भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 275

भ्रान्तिस्तत्र सम्बन्धप्रतीतिः पश्चाद् बाधादिति चेन्न । सामग्र्यभेदे काचिद् भ्रान्तिः, काचिदभ्रान्तिरिति विभागाद्युपपत्तेः । दोषादोषवैचित्र्यविवेचनस्य च दुष्करत्वात् । कार्यभेदादेव सामग्रीभेदोऽप्युन्नेय इति चेत् । उन्नीयताम् ; स एव तु कीदृगुन्नेय इति वाच्यम् । न तावत्सार्वत्रिकसम्बन्धाभावाभावात्मकः, तदानीं भाविनां सम्बन्धा- नामसत्त्वेनाकारणत्वात् । सामान्यतश्च तज्जातीययोः सम्बन्धस्य प्रतीतेः पूर्वं सत्त्वं भ्रान्त्यभ्रान्तिसाधारणम् । क्वचिदपि सम्बन्धाभावे भ्रान्तेरनुत्पादात् । किमेतावता, अन्य एव तर्हि कार्यभेदात्कारणभेदः कल्पयिष्यत इति चेत्; स हि किमिन्द्रियसहकारिभूतः करणान्तरमेव वा कल्पनीय इति वाच्यम् । नाद्यः ; इन्द्रियस्य भाविभूतसम्बन्धांशे प्रमाणत्वकल्पनायां प्रमाणाभावात् । प्रत्युत समर्थन—वहां व्याप्तिरूप सम्बन्ध की प्रतीति भ्रमरूप है, कारण पीछे वह बाधित हो जाती है । खण्डन—धूम में वह्नि के व्याप्तिग्रह के इन्द्रिय, सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति आदि जो कारण हैं, वे ही तो पार्थिवत्व और लोहलेख्यत्व के व्याप्तिग्रह में भी कारण हैं। फिर जब कारण एक हैं, तो पूर्वस्थल में अभ्रान्ति और उत्तरस्थल में भ्रान्ति है, यह विभाग हो नहीं सकता । पूर्वस्थल में दोष नहीं है और उत्तरस्थल में दोष है, यह वैचित्र्य-विवेचन भी दुष्कर है। समर्थन—कार्य के भेद से अर्थात् पूर्वस्थल में प्रमारूप तथा उत्तरस्थल में भ्रमरूप व्याप्तिग्रह होता है इससे सामग्रीभेद की अनुमिति करेंगे । खण्डन—भले ही अनुमिति कीजिये, किन्तु यह कहिये कि वह सामग्रीभेद क्या है? वह्नि-धूमस्थल में सार्वत्रिक सम्बन्ध है और लोहलेख्यत्व-पार्थिवत्वस्थल में सार्वत्रिक सम्बन्ध नहीं है, यह सामग्रीभेद तो आप कह नहीं सकते । कारण व्याप्तिग्रहकाल में भावी सम्बन्ध तो है नहीं, अतः व्याप्तिग्रह के भावी सम्बन्ध कारण नहीं हो सकते । यदि कहें कि सामान्यरूप से वह्नि-धूमजातीय का सम्बन्ध व्याप्तिग्रह से पूर्व विद्यमान ही है, तो लोहलेख्यत्व और पार्थिवत्व का सम्बन्ध भी सामान्यरूप से काष्ठादि में व्याप्तिग्रहकाल में विद्यमान है। यदि कहीं भी लोहलेख्यत्व और पार्थिवत्व के सम्बन्ध का ग्रह न हो, तो भ्रान्ति कैसे होगी ? समर्थन—कार्यभेद से कारणभेद की कल्पना करेंगे और वह सार्वत्रिक सम्बन्ध से अन्य ही मानेंगे । खण्डन—वह कारण क्या इन्द्रिय का सहकारी है या स्वतन्त्र (इन्द्रिय-निरपेक्ष) अन्य ही? प्रथम पक्ष युक्त नहीं, क्योंकि इन्द्रियों को भावि-भूत के सम्बन्धांश (व्याप्ति-अंश) में करण मानने में कोई प्रमाण नहीं है। इसके विपरीत