भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 610 में से

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परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २६७ अस्त्यात्ममनोयोगोऽनुगतं कारणं ज्ञानोत्पत्ताविति चेन्न । यद्यात्ममनोयोगा- दुत्पद्यमानं ज्ञानं स्यादिच्छादयोऽपि ज्ञानं प्रसज्येरन् । यदि त्वदृष्टविशेषो वा शक्तिभेदो वा ज्ञानत्वजातिर्वा ज्ञानप्राग्भावो वा तत्रानुगतं कारणमुच्यते, तदा तदितरत्रापि वह्निव्यभिचारे धूमस्यैकजात्यप्रयोजकतया शक्यत एव शङ्कितुम् । दृष्टे व्यभिचारे युक्तमदृष्टादेरैकजात्यपरिकल्पनमिति चेत् ; अस्तु दृष्टे तन्नि- श्चयः । अत्रापि व्यभिचारो न द्रक्ष्यत इत्यत्र नियामकाभावात् शङ्क्येत । एवं शङ्किष्यमाणस्य भवतो न क्वचिदनुमानं स्यात् । प्रतिवाद्यात्माद्यनुमानादि- व्यतिरेकेण कथायामेव प्रवृत्त्यनुपपत्त्या स्वयं स्वकर्त्तव्येष्वनुमानेष्वेतादृशशङ्का- क्रमणात् स एव व्याघात इति चेन्न । धूमवद्व्यक्तेरपि वह्निकारणविशेषानुमानस्यैवं सति सदनुमानत्वप्रसङ्गात् । सामग्रीसाम्येन प्रमाप्रमावैचित्र्यानुपपत्तेः । साधारणधर्मदर्शनविशेषादर्शनादौ सत्यपि शङ्कायाश्चानुदये सामग्र्यां समर्थन—ज्ञानत्व का प्रयोजक आत्ममनःसंयोगरूप अनुगत कारण है । किन्तु वह्निव्यतिरिक्त कारणजन्यत्वरूप से सम्भावित धूमसाधारण धूमत्व का प्रयोजक कोई अनुगत कारण नहीं है । खंडन —यदि आत्ममनोयोग को ज्ञानत्व का प्रयोजक मानें, तो इच्छा आदि भी ज्ञान हो जायेंगे । यदि अदृष्टविशेष, शक्तिविशेष, ज्ञानत्वजाति या ज्ञानके प्राग्भाव को ज्ञान का अनुगत कारण मानें, तो धूमस्थल में भी वह्नि के व्यभिचार में धूम के एकजात्य के प्रयोजक अदृष्टादि हैं—ऐसी शङ्का हो ही सकती है । समर्थन--व्यभिचार देखने पर अदृष्ट को ऐकजात्य का प्रयोजक मानना उचित भी होता है । किन्तु धूमस्थल में व्यभिचार तो दीखता नहीं, फिर अदृष्टादि को प्रयोजक मानना कहाँ तक उचित है ? खंडन—यह ठीक है कि व्यभिचार होने पर ही ऐक- जात्य की कल्पना युक्त है । किन्तु धूमस्थल में व्यभिचार देखा ही न जायगा, इसमें प्रमाण नहीं है, इसलिए व्यभिचार-शंका हो सकती है । समर्थन--इस तरह शङ्का करनेवाले आप कहीं भी अनुमान न कर सकेंगे । फिर जबतक प्रतिवादी की आत्मा का अनुमान न हो, तबतक कथा में प्रवृत्ति ही न होगी । और यदि अनुमान करें, तो स्वकर्तव्य अनुमान में भी ऐसी ही शङ्का होगी । अतः वही व्याघात आपके ऊपर भी हो जायगा । खण्डन—आपका क्या अभिप्राय है ? क्या जहाँ व्यभिचार की शङ्का हो, वहाँ अनुमिति में दोष नहीं, होता, यह अभिप्राय है अथवा सदोष भी अनुमान प्रमाण है, यह अभिप्राय है ? आप इनमें प्रथम पक्ष का स्वीकार नहीं कर सकते । कारण आप शङ्कितो-

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