भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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२६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम नापि शब्दः ; आप्तोपदेष्टुरभावे व्याप्त्यनवगमप्रसङ्गात् । अभावस्तु कदाचित् स्यात्, सोऽपि निरूप्यमाणो न घटते । एवं स वाच्यः— यदि वह्निव्यतिरेकेण धूमः स्यात्तदा तथोपलभ्येत, न चोपलभ्यते, अतोऽनुपलम्भा- न्नास्ति तद्व्यतिरेकेणेति । तच्च न । तथा हि—क्वचिद्व्यभिचारादर्शनाद्वा अयमभावः प्रवर्तते, सर्वत्र व्यभिचारादर्शनाद्वा ? नाद्यः ; पार्थिवत्वलोहलेख्यत्वयोरपि व्याप्तत्वप्रसङ्गात् । न द्वितीयः ; सर्वत्र योग्यानुपलम्भो वाऽनुपलम्भमात्रं वा वाच्यम् ? नाद्यः ; सर्वत्र योग्यानुपलम्भासम्भवात् । नापि द्वितीयः ; पार्थिवत्वलोह- लेख्यत्वयोरपि सम्भवात् । तत्र वज्र एव व्यभिचार इति चेन्न । तदीयादर्शनदशायां व्यभिचारानवग- तात् । तद्दर्शनदशायां तावदस्ति व्यभिचारः । यत्र तु न कदाचिदपि व्यभिचार- शब्द भी विपक्षवृत्तित्व में बाधक नहीं है; कारण जहाँ आप्त-उपदेष्टा का अभाव है, वहाँ व्याप्ति का ग्रह ही नहीं होगा । विपक्ष में हेतु के वृत्तित्व का बाधक कथञ्चित् अभाव (अनुपलब्धि) हो सकता है, किन्तु विचार करने पर वह भी युक्तिसिद्ध नहीं है। देखिये—अभाव का आकार यह होता है कि 'यदि वह्नि के अभावाधिकरण में धूम होता, तो धूम का उपलम्भ (प्रत्यक्ष) होता । चूँकि उसका उपलम्भ नहीं होता, अतः वह्नि के अभाव में धूम नहीं है।' यह हो नहीं सकता, कारण यदि कहीं साध्य-व्यतिरेक हेतु के अदर्शन से यह अभाव प्रवृत्त होता हो, तो आकाशादि में लोहलेख्यत्व के अभाव में पार्थिवत्व के अदर्शन से अभाव प्रवृत्त होने से लोहलेख्यत्व का पार्थिवत्व में व्याप्तिमत् हो जायगा । यदि सर्वत्र साध्य के अभाव में हेतु के अदर्शन से अभाव-प्रमाण की प्रवृत्ति मानें, तो क्या सर्वत्र वह योग्यानुपलम्भ से प्रवृत्त होता है या अनुपलम्भमात्र से ? प्रथम कल्प युक्त नहीं है; कारण अतीत, अनागत, विप्रकृष्टादि सर्वत्र योग्यता का अभाव है । द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है, कारण लोहलेख्यत्वाभाव के अधिकरण आकाश में पार्थि- वत्व के अदर्शन से लोहलेख्यत्व की पार्थिवत्व में व्याप्ति हो जायगी । समर्थन—वज्र में लोहलेख्यत्व के व्यतिरेक में पार्थिवत्व का दर्शन है, अतः व्याप्ति नहीं है । खंडन—वज्र की अदर्शन-दशा में पार्थिवत्व में व्यभिचार न दीखने से व्याप्ति बन जायगी । समर्थन—वज्र की दर्शन-दशा में तो व्यभिचार है ही । जिस स्थल में कदापि