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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

१६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम मैवम्; किमित्येवं शङ्कितव्यं यद्धेतुफलभाव एव न भविष्यति । एवं तु शङ्कितव्यम्—'अग्निं विहायान्यस्मादपि हेतोरयमुदेष्यतो'ति । न च वाच्यम्—एवं हि सति धूमस्यैकजातित्वं न स्यादिति ; क्वचिदिन्द्रिय- जन्यत्वे क्वचिदनुमानादिजन्यत्वेऽपि ज्ञानैकजात्यवत्तदुपपत्तेः । तत्रेन्द्रियादीनामवान्तरसामान्ये साक्षात्कारित्वादौ प्रयोजकत्वम् , न ज्ञान- तायामिति चेन्न । ज्ञानत्वस्याऽऽकस्मिकत्वपरिहारार्थं तत्कारणस्यानुगतस्य भवताऽवश्यं वक्तव्यत्वात् । धूमेऽपि वह्नेर्विशेष एव प्रयोजकत्वस्य तद्वच्छङ्कितुं शक्यत्वात् । न दृश्यते तावदग्निप्रयोज्यो धूमे विशेष इति च न वाच्यम् ; तद्दर्शनस्य आपाततो हेत्वन्तरप्रयोज्यावान्तरजात्यदर्शनेन अयोग्यतयाऽविकल्प्यत्वादप्यु- पपत्तेः। यदा तु हेत्वन्तरप्रयोज्यो धूमस्य विशेषो द्रक्ष्यते, तदाऽसौ विकल्पिष्यत इति सम्भावनाया दुर्वारत्वात् । खण्डन—ऐसी शङ्का ही क्यों करें कि 'धूम यदि वह्निव्यभिचारी हो, तो दोनों में कार्यकारणभाव ही नहीं होगा', जिससे व्याघात हो । किन्तु ऐसी शङ्का तो हो ही सकती है कि 'शायद अग्नि से अन्य कारण से भी धूम होता हो, तो वह वह्नि का व्यभिचारी हो सकता है।' समर्थन—यदि धूम वह्नि से अन्य और किसी कारण से भी होता, तो एकजातीय (तुल्य) नहीं होता । किन्तु वह एकजातीय है, अतः वह्नि से अन्य से जन्य नहीं है। खंडन—कहीं इन्द्रिय तो कहीं अनुमान से जन्य होने पर भी जैसे ज्ञान एकजातीय होता है, वैसे ही कहीं वह्नयतिरिक्त से जन्य होने पर भी धूम एकजातीय हो सकता है। समर्थन—ज्ञानस्थल में इन्द्रियादि अवान्तर (विशेष साक्षात्कारित्व आदि) में प्रयोजक हैं, ज्ञानत्व में नहीं। खंडन—ज्ञानत्व आकस्मिक (प्रयोजक से रहित) न हो, इसलिए उसका कोई अनुगत प्रयोजक कहना ही होगा। वैसे ही वह्नि भी धूमविशेष में ही प्रयोजक है, ऐसी शङ्का हो सकती है। समर्थन—धूम में अग्निकृत कोई विशेष देखने में नहीं आता ? खंडन—यह कथन भी युक्त नहीं है; कारण धूम में अग्निकृत विशेष का न दीखना आपाततः अन्य हेतु से प्रयोज्य जातिविशेष के अदर्शन से भी उपपन्न हो सकता है। कारण जब वह्नि से अन्य हेतुजन्य धूम का विशेष देखा जायगा, तब धूम के विशेष का ज्ञान होगा, ऐसी सम्भावना करने में कोई बाधक नहीं है ।

परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २६७ अस्त्यात्ममनोयोगोऽनुगतं कारणं ज्ञानोत्पत्ताविति चेन्न । यद्यात्ममनोयोगा- दुत्पद्यमानं ज्ञानं स्यादिच्छादयोऽपि ज्ञानं प्रसज्येरन् । यदि त्वदृष्टविशेषो वा शक्तिभेदो वा ज्ञानत्वजातिर्वा ज्ञानप्राग्भावो वा तत्रानुगतं कारणमुच्यते, तदा तदितरत्रापि वह्निव्यभिचारे धूमस्यैकजात्यप्रयोजकतया शक्यत एव शङ्कितुम् । दृष्टे व्यभिचारे युक्तमदृष्टादेरैकजात्यपरिकल्पनमिति चेत् ; अस्तु दृष्टे तन्नि- श्चयः । अत्रापि व्यभिचारो न द्रक्ष्यत इत्यत्र नियामकाभावात् शङ्क्येत । एवं शङ्किष्यमाणस्य भवतो न क्वचिदनुमानं स्यात् । प्रतिवाद्यात्माद्यनुमानादि- व्यतिरेकेण कथायामेव प्रवृत्त्यनुपपत्त्या स्वयं स्वकर्त्तव्येष्वनुमानेष्वेतादृशशङ्का- क्रमणात् स एव व्याघात इति चेन्न । धूमवद्व्यक्तेरपि वह्निकारणविशेषानुमानस्यैवं सति सदनुमानत्वप्रसङ्गात् । सामग्रीसाम्येन प्रमाप्रमावैचित्र्यानुपपत्तेः । साधारणधर्मदर्शनविशेषादर्शनादौ सत्यपि शङ्कायाश्चानुदये सामग्र्यां समर्थन—ज्ञानत्व का प्रयोजक आत्ममनःसंयोगरूप अनुगत कारण है । किन्तु वह्निव्यतिरिक्त कारणजन्यत्वरूप से सम्भावित धूमसाधारण धूमत्व का प्रयोजक कोई अनुगत कारण नहीं है । खंडन —यदि आत्ममनोयोग को ज्ञानत्व का प्रयोजक मानें, तो इच्छा आदि भी ज्ञान हो जायेंगे । यदि अदृष्टविशेष, शक्तिविशेष, ज्ञानत्वजाति या ज्ञानके प्राग्भाव को ज्ञान का अनुगत कारण मानें, तो धूमस्थल में भी वह्नि के व्यभिचार में धूम के एकजात्य के प्रयोजक अदृष्टादि हैं—ऐसी शङ्का हो ही सकती है । समर्थन--व्यभिचार देखने पर अदृष्ट को ऐकजात्य का प्रयोजक मानना उचित भी होता है । किन्तु धूमस्थल में व्यभिचार तो दीखता नहीं, फिर अदृष्टादि को प्रयोजक मानना कहाँ तक उचित है ? खंडन—यह ठीक है कि व्यभिचार होने पर ही ऐक- जात्य की कल्पना युक्त है । किन्तु धूमस्थल में व्यभिचार देखा ही न जायगा, इसमें प्रमाण नहीं है, इसलिए व्यभिचार-शंका हो सकती है । समर्थन--इस तरह शङ्का करनेवाले आप कहीं भी अनुमान न कर सकेंगे । फिर जबतक प्रतिवादी की आत्मा का अनुमान न हो, तबतक कथा में प्रवृत्ति ही न होगी । और यदि अनुमान करें, तो स्वकर्तव्य अनुमान में भी ऐसी ही शङ्का होगी । अतः वही व्याघात आपके ऊपर भी हो जायगा । खण्डन—आपका क्या अभिप्राय है ? क्या जहाँ व्यभिचार की शङ्का हो, वहाँ अनुमिति में दोष नहीं, होता, यह अभिप्राय है अथवा सदोष भी अनुमान प्रमाण है, यह अभिप्राय है ? आप इनमें प्रथम पक्ष का स्वीकार नहीं कर सकते । कारण आप शङ्कितो-

२६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम

