खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २५७ ग्राह्यमेवेति; यतस्तदपि प्रमेयत्वादिनो गृह्यमाणमेकमेव गृहीतं भवतीति । तस्मात् “एको भावस्तत्त्वतो येन दृष्टः सर्वे भावास्तत्त्वतस्तेन दृष्टाः ।"—इति । तत्त्वतः = ताद्रूप्येण एकीभूता इति । तदेतदपि नोपपन्नम् ; नानैकमिति व्याहतप्रतीत्यापत्तेः । अथ रूपान्तरेण नानात्वं प्रमेयत्वादिना चैक्यमिति व्यवस्थित्या न व्याघातः स्यात्; तर्हि प्रमेयत्वाद्याधारस्य व्यक्तिभेदस्य कृत्स्नस्य ग्रहणात् सार्वज्ञापत्तिस्तादवस्थ्येवेति । किञ्च—सामान्यलक्ष्णया प्रत्यासत्त्या तज्जातीयविशेषग्रहणे तासु सर्वासु व्यक्तिषु सम्बन्धास्तित्वे किं प्रमाणम् ? सर्वव्यक्तिवत् तत्सम्बन्धग्रहेऽपि व्याप्तिग्राहकमिन्द्रियमेव प्रमाणमिति चेत्; तर्हि क्वचिदेवमवधारितस्य यद्व्यभिचारो दृश्यते, तन्न स्यात्, इन्द्रियेण तत्सम्बन्धस्य प्रमितत्वात् । ऐक्यरूप से प्रतीयमान एकरूपात्मक ही ज्ञात होता है। अतः एकत्ववेत्ता पर सर्वज्ञत्व का प्रसङ्ग कैसे आ सकता है ? यदि कहें कि व्यक्तियों का नानात्व भी प्रमेयत्व रूप से ज्ञात होता है। अतः वस्तु नाना हैं, तो वह युक्त नहीं है। कारण; प्रमेयत्व रूप से गृहीत नानात्व भी एक ही होता है। कहा भी है : 'जिस पुरुष ने एक भाव ( वस्तु ) को प्रमेयत्वादि रूप से देख लिया, उसने संपूर्ण भावों को प्रमेयत्वादि रूप से एकता-प्राप्त ही देखा है।' खण्डन—यदि ऐसा मानें, तो 'नाना एक हैं' ऐसी व्याहत प्रतीति होने लगेगी । यदि कहें कि अन्य रूपों से नाना हैं तथा प्रमेयत्व रूप से एक है, अतः व्याहत प्रतीति नहीं होगी, तो प्रमेयत्व के आधारभूत सभी भिन्न-भिन्न व्यक्तियों का ग्रहण हो जाने से सर्वज्ञत्व की आपत्ति पूर्ववत् ही बनी रही । किञ्च—सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से सब व्यक्तियों का ज्ञान होने पर भी उनमें व्याप्तिरूप सम्बन्ध है, इसमें क्या प्रमाण है ? समर्थन—सभी व्यक्तियों के तुल्य उनके व्याप्तिरूप सम्बन्ध के ज्ञान में भी इन्द्रिय करण और सामान्यलक्षणा ही प्रत्यासत्ति ( सन्निकर्ष ) है। अतः सम्बन्ध-ज्ञान में प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । खण्डन—यदि सम्बन्ध-ज्ञान में प्रत्यक्ष को प्रमाण मानें, तो 'यत्र यत्र पार्थिवत्वं तत्र तत्र लोहलेख्यत्वम्' ऐसा व्याप्ति-निश्चय होने पर भी वज्र में देखा जानेवाला व्यभिचार न होना चाहिए, कारण प्रत्यक्ष से व्याप्तिरूप सम्बन्ध प्रमित ही है। ३३