खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 273, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें२५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रमेयत्या व्याप्तिग्रहणकाले सर्वतज्जातीयव्यक्तिग्रहणे प्रमेयत्वादिसर्वं तदा ज्ञायत एव, न तु रूपान्तरेणेति चेन्न । यदि रूपान्तरेण तत् प्रमेयं तदा रूपान्तरवतोऽपि प्रमेयत्वाधारतया कथमग्रहणम् । अथ न प्रमेयं नास्त्येव रूपान्तरेण तत् । येन तु रूपेणास्ति तेन सर्वेण प्रमेयमिति यावद्विद्यमानाकारेण ज्ञातत्वप्रसङ्गः । तथात्व- स्वीकारे च ज्ञायतां प्रमेयत्वदर्शिना भवता मामकी चित्तवृत्तिः, ततः श्रद्धास्ये । स्यादेतत्—यथा भेदोऽन्योन्याभाववैधर्म्यादिः पृथक्, तथैक्यमपि वस्तूनाम् । ततः प्रमेयत्वाद्यपि धर्मिणामेकत्वमेकमेव । ततः प्रमेयत्वेन ज्ञायमानं तत् सर्वमपि तेनैक्येन प्रतीयमानैकव्यक्त्यात्मकमेव ज्ञायमानं भवतीति कथं तदेकत्ववेदिनः सार्वज्ञम् । न च वाच्यं नानात्वमपि व्यक्तीनां प्रमेयमिति तदपि धर्मितया आरोप कैसे करेंगे ? तब तो आपमें भी सर्वज्ञता की आपत्ति आ जायगी । उत्तर— यह प्रतिकृत्या (प्रतिबन्दी) भी युक्त नहीं है । कारण 'मेरे चित्त में क्या है' इस प्रश्न का उत्तर न देने से मेरी हृद्गत वस्तु को आप नहीं जानते, यह बात स्पष्ट है, जो मेरी हृद्गत वस्तु के जान लेने पर सिद्ध नहीं हो सकती—यही यहाँ सर्वज्ञत्वापादन का आशय है । अनिष्टकारक देवता को 'कृत्या' कहते हैं और उस देवता की निवारक देवता को 'प्रतिकृत्या' कहते हैं । प्रकृतमें लक्षणा से 'प्रतिकृत्या' शब्द प्रतिबन्दीपरक है । समर्थन—सामान्यलक्षणा से प्रमेयत्वरूप से सर्व का ग्रहण होने पर भी रूपान्तर (तत्तद्रूप) से सर्व का ग्रहण नहीं होता, अतः सर्वज्ञत्व का प्रसङ्ग नहीं है । खंडन— यदि तत्तद्रूप से तत्-तत् वस्तु प्रमेय हैं, तो तत्तद्रूपविशिष्ट तत्तद्वस्तु भी प्रमेयत्व की आधार हैं ही । फलतः प्रमेयत्व रूप से उनका ग्रहण क्यों न हो ? यदि अन्यरूप से वे प्रमेय नहीं हैं, तो अन्यरूप से वे हैं ही नहीं । जिस रूप से वे हैं, उस रूप से प्रमेय ही हैं । अतः यावत् विद्यमान आकारों से उसका ग्रहण होने लगेगा । यदि आप यह मान लें कि यावत् विद्यमान आकारों से सभी वस्तु ज्ञेय हैं, तो प्रमेयत्व से सब वस्तुओं को देखनेवाले आप मेरे चित्त में विद्यमान वस्तु को भी जान लें, तभी आपके वचन में मैं श्रद्धा करूँगा । समर्थन—जैसे अन्योन्याभाव, वैधर्म्य आदि रूपभेद, वस्तुओं में पृथक्त्वरूप हैं, वैसे ही एकत्व, प्रमेयत्व आदि भी वस्तुओं के ऐक्यरूप ही हैं । एवञ्च प्रमेयत्व आदि भी धर्मियों के ऐक्यरूप ही हैं । तस्मात् प्रमेयत्व रूप से ज्ञायमान वह सर्ववस्तु