सत्यामपि कार्यानुदयात् परप्रतिपत्त्युत्पादनार्थं वचनादिरूपां प्रतिपत्तिसामग्री- मुत्पादयितुं यतमानस्य भवतोऽपि स्वक्रियाव्याघातस्तुल्यः । व्याघातस्यैव विशेषत्वात् तद्दर्शनेन शङ्कासामग्र्येव नास्ति मत्पक्षे, कुतो व्या- घातसाम्यमिति चेन्न । तद्धि न तावत् आहार्यादिकारणाज्जायमानमेष्टव्यम्, कूट- विषयस्य तस्यातिप्रसञ्जकत्वात् । कूटभिन्नः प्रसञ्जकः प्रमितस्यैव स्यादिति चेन्न । तस्य तर्कावसरे निरस्यत्वात् । तस्मात् यदैतद्व्याघातरूपस्य विशेषस्य दर्शनं शङ्काप्रतिपक्षभूतमुच्यते, तत् किं प्रमाणात् कुतश्चिदुपजायमानं वक्तव्यं तर्काद्वा ? यदि प्रथमः ; शङ्कास्तित्वमपि पाधि को दोष मानते हैं । यदि द्वितीय मानें, तो जैसे धूम से वह्नि की अनुमिति प्रमिति है, वैसे ही वह्नि से वह्नि के कारण तृणादि की अनुमिति भी प्रमिति हो जायगी । जब सामग्री समान है, अर्थात् पक्षधर्मता, व्यभिचारशङ्का आदि दोनों स्थलों में एक-से हैं, तो धूम से वह्नि की अनुमिति प्रमिति है और वह्नि से वह्नि के कारण-विशेष की अनुमिति अप्रमिति है, यह नहीं कहा जा सकता । समर्थन—व्याघात के भय से 'यदि वह्निविरहिण्यपि धूमः स्यात्' यह शङ्का ( सन्देह ) ही नहीं हो सकती । खण्डन—व्याघात के भयमात्र से यदि साधारण- धर्मदर्शन, विशेषादर्शन आदि शङ्का के कारण होने पर भी शङ्का न हो, तो पर के ज्ञान के लिए वचनादि रूप ( ज्ञान ) सामग्री के उत्पादन में आपकी प्रवृत्ति भी नहीं होनी चाहिए । समर्थन—व्याघात ही विशेष है, अतः उस व्याघात-विशेष का दर्शन होने से हमारे मत में शङ्का की सामग्री ही नहीं है । फिर व्याघात का साम्य कैसे होगा ? खंडन—वह व्याघात आहार्य ( बाधकालिक इच्छाजन्य ) अर्थात् भ्रमरूप व्याप्य के आरोपरूप कारण से जन्य ही तो इष्ट है नहीं, कारण 'यदि पार्थिवत्व लोहलेख्यत्व का व्यभिचारी होता, तो प्रमेय ही नहीं होता' इस आभासजन्य व्याघात से पार्थिवत्व की लोहलेख्यत्व में भी व्याप्ति गृहीत हो जायगी । अनाहार्य प्रमाणरूप व्याप्य के आरोप- रूप कारण से जन्य व्याघात विशेष है—इसका निरास तर्क के खण्डन के समय चतुर्थ परिच्छेद में करेंगे । किञ्च—आप जिस व्याघातरूप विशेष के दर्शन को शङ्का का विरोधी कहते हैं, क्या वह किसी प्रमाण से होता है या तर्क से ? यदि प्रमाण से कहें, तो शङ्का का

तेनैव प्रमाणेनोपनेयम्, शङ्कायां सत्यां व्याघातात् । यदि च शङ्कां विनाऽपि व्याघातः, तदा शङ्कमानांशङ्कमानयोर्व्याघातस्य साम्यं सिद्धमेव । भवतु शङ्कायामपि तत्प्रमाणम्, किमेतावता ? प्रथमोपजातशङ्कामवलम्ब्य व्यवस्थितस्य व्याघातरूपस्य विशेषस्य दर्शनात् शङ्कान्तरं नोत्पद्यत इति चेन्न । व्याघातसत्ताकाले तदवलम्ब्यया शङ्कयैव शङ्कयमानव्यभिचारता, तस्याः शङ्काया व्युपरमे च तदवलम्बिनो व्याघातरूपस्य विशेषस्याभावात् कः शङ्का- न्तरोत्पत्तेर्वारयितेति वक्तव्यम् । मा नामास्तु तदा व्याघातात्मा