खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २६३
नापि चतुर्थः । तथा हि—यद्धूमवत् तदग्निमदित्यत्रेद मन्वयस्य सार्वत्रिकत्वं वाच्यम्--यत्सर्वासां धूमव्यक्तीनामग्निसम्बन्धित्वम्, तद्यदि व्याप्तिग्रहकाले गृहीतम्, तदा पक्षस्यापि धूमवद्व्यक्तेरग्निमत्त्वं प्राक् गृहीतं स्मर्यत एवेति गतमनुमानम् । सामान्यतोऽग्निमत्त्वं तस्यापि गृहीतमेव, विशेषतस्त्वनुमीयत इति चेन्न । विशेषत इति किमग्निमत्त्वस्य विशेषो व्यक्तिरूपो विवक्षितः, उत कालदेशादि- सम्बन्धस्तस्य ? नाद्यः ; सर्वव्यक्तीनां व्याप्तौ प्रतीतत्वेन भवतैवाङ्गीकारात् । नापि द्वितीयः ; अग्निमद्रूपतया स्मृतस्य पक्षीभूतस्य धूमवद्विशेषस्य चक्षुरादिभिरेव पर्वतत्वादि- देशकालविशेषादिमत्तया परिच्छेदात् । यथा प्राक्प्रत्ययाहितसंस्कारसचीनैश्चक्षु- रादिभिः परिच्छिद्यमानेदानोम्भावदेशविशेषावस्थानादेः स एवायमिति प्रत्यभिज्ञाय- मानताऽङ्गीक्रियते, तथैव अत्राऽप्यस्तु, कृतमनुमानेन । नाप्युपमानं बाधकं विपक्षे शक्यं वक्तुम् ; तस्य नियतविषयत्वेनैतादृशे विषयेऽनुदयात् । चतुर्थ पक्ष भी युक्त नहीं । कारण 'यत् धूमवत् तत् वह्निमत्' यहाँ अन्वय का सार्वत्रिकत्व है—सर्वधूमवत् व्यक्तियों का अग्निसम्बन्धित्व । वह यदि व्याप्तिग्रहकाल में गृहीत है, तो धूमवत् पर्वत व्यक्ति का अग्निमत्त्व पहले से ही गृहीत है, उसीका स्मरण होगा । फलतः अनुमान व्यर्थ हो जायगा । समर्थन—सामान्यतः धूमवत्पर्वत का अग्निमात्र गृहीत ही है, किन्तु विशेष रूप अग्निमत्त्व की अनुमिति तो हो ही सकती है । खंडन—अग्निमत्त्व का विशेष क्या है, क्या वह व्यक्तिरूप है या देश-कालसम्बन्धरूप ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं, कारण व्याप्ति में सभी व्यक्ति सामान्यलक्षणा से प्रतीत होते हैं, यह आप भी मानते हैं । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं, कारण 'अग्निमत् है' इस रूप से स्मृत, पक्षभूत धूमवत् व्यक्ति की चक्षुरादि से ही पर्वतादि देश तथा वर्तमानादि काल-सम्बन्धिरूप से प्रतीति होगी । जैसे पूर्वकाल में ज्ञात ज्ञान से जन्य संस्कार से युक्त चक्षुरादि से एतद्देशकालयुक्त कार्षापण आदि की 'स एव अयम्' इत्याकारक प्रत्यभिज्ञा होती है, वैसे ही अनुमितिसथल में भी है। फिर अनुमान व्यर्थ ही है । उपमान भी विपक्ष में बाधक नहीं है; कारण उपमान से केवल संज्ञासंज्ञी- भाव का ही निश्चय होता है ।