खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] परिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डने २३५
इदन्तु स्यात् — परमाण्वादिवुद्ध्यावनुव्यवस्यमानायां परमाणुप्रतीत्यंशेऽपि साक्षात्त्वमनुभूयत इत्यत्र न नः सम्प्रतिपत्तिः । अन्यथा लिङ्गबुद्धिलक्षणया प्रत्यासत्त्या वह्निरपि मानसप्रत्यक्ष एव, न लैङ्गिक इति परेण सुवचत्वात् । एवं प्रत्यभिज्ञायां पूर्वदेशकालस्थितिमस्य पश्यामीति कस्यानुभवो यद्वलात् तथाऽभ्यु- पेयम् । तस्मात्प्रतीतिकलहोऽयम् । यदि च साक्षात्त्वं जातिरध्यक्षमानिका, तदा प्रतीतौ कस्याश्चिदध्यक्षानध्यक्ष- विवादो न स्यात् । न हि घटादिप्रत्यक्षत्वे विवदन्ते । समर्थन -- तब तो प्रत्यक्षत्व जाति हो गयी और उसे लेकर प्रत्यक्ष का लक्षण किया ही जा सकता है । खण्डन—फिर भी प्रत्यक्षत्व जाति नहीं है । कारण, परोक्षत्व के साथ प्रत्यक्षत्व का सांकर्य है, क्योकि 'द्व्यणुकं स्वपरिमाणात् अणुतरपरिमाणारब्धम्, कार्यद्रव्यत्वात्, घटवत्' इस अनुमिति के बाद होनेवाले 'परमाणुमनुमिनोमि' इस अनुव्यवसाय में अनुमित्यंश में प्रत्यक्षत्व तथा परमाण्वंश में परोक्षत्व दोनों रहते हैं । यदि कहें कि परमाणु की अनुमिति आत्मा में है और आत्मा मनःसंयुक्त है, इस प्रकार ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति होने से परमाण्वंश में भी उक्त अनुव्यवसाय प्रत्यक्ष ही है, तो कहना पड़ेगा कि हमें ऐसा अनुभव नहीं होता । फिर भी ऐसा मानें, तो वह्निसम्बद्ध धूम का ज्ञान भी आत्मा में समवेत है ही और आत्मा मनःसंयुक्त है, इस तरह ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति होने से अनुमिति भी प्रत्यक्ष हो जायगी । किञ्च —'सोऽयं देवदत्तः' इस प्रत्यभिज्ञान में भी तत्ता-अंश में स्मृतित्व तथा इदन्ता-अंश में प्रत्यक्षत्व होने से सांकर्य है । इसलिए भी प्रत्यक्षत्व जाति नहीं है । किसके इदन्ता-अंश के तुल्य तत्ताविशिष्ट अंश में अर्थात् देवदत्त के पूर्वदेशकालसम्बन्ध अंश में 'पश्यामि' इत्याकारक अनुव्यवसाय अनुभवसिद्ध है, जिसके बल पर उस अंश में भी प्रत्यभिज्ञा को आप प्रत्यक्ष मानें ? तस्मात् 'तत्ता-अंश में प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्ष है' यह बात विवादग्रस्त है । किञ्च —प्रत्यक्षत्व को प्रत्यक्षरूप प्रमिति का विषय मानें, तो किसी-किसी प्रतीति में जो विवाद होता है कि 'यह ज्ञान प्रत्यक्ष है या नहीं ?', वह न होना चाहिए । अर्थात् कोई वायुज्ञान को प्रत्यक्ष तो कोई अनुमिति मानते हैं, इसी तरह कोई अभावज्ञान को प्रत्यक्ष तो कोई अनुपलब्धिरूप प्रमाण से जन्य प्रमित्यन्तर मानते हैं—वह मतभेद न होना चाहिए । कारण, घटादि के प्रत्यक्ष में तो किसीको विवाद ही नहीं होता कि घटज्ञान प्रत्यक्ष है या अनुमिति ।