विशेषः; तदवगमस्तदाहितो वा संस्कारस्तावद- स्ति । विशेषावगमतत्संस्कारौ च शङ्काविरोधि नौ, न तु स्वरूपेण क्वचिदपि विशेष- स्यावस्थानं तथेति चेन्न । अयावदाश्रयभाविनो विशेषस्य पूर्वस्थितस्य यद्दर्शनं तदाहितो वा संस्कारः, तस्य कालान्तरेऽपि तत्प्रतिधर्मसंशयविरोधित्वे अवयवि- पाकपक्षे कुम्भस्य परमाणुपाकपक्षे परम्परया तदारम्भकस्य परमाणोः पूर्वं श्यामत्या ज्ञातस्य कालान्तरे सम्भावितपाकस्य पाकजन्यरूपविशेषवत्तायां संशयो न स्यात् । अस्तित्व भी उसी प्रमाण से सिद्ध हुआ, क्योंकि शङ्का होने पर ही व्याघात होगा । यदि बिना शङ्का के व्याघात हो, तो जैसे शङ्का करने पर मेरे पक्ष में आप व्याघात देते हैं, वैसे ही बिना शङ्का के आपके पक्ष में हम भी व्याघात दे सकेंगे । समर्थन — शङ्का में भी वह व्याघात ग्राहक प्रमाण रहे, इससे हानि क्या हुई ? प्रथम शङ्का के अवलम्बन से उत्पन्न व्याघातरूप विशेष-दर्शन से ही अन्य शङ्का न होगी और उसीसे व्याप्तिग्रह हो जायगा । खंडन—व्याघात के सत्ताकाल में उसकी अवलम्बभूत शङ्का से ही व्यभिचार की शङ्का है और उस शङ्का का उपरम होने पर उसके अवलम्ब से उत्पन्न व्याघात को अभाव होने से अन्य शङ्का की निवृत्ति कौन करेगा ? समर्थन —उस काल में व्याघातरूप विशेष न रहे, तो क्या हानि है ? व्याघात का ज्ञान या ज्ञान से आहित (कृत) संस्कार ही शङ्का का विरोधी है। स्वरूप से विशेष कहीं भी नहीं रहता । खंडन —यदि यावत् आश्रयकाल में न होनेवाले पूर्वस्थित विशेष के दर्शन को या विशेषदर्शन से जन्य संस्कार को कालान्तर में उत्पन्न उस विशेष के विरोधी धर्मविषयक संशय का विरोधी मानें, तो पूर्वकाल में श्यामत्वरूप से ज्ञात अवयविपाकवादी के मत में कुम्भ में तथा परमाणुपाकवादी के मत में परम्परा से घटारम्भक परमाणु में अन्य काल में पाक से सम्भावित रक्तत्वरूप का सन्देह न होगा ।

२७० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम यदि च शङ्कायां व्याघातस्तदा शङ्काश्रयस्य विशेषरूपस्य व्याघातस्य दर्शनात् शङ्कायां शङ्कान्तरं मा भूत् । यदि तु व्यभिचाराश्रयस्तदा व्यभिचारः स्यादेव, व्याघाताश्रयस्य व्यभिचारस्यापि प्रमित्यापत्तेः । अनादिसिद्धव्याप्तिकास्ते तर्का इति चेन्न। तद्बुद्धेः प्रमितित्वासिद्धेः, शरीरे स्वात्मप्रत्ययस्य तादृशस्याप्यप्रमात्वोपगमात्, अनादित्वासिद्धेश्चोभयत्राविशेषात् । नापि यद्यत्र व्यभिचारः शङ्क्येत, तदा व्याघातः स्यादित्येवंरूपात् तर्का- द्व्याघातावगमः, व्याघातप्रतिपादकस्य तर्कस्य मूलशैथिल्ये तर्काभासत्वापातात् । तादृशस्यापि व्याघातोपनायकत्वे व्याघातापत्तेश्च साम्यम् । शक्यत एव तर्का- भासाद् भवतोऽपि