खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 276, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २५६ व्युपरतेन्द्रियव्यापारस्यापि विचारयतः पूर्वप्रतीतसम्बन्धधर्मिद्वयस्य व्याप्स्यव- धारणदर्शनात् । तदाऽपि मनोऽस्तीन्द्रियमिति चेत् । अस्तु ; तस्मिन् कार्ये मनसः करणत्वे तु प्रमाणाभावः, अवश्यपरिकल्पनीयेनान्येनैव सर्वानुपपत्त्युपशान्तेः । कारणत्वमात्रं तु चक्षुरादिज्ञानवन्मनसस्तत्र स्यात् । चक्षुरादिवत्करणमन्यदेव तत्कल्पनीयमिति सप्तममिन्द्रियं प्रमाणान्तरं वा प्रसज्येत । अन्यथा चाक्षुषादिप्रतीतावपि चक्षुरादेः करणत्वं न स्यात् । शक्यते तत्रापि वक्तुं मन एव तत्र सुखादिप्रतीतिवत्करणम्, चक्षुरादयस्तु सहकारिमात्रम् । नापि द्वितीयः ; इन्द्रियान्तरप्रसङ्गात्, प्रमाणान्तरप्रसङ्गाद्वा । नापि विनाभाव एकस्य व्यतिरेकेणापरस्याव्यतिरेकः, तन्निषेधोऽविनाभाव इन्द्रिय-व्यापार विरत होने पर भी 'वह्नि की व्याप्ति धूम में न हो, तो धूम और वह्नि का भूयः सहदर्शन नहीं हो सकता' यह विचार करनेवाले मनुष्य को पूर्वप्रतीत परस्परसम्बद्ध व्याप्य-व्यापक धर्मिद्वय का व्याप्तिग्रह (ज्ञान) देखा ही जाता है। यदि कहें कि चक्षुरादि के उपरामकाल में भी मनरूप इन्द्रिय तो है ही, तो वह भी युक्त नहीं। कारण चाक्षुषादि ज्ञान के तुल्य व्याप्तिग्रह में भी मन कारण तो है, किन्तु अवश्य परिकल्पनीय सहकारी कारणों से ही सर्वदोषों की निवृत्ति होने से मन को व्याप्तिग्रह में करण मानने में कोई प्रमाण नहीं है। यदि कहें कि जैसे चाक्षुषादि ज्ञान में चक्षु करण है, वैसे ही व्याप्तिग्रह में भी मन से अन्य ही कोई करण मानेंगे, तो वह भी ठीक नहीं। वैसी स्थिति में यदि आप व्याप्तिग्रह को प्रत्यक्ष मानें, तो सप्तम इन्द्रिय हो जायगी और यदि परोक्ष मानें, तो सप्तम प्रमाण हो जायगा, क्योंकि वह व्याप्यादिनिरपेक्ष होने से लिङ्गादि से विलक्षण है। एवञ्च अपसिद्धान्त हो जायगा। अन्यथा यदि मन को ही करण मानें, तो चाक्षु- षादिज्ञान में भी चक्षु करण न होगा। कारण कह सकते हैं कि मन ही सुखानुभव की तरह चाक्षुष में भी करण है, चक्षु तो सहकारिमात्र है। 'वह कारण इन्द्रिय से निरपेक्ष अर्थात् स्वतन्त्र कारण है' यह द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि फिर तो वह पूर्वोक्त रीति से सप्तम इन्द्रिय या सप्तम प्रमाण हो जायगा। 'एक के व्यतिरेक से अपर का अव्यतिरेक विनाभाव है और उसका निषेध अवि- नाभाव है' यह द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं। कारण ऐसा होने पर लोहलेख्यत्व