खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम इति द्वितीयः पक्षः । एवं हि लोहलेख्यत्वव्यतिरेकश्च पार्थिवत्वव्यतिरेकश्च क्वचिदस्तीति पार्थिवत्वलोहलेख्यत्वयोरप्यविनाभावः प्रसज्येत । सार्वत्रिकं व्यतिरेकयौगपद्यं विवक्षितम्, न तु काचित्कम् । अत एवोच्यते— अविनाभावनियम इति चेन्न । सार्वत्रिकान्वयावधारणनिरासन्यायेन सार्वत्रिक- व्यतिरेकावधारणास्याप्यशक्यत्वात् । शक्यत्वे चाऽन्वयावधारणमेवास्तु सार्वत्रिकम्, कृतं व्यतिरेकावधारणकुटिलिकया । यत्र विपक्षे वृत्तौ बाधकमस्ति, तयोरन्वयो व्याप्तिरिति केचित् । तन्न; यत्तु विपक्षे वृत्तौ बाधकं तत्प्रमाणं वा तर्को वा स्यात् ? आद्ये न तावदिन्द्रियम् ; तदसम्भवात् । अन्यथा व्यभिचाराव्यभिचारसंशयो न स्यात् । का व्यतिरेक (अभाव) और पार्थिवत्व का व्यतिरेक भी कहीं आकाश में है; अतः पार्थिवत्व और लोहलेख्यत्व का भी अविनाभाव (व्याप्ति) हो जायगा । समर्थन—व्यतिरेक का सार्वत्रिक साहित्य विवक्षित है, क्वाचित्क साहित्य विवक्षित नहीं है । अतएव 'अविनाभाव का नियम व्याप्ति है' ऐसा कहा जाता है । खंडन— सामान्यलक्षणा के न होने से सार्वत्रिक अन्वयज्ञान के तुल्य सार्वत्रिक व्यतिरेक- ज्ञान भी अशक्य ही है । किसी प्रकार वह अवधारण (ज्ञान) शक्य भी हो, तो अन्वय का अवधारण ही व्याप्ति मान लें, 'व्यतिरेक का अवधारण व्याप्ति है' यह वक्रोक्ति व्यर्थ है । समर्थन—कोई आचार्य कहते हैं कि जिन साध्य-साधनों के बीच साधन के विपक्ष-वृत्तित्व (साध्याभावाधिकरण-वृत्तित्व) में बाधक हो, उन दोनों का अन्वय व्याप्ति है । खण्डन—यह भी युक्त नहीं है, कारण विपक्ष में साधन के वृत्तित्व का बाधक क्या है—प्रमाण या तर्क ? यदि प्रमाण बाधक हों, तो उनमें चक्षुरादि इन्द्रियाँ तो हो नहीं सकतीं; क्योंकि इन्द्रियाँ सम्बद्धमात्र को ही ग्रहण करती हैं । अतः उनसे अतीत, अनागत और असन्निकृष्ट विपक्षों का ज्ञान हो नहीं सकता । यदि इन्द्रियों द्वारा हेतु में अतीत, अनागत विपक्ष-वृत्तित्वाभाव का भी ग्रहण मानें, तो कहीं भी व्यभिचार का सन्देह नहीं होना चाहिए ।