व्याघात उपनेतुम् । यदि शङ्का में व्याघात है, तो शङ्काश्रय व्याघातरूप विशेष के दर्शन से शङ्का में अन्य शङ्का न हो, किन्तु प्रथम शङ्का होने से व्याप्तिग्रह नहीं होगा । व्यभिचार में व्याघात दें, तो व्याघात को विषय करनेवाला प्रमा का विषय होने से व्यभिचार अवश्य होगा । समर्थन--विपक्ष में बाधक तर्क के व्याप्तिमूलक होने पर जो अनवस्था दोष देते हैं, वह ठीक नहीं । कारण जिनसे व्याप्तिग्रह होता है, उन तर्कों को हम अनादिसिद्ध व्याप्तिवाले मानते हैं । एवञ्च अनादि पुरुष-परम्परा में तद्बुद्धिधारा का अस्तित्व अनादि- सिद्ध है । अतः अनादिसिद्ध होने से युगपत् व्याप्तिग्रह की अपेक्षा नहीं है, इसलिए अनवस्था नहीं है । तथा च असञ्जात विरोधित्वेन लब्धप्रतिष्ठ होने से तर्क बलवत्तर हों, तो वे आगन्तुक व्यभिचार-शंका का सहज ही निरास कर देंगे । खण्डन--अनादिसिद्ध होने मात्र से तर्क-मूलभूता व्याप्ति प्रमित ( प्रमात्मक ज्ञान की विषय ) नहीं हो सकती, क्योंकि प्रमेय का सत्त्व प्रमाधीन ही हुआ करता है । अन्यथा अनादिसिद्ध होने से शरीर में आत्मबुद्धि भी प्रमित हो जायगी । यदि कहें कि किन्हीं विवेकयों को शरीर में आत्मबुद्धि अनादिसिद्ध नहीं है, तो तत्त्वज्ञ या मुक्तों को उक्त व्याप्तिबुद्धि भी अनादिसिद्ध नहीं है, उभयत्र अनादित्वासिद्धि तुल्य ही है । समर्थन--अत्र ( वह्नि-धूमस्थल में ) व्यभिचारः स्यात्तदा व्याघातः स्यात्' इस तर्क से ही व्याघात का ज्ञान हो जायगा । खंडन--व्याघात के प्रतिपादक उक्त तर्क का मूल शिथिल ( व्याप्तिहीन ) हो, तो यह तर्क तर्काभास हो जायगा । यदि तर्काभास से भी व्याघात का प्रतिपादन करें, तो आपके प्रति हम भी 'तर्कः आभास उपपादकश्च' ऐसा विरुद्ध-समुच्चयरूप व्याघात दे ही सकते हैं । आप भी

परिच्छेद ] व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन २७१ अथ तर्कस्य व्याप्तिर्मूलभूताऽभ्युपगम्यते । तत्रापि व्यभिचारशङ्कायां पुन- रनवस्थैव । तत्रापि व्याघातापादने पुनरुत्थितमनवस्थैव । तस्मादस्माभिरप्यस्मिन्नर्थे न खलु दुष्पठा । त्वद्गाथैवान्यथाकारमक्षराणि कियन्त्यपि ॥ ४४ ॥ व्याघातो यदि शङ्काऽस्ति न चेच्छङ्का ततस्तराम् । व्याघातावधिराशङ्का तर्कः शङ्कावधिः कुतः ॥ ४५ ॥ अव्यभिचारश्च एकपरित्यागव्यवच्छेदेनापरान्वयः, समकालदृष्टे नष्टेऽदृष्टः शङ्क्यत इत्याहुः । तर्काभास से व्याघात का परिहार करते हैं, तो हम भी व्याप्तिविहीन उक्त व्याघातरूप तर्क दे ही सकते हैं । यदि तर्क का मूल व्याप्ति को मानें, तो उस मूल व्याप्ति में भी व्यभिचार की शङ्का होने पर अन्य तर्क का आश्रयण करना होगा एवं उस तर्क की मूल व्याप्ति में