभावश्च तदभावशब्देन विवक्षित इति चेन्न । का हि परिसमाप्तिर्या एकस्यां व्यक्तौ नास्तीत्युच्यते ? तत्रैव वृत्तिर्द्वयादेः परिसमाप्तिः, सैकस्यां व्यक्तौ नास्तीति चेन्न । द्वितीय या तृतीय कल्प में यदि वह जाति या उपाधि प्रत्यक्षत्व या अर्थजत्व ही हो, तो उन्हींको लक्षण मान लें; प्रकृत लक्षण व्यर्थ है । कारण, उक्त लक्षण में विशेषण होने से वह जाति या उपाधि अवश्य ज्ञेय है, साथ ही उन्हें लक्षण मानने में लाघव भी है । यदि यत्किञ्चित् एक जाति या एक उपाधि का ग्रहण हो, तो परोक्षत्वरूप जाति या उपाधि अनुमित्यादि त्रय में भी है । अतः अनुमित्यादि समुदाय में अतिव्याप्ति हो जायगी । चतुर्थ कल्प में वैशेषिक के मत के अनुसार एकत्वसंख्या गुण होने से वह प्रत्यक्ष ( रूप गुण ) में नहीं रह सकती, अतः असम्भव हो जायगा । अन्य मतों के अनुसार अनुमित्यादित्रय में उक्त अभावत्रय भी है तथा समुदाय की अपेक्षा एकत्वसंख्या भी है; अतः अनुमित्यादि-समुदाय में अतिव्याप्ति हो जायगी । पंचम कल्प में वैशेषिक के मत के अनुसार अनुमित्यादित्रय में भी द्वित्वादि संख्या का अभाव होने से अतिव्याप्ति हो जायगी तथा अन्य मत के अनुसार प्रत्यक्ष में भी ( 'एक, दो, तीन प्रत्यक्ष' इस प्रकार ) द्वयादि संख्या रहने से असम्भव हो जायगा । समर्थन—तब भी एक प्रत्यक्ष व्यक्ति में द्वित्व आदि सङ्ख्या की परिसमाप्ति ( पर्याप्ति ) नहीं है और द्वयादि की परिसमाप्ति का अभाव ही तदभाव पद से विवक्षित है, अतः असम्भव नहीं होगा। खंडन—द्वित्वादि संख्या की परिसमाप्ति क्या है, जो एक व्यक्ति में नहीं है ? समर्थन—केवल उसीमें वृत्तित्व द्वित्व की परिसमाप्ति है । वह एक ही व्यक्ति में नहीं है, कारण द्वित्व दो व्यक्तियों में रहता है । खंडन—यदि तत्रैववृत्तित्व