भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २३६ स्यादित्यविनिगम्यत्वं स्यात् । तेषु व्यवच्छेद्येषु एकद्वयादिपरिहाय व्यवच्छेद्य- हेत्वजनितत्वेनापि साक्षात्त्ववत्तत्र तत्रानुगतबुद्ध्याद्यन्तरापत्तेः । व्यवहारे सति निमित्तानुसरणम्, न तु निमित्तानुसरणेन व्यवहार इति चेन्न । निमित्तस्य अनत्यापत्तिद्वारस्यैव कल्प्यत्वात् । तत्तज्जनितत्वाभावो हि तेनैव रूपेण अनुगतव्यवहारप्रत्ययावाद्ध्यात्, न त्वन्येनापि । तथात्वे यावत्परिदृष्टव्यक्तिविशेषान्यत्वेन व्यवहारोपपत्तौ गोत्वाद्युच्छेदप्रसङ्गः । तस्मात्-- विधिजः प्रत्ययोऽन्योऽयं व्यतिरेकासमर्थनः । नैवं चेदपराधं ते किमन्यापोहवादिना ॥ ४१ ॥ कारणों से अजन्यज्ञान अनुमिति आदि हैं' ऐसे लक्षण कर सकते हैं। एवञ्च अन्योन्याश्रय हो जायगा । किञ्च—'प्रत्यक्ष और अनुमिति इन दोनों में वृत्ति, प्रत्यक्षादि त्रय में वृत्ति या चतुष्टय में वृत्ति तत्-तत् व्यवच्छेद्यों के असाधारण कारणों से अजन्यज्ञान' इस प्रकार एक लक्षण होने से प्रत्यक्षादि दो या तीन में भी अनुगत बुद्धि या व्यवहार हो जायगा । समर्थन—प्रत्यक्ष आदि दो या तीन में अनुगत व्यवहार होता ही नहीं, अतः अनुगत लक्षणरूप निमित्त की कल्पना ही नहीं होगी। कारण, व्यवहार के अनुसार ही निमित्त की कल्पना होती है, निमित्त के अनुसार व्यवहार की नहीं। खण्डन—यह ठीक है कि व्यवहार के अनुसार ही लक्षणरूप निमित्त की कल्पना होती है; किन्तु निमित्त की कल्पना भी ऐसी ही होनी चाहिए, जिसमें कोई अतिप्रसङ्ग का द्वार न हो । पूर्वोक्त दोष होने से पूर्वोक्त लक्षणरूप निमित्त ऐसा नहीं है ! किञ्च—यदि अनुमिति आदि तत्तत् व्यवच्छेद्यों के असाधारण कारणों से जन्यत्वाभाव को प्रत्यक्ष कहें, तो उक्त लक्षण उक्त जन्यत्वाभावरूप से ही अनुगत व्यवहार या अनुगत प्रतीति का निमित्त होगा, प्रत्यक्षत्वरूप से व्यवहार या प्रतीति का निमित्त नहीं होगा । यदि उक्त जन्यत्वाभावरूप से ही प्रत्यक्ष-व्यवहार या प्रतीति की उपपत्ति मानें, तो परिदृष्ट अश्वादि व्यक्ति से अन्यत्व रूप से ही गवादि-प्रतीति की भी उपपत्ति हो जायगी । फिर गोत्वादि का भी उच्छेद हो जायगा । तस्मात् 'इदं प्रत्यक्षम्' अथवा 'अयं गौः' इत्यादि विधिमुख से जायमान ज्ञान ही प्रत्यक्ष है,'यही कहना होगा । एवञ्च व्यतिरेक अर्थात् उक्त जन्यत्वाभावरूप लक्षण से उसका समर्थन नहीं हो सकता । यदि ऐसा न मानें, तो उन अपोहवादी बौद्धों का क्या अपराध है कि उनकी बात न मानी जाय ?