व्यभिचार की शङ्का होने पर अन्य तर्क का आश्रयण—इस तरह अनवस्था-प्रसङ्ग होगा। यदि कहें कि 'अनवस्था होने पर कहीं भी अनुमान न होने से परप्रतिपत्त्यर्थ वचन में प्रवृत्तिरूप व्याघात होगा, अतः अनवस्था नहीं है', तो जिस तर्क से अनवस्था में व्याघात का आपादन आप करते हैं, उस तर्क के मूल व्याप्ति में भी व्यभिचार की शङ्का होने से पुनः अनवस्था दोष होगा । तस्मात् इस विषय में हम भी कुछ ही अक्षरों को बदलकर तुम्हारी ही गाथा को पढ़ सकते हैं कि 'यदि व्याघात प्रामाणिक है, तो शंका अवश्य है। कारण शंका होने पर ही व्याघात होता है । यदि व्याघात नहीं है, तो प्रतिबन्धक के न होने से अवश्यमेव शङ्का है । शङ्का की अवधि (अवसान) व्याघात कैसे हो सकता है और तर्क शङ्का की अवधि कैसे होगा। कारण तर्क के मूल व्याप्ति में भी शङ्का तदवस्थ ही है । समर्थन—व्यभिचार की शङ्का में अव्यभिचार भी एक कोटि है, कारण शङ्का (सन्देह) उभयकोटिक होती है । अतः किसी अधिकरण में अव्यभिचार का निश्चय होने पर अनुमिति हो जायगी ? यदि अव्यभिचार कहीं भी सिद्ध न हुआ, तो शंका ही अनुपपन्न हो जायगी । खंडन—एक (साध्य) के अभाव के अनधिकरण में हेतु का अन्वय (वृत्तित्व) रूप अव्यभिचार, समकाल में ज्ञात दृष्ट तथा नष्ट दो पदार्थों में है, वहीं शङ्का में अपर कोटि की सिद्धि हो जायगी । यदि कहें कि उसी स्थल में अनुमिति हो जायगी, तो वह युक्त नहीं । कारण ऐसा स्थल कहीं दृष्ट नहीं है ।

२७२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम स्वाभाविकः सम्बन्धो व्याप्तिरित्यपरः । स प्रष्टव्यः—कस्य स्वाभाविकः, किं सम्बन्धिनो उत अन्यस्य ? न चरमः ; वैपरीत्यापत्तेः । आद्ये कः स्वाभाविकशब्दार्थ इति प्रष्टव्यम्—किं सम्बन्धिस्वभावाश्रितः, अथ सम्बन्धिस्वभावजन्यः , अथ सम्बन्धित्वविवक्षितस्वभावानतिरिक्तः, अथ सम्बन्धि- स्वभावव्याप्यः , अथवा सम्बन्धिस्वभावादन्येन न प्रयुक्तः , उतान्य एव कश्चिद्विवक्षितः ? आद्ये पार्थिवत्वलोहलेख्यतयोरपि व्याप्तित्वप्रसङ्गः । न द्वितीयः ; अतिव्याप्तेरव्याप्तेश्च । अत एव न तृतीयः । नापि चतुर्थः; व्याप्त्यनिरुक्त्या व्याप्यत्वानिरुक्तेः । सम्बन्धस्य व्याप्यत्वे च अन्य आचार्य कहते हैं कि स्वाभाविक सम्बन्ध व्याप्ति है । उनसे पूछना चाहिए कि किसका स्वाभाविक सम्बन्ध व्याप्ति है, संवन्धियों का या अन्य का ? यदि अन्य का कहें, तो जैसे असम्बन्धियों का सम्बन्ध व्याप्ति है, वैसे ही सम्बन्धियों का असम्बन्ध भी व्याप्ति हो जायगा । यदि सम्बन्धियों का स्वाभाविक सम्बन्ध व्याप्ति है, तो कहिये कि 'स्वाभाविक' शब्द का अर्थ क्या है ? जैसे वह्नि के स्वभाव ( स्वरूप ) के