खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २६१ नाप्यनुमानम्; अनवस्थाप्रसङ्गात् । नाप्यर्थापत्तिः ; अनुमानाव्यतिरेकात् । व्यतिरेके वा यदि लिङ्गिव्यतिरेकेण लिङ्गस्यानुपपत्तिः, तदा तत एव लिङ्गिसिद्धेः कृतमनुमानेन । अनेवम्भावे च तयोः किमायातम् । अस्तु वा कथमपि तावदर्थापत्तिर्बाधिका; तथापि कीदृग्भ्युपगम इति प्रष्टव्यम् । किं विपक्षवृत्तित्त्वबाधकसह्रीचीनो यत्र क्वचिदन्वयो व्याप्तिः, उत तत्सहितः सार्वत्रिकोऽन्वयः, उत किं नो विशेषगवेषणेन तत्सध्रीचीनः सामान्यतोऽन्वयो व्याप्तिः, उत सार्वत्रिकान्वयः, स च विपक्षे बाधकादवगम्यते ? नाद्यः ; विकल्पानुपपत्तेः । तथा हि—किं विपक्षे वृत्तौ बाधकं सर्वव्यक्ति- “ह्रदादिः धूमाभाववान् वह्नयभावात्” इत्याकारक अनुमान भी विपक्ष-वृत्तित्व का बाधक प्रमाण नहीं हो सकता । कारण उक्त स्थल में वह्नयभाव में धूमाभाव की जो व्याप्ति है, उसके घटक विपक्ष का बाधक भी अनुमान ही होगा; इस प्रकार अनवस्था हो जायगी । अर्थापत्ति भी विपक्ष-वृत्तित्व में बाधक प्रमाण नहीं है। कारण अनुमान में ही अर्थापत्ति का अन्तर्भाव है । यदि अर्थापत्ति को अनुमान से पृथक् भी मानें और उसका स्वरूप साध्य के अभाव में हेतु की अनुपपत्तिरूप मानें, तो उसीसे ( अर्थापत्ति से ही ) साध्य की सिद्धि हो जाने पर अनुमान व्यर्थ हो जायगा । यदि अन्य रूप अर्थात् कारण आदि के बिना कार्य आदि की अनुपपत्तिरूप मानें, तो उससे प्रकृत ( विपक्षबाधक स्थल ) में धूमाभावरूप साध्य तथा वह्नयभावरूप हेतु को क्या लाभ हुआ, अर्थात् अर्थापत्ति से विपक्ष में धूम के बाध की सिद्धि नहीं हुई । किसी प्रकार विपक्ष में हेतु की वृत्तित्ता का बाधक अर्थापत्तिरूप प्रमाण मान भी लें, तब भी यह पूछा जायगा कि फिर व्याप्ति का स्वरूप क्या हुआ ? क्या 'विपक्षवृत्तित्व के बाधक से सहित जिस किसी अधिकरण में अन्वय' व्याप्ति है या 'विपक्षवृत्तित्व के बाधक से सहित सार्वत्रिक अन्वय' व्याप्ति है' अथवा विशेष विचार से क्या लाभ, 'विपक्ष-वृत्तित्व के बाधक से सहित सामान्यतः अन्वय' व्याप्ति है या 'सार्वत्रिक अन्वय व्याप्ति है और उसका ज्ञान विपक्ष में बाधक प्रमाण से होता है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण विकल्प की उपपत्ति ही नहीं है। देखिये— क्या विपक्ष में हेतु के वृत्तित्व का बाधक सर्वव्यक्तिविषयक होना चाहिए या सामान्य- विषयक ? प्रथम कल्प में जिस पक्ष में साध्य की अनुमिति करनी है, उस पक्ष में