भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

२३८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तथापि अबाधितसाक्षात्त्वबुद्धिव्यवहारबलादन्तः पदार्थान्तरमपि साक्षात्त्व- मननुमत्य न निस्तारोऽस्ति, भ्रान्तेरप्यभ्रान्तिपूर्वकत्वादिति चेन्न । तस्यापि साक्षाद्ग्रहे क्वचिदपि तद्विवादो न स्यादित्यादिदोषसाम्यात् । अनुमानादिवेद्यत्वे च लिङ्गाद्यनुपपत्तेः, क्व च व्याप्त्यादिग्रह इत्यादिदुरुत्तरपरम्परैव स्यात् । सप्तपदार्थ- नियमसाधनानि च न कथं परिपन्थीनि स्युरिति । लिङ्गादिजत्वाभावसमुदायवती धीः साक्षादिति चेन्न । परोक्षविषयसंशयादा- वतिव्याप्तेः । ईदृशी प्रमा तथेति चेन्न । प्रत्यक्षभ्रमाव्याप्तेः । अनुमानादिन्यवच्छेद्यतत्तदसाधारणकारणाजनिता धीः साक्षादिति चेन्न । एवं हि प्रत्यक्षतत्तदपरव्यतिरिक्ता धीरनुमानादिरिति वैपरीत्यमेव कुतो न समर्थन—तब भी अबाधित साक्षात्त्वबुद्धि या व्यवहार के बल से [ साङ्कर्य होने से जाति न होने पर भी ] साक्षात्त्व को पदार्थान्तर माने बिना तो निर्वाह ही न होगा । कारण, भ्रान्ति भी प्रमापूर्वक ही होती है । खंडन—उस पदार्थान्तर साक्षात्त्व को यदि प्रत्यक्षज्ञान का विषय मानें, तो कहीं भी सन्देह न होना चाहिए, यह पूर्वोक्त दोष स्थिर ही है । किञ्च—साक्षात्त्वबुद्धि या व्यवहार अनिर्वचनीय साक्षात्त्व से भी हो सकता है । अतः कोई लिङ्ग या अनुपपत्ति भी नहीं है, जिससे साक्षात्त्व की सिद्धि हो सके । साथ ही जबतक किसी व्यक्ति में साक्षात्त्व का प्रत्यक्ष न हो, तबतक व्याप्तिग्रह भी नहीं हो सकता । एवं साक्षात्त्व को पदार्थान्तर मानने में ‘सात ही पदार्थ हैं, अष्टम नहीं’ यह आपका नियम भी बाधक है । निर्वचन—‘लिङ्गजन्त्व का अभाव, शब्दजन्यत्व का अभाव तथा सादृश्य- जन्यत्व का अभाव—इस अभावत्रितय से युक्त बुद्धि ही ‘साक्षात्-धी’ है’ ऐसा कहेंगे । खंडन—‘परमाणु जगत् के कारण हैं या प्रधान ?’ इस परोक्षविषयक सन्देह में, ‘प्रधान ही जगत् का कारण है’ इस भ्रम में तथा ‘सा मे माता’ इस स्मृति में अतिव्याप्ति हो जायगी । ‘उक्त अभावत्रयविशिष्ट प्रमा प्रत्यक्ष है’ यह नहीं कह सकते, कारण प्रत्यक्षभ्रम में अव्याप्ति हो जायगी । अप्रमा-साधारण प्रत्यक्षमात्र प्रस्तुत होने से ‘प्रत्यक्षप्रमा ही लक्ष्य है’ यह कथन भी अयुक्त है । समर्थन—‘अनुमिति, उपमिति, शाब्दबोध, परोक्ष, सन्देह, भ्रम, स्मृति आदि जो व्यवच्छेद्य हैं, उन ( व्यवच्छेद्यों ) के असाधारण कारणों से अजन्य बुद्धि प्रत्यक्ष है ।’ खण्डन—इसी तरह अनुमिति आदि के भी ‘प्रत्यक्षादि तत्तत् व्यवच्छेद्यों के असाधारण