खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम विषयम्, उत सामान्यविषयम् ? आद्ये यत्राप्यनुमानं प्रवर्तनीयं तत्रावश्योपस्था- प्यया अन्यथाभावबाधकभूतयाऽर्थापत्त्यैव साध्यसिद्धेः शान्तमनुमानव्यसनेन । द्वितीये क्वचिद्व्यभिचारेऽपि क्वचिदव्यभिचारमाश्रित्य बाधकस्य चरितार्थ- त्वम् । धूमवत्तमात्रमग्निमत्तामात्रव्यतिरेकीत्येवंरूपो हि सामान्यतो विपक्षपक्षः, तत्र च बाधकं तयोर्विरोधे पर्यवस्यति । अविरोधश्च क्वचित्साहित्याद् भवत्येवेति पार्थिवत्वलोहलेख्यत्वयोरपि एवम्भूतव्याप्तप्रसङ्गः । नापि द्वितीयः ; विशेषणवैयर्थ्यात् । सार्वत्रिकोऽन्वय इत्येवोच्यताम् । न च सोऽपि सङ्गत इत्युक्तम् । नापि तृतीयः ; बाधकस्य सामान्यविशेषविषयताविकल्पोक्तयुक्त्यैव निरस्तत्वात् । भी 'अग्न्यभावे सति धूमाभावः' इस अन्यथाभाव की बाधक अर्थापत्ति ( अन्यभावे धूमाभावोऽनुपपन्नः इति धूमभावेन वह्निभावः कल्प्यते ) से ही साध्य की सिद्धि हो जाने से अनुमान का व्यसन व्यर्थ है । द्वितीय कल्प में कहीं वज्रादि में व्यभिचार होने पर भी कहीं काष्ठादि में अव्यभि- चार का आश्रयणकर बाधक अर्थापत्ति चरितार्थ हो सकती है । कारण धूम का अधि- करणत्वमात्र अग्नि के अधिकरणत्वमात्र का व्यतिरेकी ( विरोधी ) है—ऐसा सामान्यतः विपक्ष है । वहाँ बाधक अर्थापत्ति 'धूमवत्तामात्रमग्निमत्तामात्रविरोधीति अनुपपन्नमिति धूमवत्तामात्रम् अग्निमत्तामात्राविरोधि' इस प्रकार उन दोनों के अविरोध में पर्यवसित होता है । अविरोध कहीं साहित्य से भी होता ही है, अतः लोहलेख्यत्व की पार्थिवत्व में व्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है । कारण 'सार्वत्रिक अन्वय व्याप्ति है' इतना मात्र कहने से ही कोई दोष नहीं होता, फिर 'विपक्षवृत्तिबाधकसहित' यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा । सार्वत्रिक अन्वय भी ग्राहक प्रमाण न होने से व्याप्ति नहीं है, यह हम पीछे कह ही चुके हैं । तृतीय पक्ष भी युक्त नहीं । कारण विपक्ष में बाधक सर्वव्यक्तिविषयक हो या यत्किञ्चिद्विषयक, इस प्रकार विकल्पकर प्रथम पक्ष के तुल्य यह पक्ष भी खण्डित हो जाता है ।