भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 272

परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २५५ इत्येकस्यान्ययेऽपरस्यान्यय इत्युक्तं स्यात् । एवञ्च सति पार्थिवत्व-लोहलेख्यत्वयो- रन्वयो व्याप्तिः स्यात् । न क्वाचित्कः सम्बन्धो व्याप्तिः , सार्वत्रिकस्य तथात्वेन विवक्षितत्वादिति चेत् । किमिदं सार्वत्रिकत्वं सम्बन्धस्य ? सर्वासु तज्जातीयव्यक्तिषु विद्यमानतेति चेत् ; नेयं सर्वतज्जातीयव्यक्त्यपरिज्ञाने शक्याऽवधारणा । न च सर्वास्ता व्यक्तयो विशेषतो ज्ञातुं शक्याः , तत्तत्प्रमितिकरणासम्भवात् । इन्द्रियेण सामान्यलक्षणया प्रत्यासत्त्या व्याप्तिग्रहणकाले सर्वास्तज्जातीय- व्यक्तयो गृह्यन्ते, यदनभ्युपगमे षण्डकसमुद्वाह्य मुग्धायाः पुत्रप्रार्थनमिवेति वाचस्पतिरुपालम्भमवादीदिति चेत् । मैवम् ; सामान्यलक्षणया प्रत्यासत्त्या व्याप्तिं गृह्णतः सार्वज्ञप्रसङ्गात् । क्वचिदप्यज्ञानं ते न स्यादिति च सार्वज्ञापादनमिति न प्रतिकृत्याऽपि । लोहलेख्यत्व ( कुठारादिच्छेद्यत्व ) रूप साध्य की पार्थिवत्व में व्याप्ति हो जायगी । कारण पार्थिवत्व का जिस काष्ठादि में अन्वय है, वहाँ लोहलेख्यत्व का भी अन्वय है ही । समर्थन — काचित्क सम्बन्ध अर्थात् अन्वय व्याप्ति नहीं, किन्तु सार्वत्रिक अन्वय ही व्याप्ति है। एवञ्च पार्थिवत्व का लोहलेख्यत्व से सार्वत्रिक अन्वय नहीं है, कारण वज्र ( हीरे ) में वह व्यभिचरित हो जाता है । खंडन — सम्बन्ध में सार्वत्रिकत्व क्या वस्तु है ? यदि 'तज्जातीय सर्वव्यक्तियों में विद्यमानता' है, तो जबतक सर्वव्यक्तियों का ज्ञान न हो, तबतक सर्वव्यक्तियों में सम्बन्ध की विद्यमानता का भी ज्ञान हो नहीं सकता । सब व्यक्तियों का विशेषरूप से ज्ञान हो नहीं सकता; क्योंकि उक्त ज्ञान के लिए करणभूत इन्द्रियसन्निकर्ष ही नहीं है। समर्थन — चक्षुरिन्द्रिय से सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति ( सन्निकर्ष ) द्वारा व्याप्ति- ग्रहकाल में धूमत्वेन सभी धूम और वह्नित्वेन सभी वह्नि व्यक्तियों का ग्रहण हो ही सकता है । सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति न मानकर व्याप्तिग्रह का स्वीकार करना षण्ढ से विवाहकर मुग्धा स्त्री द्वारा पुत्र-प्रार्थना के तुल्य ही है, यह उपालम्भ तो श्रीवाचस्पति मिश्र दे ही चुके हैं । खंडन —यदि सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से व्याप्तिग्रहण-काल में सभी व्यक्तियों का ग्रहण मानें, तो प्रमेयत्व और अभिधेयत्व के व्याप्तिग्रह-काल में प्रमेयमात्र का ग्रह हो जाने से मनुष्यमात्र को सर्वज्ञ हो जाना चाहिए । प्रतिबन्दी प्रश्न — सर्वज्ञत्व का प्रसङ्ग हो जायगा, यह दोष भी सर्व के ज्ञान के बिना हो नहीं सकता। कारण जब आप सर्व को जानते ही नहीं, तो मुझमें सर्वज्ञान का