भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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२५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम हेतोः पक्षधर्मतयाऽप्यपर्वतादिधर्मः साध्यो मा भूत्, ततस्तु कालान्तरे किं न स्यात् । तं कालमन्तर्भाव्य पक्षत्वे कथं पश्चान्निष्कंपं प्रवर्तेत । धूमकालमन्त- र्भाव्य चेदुक्तमावर्तते । तद्धूमकालश्चेद्; अंशतः स्ववृत्तिः । व्याप्ति-तद्ग्रहोपाय-खण्डनम् कश्च व्याप्तिशब्दार्थ इति वक्तव्यम् । अविनाभाव इति चेन्न । किमेकस्याव्यतिरेकेऽपरस्य भावोऽविनाभावपदार्थः, उत एकस्य व्यतिरेकेऽपरस्य व्यतिरेकः ? यद्याद्यः ; तदाऽव्यतिरेकोऽन्वयार्थ व्याप्तिग्रह हुआ हो । अतः अन्य काल में भी प्रवृत्ति हो जायगी । समर्थन—पक्षधर्मताबलात् भी पर्वतीय वह्नि की सिद्धि हो सकती है, केवल नियतकालीनता से नहीं । यहाँ वह अप्रयोजक है । खण्डन—हेतु की केवल पक्षधर्मता से पर्वतेतर देश और तत्कालेतरकालगत वह्नि न सिद्ध हो, बल्कि तद्देशकालीन साध्य ही सिद्ध हो । किन्तु अन्यकाल में अग्नि की सिद्धि क्यों नहीं होगी ? यदि कहें कि 'अनुमितिकाल या लिङ्गकाल से विशिष्ट संदिग्धसाध्यधर्मी पक्ष है । अतः लिङ्गकाल अनुमिति में भासता है । इसलिए अन्य काल में साध्यसिद्धि की आपत्ति नहीं आयेगी', तो लिङ्गकाल का नाश होने पर धर्मी के नाश के तुल्य पक्ष में प्रवृत्ति ही नहीं होगी। निर्वचन—लिङ्गकाल पक्ष में विशेषणरूप से नहीं भासता, किन्तु धूमकाल भासता है और धूमकाल धूम की अनुवृत्ति होने से प्रवृत्तिकाल भी है, अतः हानि नहीं । खंडन—यदि धूमकाल को पक्ष में विशेषण मानें, तो अन्य काल भी धूमकाल है अतः अन्य काल में भी प्रवृत्ति होनी चाहिए । यदि तद्धूमकाल पक्ष में विशेषण मानें, तो 'तद्धूमकालविशिष्टपर्वतः धूमवान्' इस तरह पक्षधर्मता का ज्ञान होने से अंशतः धूम धूमवृत्ति हो जायगा, अर्थात् अंशतः आत्माश्रय हो जायगा । व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन किञ्च—आपको यह भी कहना होगा कि व्याप्त्यवघटक व्याप्तिशब्द का अर्थ क्या है ? निर्वचन—अविनाभाव ही व्याप्ति-शब्द का अर्थ है । खंडन—इस 'अविनाभाव' शब्द का अर्थ क्या 'एक के अव्यतिरेक में अपर का भाव है' या 'एक के व्यतिरेक में अपर का व्यतिरेक ?' यदि प्रथम पक्ष मानें, तो अव्यतिरेक का अर्थ अन्वय होता है । एवञ्च 'एक के अन्वय में अपर का अन्वय', यह इसका अर्थ हुआ । ऐसा मानने पर