भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 610 में से

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पृष्ठ 283

१६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम मैवम्; किमित्येवं शङ्कितव्यं यद्धेतुफलभाव एव न भविष्यति । एवं तु शङ्कितव्यम्—'अग्निं विहायान्यस्मादपि हेतोरयमुदेष्यतो'ति । न च वाच्यम्—एवं हि सति धूमस्यैकजातित्वं न स्यादिति ; क्वचिदिन्द्रिय- जन्यत्वे क्वचिदनुमानादिजन्यत्वेऽपि ज्ञानैकजात्यवत्तदुपपत्तेः । तत्रेन्द्रियादीनामवान्तरसामान्ये साक्षात्कारित्वादौ प्रयोजकत्वम् , न ज्ञान- तायामिति चेन्न । ज्ञानत्वस्याऽऽकस्मिकत्वपरिहारार्थं तत्कारणस्यानुगतस्य भवताऽवश्यं वक्तव्यत्वात् । धूमेऽपि वह्नेर्विशेष एव प्रयोजकत्वस्य तद्वच्छङ्कितुं शक्यत्वात् । न दृश्यते तावदग्निप्रयोज्यो धूमे विशेष इति च न वाच्यम् ; तद्दर्शनस्य आपाततो हेत्वन्तरप्रयोज्यावान्तरजात्यदर्शनेन अयोग्यतयाऽविकल्प्यत्वादप्यु- पपत्तेः। यदा तु हेत्वन्तरप्रयोज्यो धूमस्य विशेषो द्रक्ष्यते, तदाऽसौ विकल्पिष्यत इति सम्भावनाया दुर्वारत्वात् । खण्डन—ऐसी शङ्का ही क्यों करें कि 'धूम यदि वह्निव्यभिचारी हो, तो दोनों में कार्यकारणभाव ही नहीं होगा', जिससे व्याघात हो । किन्तु ऐसी शङ्का तो हो ही सकती है कि 'शायद अग्नि से अन्य कारण से भी धूम होता हो, तो वह वह्नि का व्यभिचारी हो सकता है।' समर्थन—यदि धूम वह्नि से अन्य और किसी कारण से भी होता, तो एकजातीय (तुल्य) नहीं होता । किन्तु वह एकजातीय है, अतः वह्नि से अन्य से जन्य नहीं है। खंडन—कहीं इन्द्रिय तो कहीं अनुमान से जन्य होने पर भी जैसे ज्ञान एकजातीय होता है, वैसे ही कहीं वह्नयतिरिक्त से जन्य होने पर भी धूम एकजातीय हो सकता है। समर्थन—ज्ञानस्थल में इन्द्रियादि अवान्तर (विशेष साक्षात्कारित्व आदि) में प्रयोजक हैं, ज्ञानत्व में नहीं। खंडन—ज्ञानत्व आकस्मिक (प्रयोजक से रहित) न हो, इसलिए उसका कोई अनुगत प्रयोजक कहना ही होगा। वैसे ही वह्नि भी धूमविशेष में ही प्रयोजक है, ऐसी शङ्का हो सकती है। समर्थन—धूम में अग्निकृत कोई विशेष देखने में नहीं आता ? खंडन—यह कथन भी युक्त नहीं है; कारण धूम में अग्निकृत विशेष का न दीखना आपाततः अन्य हेतु से प्रयोज्य जातिविशेष के अदर्शन से भी उपपन्न हो सकता है। कारण जब वह्नि से अन्य हेतुजन्य धूम का विशेष देखा जायगा, तब धूम के विशेष का ज्ञान होगा, ऐसी सम्भावना करने में कोई बाधक नहीं है ।

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