खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २४१ असमुदायत्वे सतीत्यपि विवक्षितमिति चेन्न । समुदायत्वविशिष्ट एवांशतः स्वात्मनि वृत्तिविरोधभयेन असमुदायत्वस्यैष्टव्यत्वेन तादृशि प्रसङ्गो दुर्वारः । ज्ञानस्यैवं विवक्षितमिति चेन्न । विशिष्टस्यापि ज्ञानस्य ज्ञानत्वादेव । एकेति च किमाश्रयव्यक्त्यभेदो विवक्षितः, उताभिन्नजातीयता, उतैकोपा- धिकता, उतैकसङ्ख्यायोगिता, उत द्व्यादिसङ्ख्यायोगाभावः ? आद्ये तद्विशिष्टस्याव्यापकतादोषः, व्यक्त्यात्मनोऽभेदस्य व्यावृत्तत्वात् धर्मिणा च लक्षणविशेषणेऽलक्ष्यधर्मत्वं धर्मस्य स्यात्, स्वस्यैव स्वधर्मत्वानुपपत्तेः । आश्रयाभेदस्योपलक्षणत्वे प्रागुक्तदोषः । समर्थन—उक्त लक्षण में समुदाय से भिन्नत्व का भी निवेश है, अतः अनुमित्यादि- त्रय के समुदाय में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—यदि कहें कि समुदायत्वविशिष्ट में भी समुदायत्व मानेंगे, तो विशिष्टवृत्ति धर्म विशेषणवृत्ति अवश्य होने से अंशतः आत्माश्रय हो जायगा । अतः समुदायत्वविशिष्ट भी असमुदाय होने से पुनः अनुमित्यादि समुदाय में अतिव्याप्ति ही है । समर्थन—उक्त लक्षण में 'प्रमितित्व' का भी निवेश करेंगे । एवञ्च समुदाय प्रमिति न होने से उसमें अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—समुदायत्वविशिष्ट अनुमित्यादि प्रमिति है, अतः समुदाय भी प्रमिति ही है । किञ्च—लक्षण में निविष्ट 'एक' शब्द से लक्षणाश्रय लक्ष्य व्यक्ति का अभेद अभिप्रेत है या एक ( अभिन्न ) जाति का आश्रयत्व अथवा एक उपाधि का आश्रयत्व या एकत्वसंख्या का योग या द्वित्व आदि संख्या का योगाभाव ? प्रथम कल्प में एक ही प्रत्यक्ष व्यक्ति का संग्रह हो सकने से लक्षण व्यक्त्यन्तर में अव्याप्त हो जायगा । यदि 'एकलक्ष्याश्रयत्व' लक्षण में विशेषण दें, तो लक्षण लक्ष्य का धर्म न हो सकेगा । कारण जैसे स्व का धर्म स्व नहीं होता, वैसे ही स्वविशिष्ट भी स्व का धर्म नहीं हो सकता । यदि कहें कि लक्ष्य व्यक्ति का अभेद लक्षण में विशेषण नहीं, किन्तु उपलक्षण है, अतः उक्त दोष नहीं; तो उपलक्षण व्यावर्य से बहिर्भूत होने के कारण तद्व्यावृत्त अभावत्रयमात्र ही लक्षण होगा, जो अनुमित्यादि में भी रहेगा । एवञ्च पूर्वोक्त दोष तदवस्थ ही है । ३१