आश्रित औष्ण्य वह्नि का स्वाभाविक है, वैसे ही सम्बन्धी के स्वभाव (स्वरूप) का आश्रित सम्बन्ध व्याप्ति है, अथवा जैसे वसन्त से जन्य होने से वृक्षप्रसव वसन्त का स्वाभाविक है, वैसे ही सम्ब- न्धी स्वभाव ( स्वरूप ) से जन्य सम्बन्ध व्याप्ति है, किंवा सम्बन्धित्वरूप से विवक्षित सम्बन्धी के स्वभाव से अनतिरिक्त अर्थात् स्वभावस्वरूप सम्बन्ध ही व्याप्ति है अथवा सम्बन्धी के स्वभाव से व्याप्य सम्बन्ध व्याप्ति है या सम्बन्धी के स्वभाव ( स्वरूप ) से अन्य से प्रयुक्त ( जन्य ) न हो, ऐसा सम्बन्ध व्याप्ति है अथवा और ही कुछ वस्तु व्याप्ति है ? प्रथम पक्ष में पार्थिवत्व में लोहलेख्यत्व का सम्बन्ध व्याप्ति हो जायगा । द्वितीय पक्ष में जन्य होने से धूम का एकाश्रय में संयोगरूप सम्बन्ध वह्नि में व्याप्ति हो जायगा तथा अजन्य होने से रूप-रस का एकाश्रयसमवायरूप सम्बन्ध व्याप्ति न कहलायेगा । तृतीय पक्ष में वह्नि का धूम में एकाश्रयसंयोगरूप सम्बन्ध व्याप्ति न होगा, कारण संयोग सम्बन्धी का स्वरूप नहीं, किन्तु अतिरिक्त है । चतुर्थ पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण जबतक व्याप्ति की निरुक्ति नहीं होती, तब- तक सम्बन्धी-स्वभाव व्याप्य-सम्बन्धरूप निरुक्त व्याप्ति की निरुक्ति नहीं हो सकती

परिच्छेद ] उपाधि-लक्षण का खण्डन २७३ सम्बन्धिनोर्व्यापकयोः सम्भावितसम्बन्धाधिकदेशकालतया एकसम्बन्धिदर्शने- ऽपरानुमानाय नियामकत्वायोगात् । नापि पञ्चमः ; 'न प्रयुक्तः' इति यदि न जनितस्तदा सम्बन्धस्याकृतकत्वपक्षे 'अन्येने'ति विशेषणवैयर्थ्यम्, अकृतकस्य सम्बन्धिस्वभावेनाऽप्यजनितत्वात् । सम्बन्धस्य कृतकत्वपक्षे स्वरूपासिद्धिरेव स्यात् । सामग्र्याः सर्वसम्भवादन्ततः कालदेशादृष्टादिभिरपि तज्जन्यत्वस्यावश्यकवक्तव्यत्वात् । नापि षष्ठः पक्षः ; तस्य निर्वक्तुमशक्यत्वात् । एवमेव विकल्प्यायं चरमविकल्पः सर्वत्रोपन्यस्य दूष्यो न्यूनत्वशङ्काभयादिति । उपाधि-लक्षण-खण्डनम् अनौपाधिकः सम्बन्धो व्याप्तिरित्यपरः । स प्रष्टव्यः—कोऽयमुपाधिर्नाम, यच्छून्यत्वमनौपाधिकत्वम् ? अर्थात् व्याप्ति के लक्षण में व्याप्ति का प्रवेश होने से आत्माश्रय दोष हो जायगा । किञ्च—यदि सम्बन्ध को व्याप्य मानेंगे, तो व्यापक सम्बन्धी अधिक देश-कालवृत्तित्व से सम्भावित है । अतः एक सम्बन्धी के दर्शन से अन्य सम्बन्धी की अनुमति नहीं होगी । पञ्चम पक्ष भी युक्त नहीं है । कारण यदि 'अन्य से प्रयुक्त नहीं है' इसका 'अन्य से जनित नहीं है' यह अर्थ करें, तो 'सम्बन्ध अकृतक (नित्य) है' इस पक्ष में 'अन्य से' यह विशेषण व्यर्थ है। कारण जो अकृतक है, वह सम्बन्धी के स्वभाव से भी अजन्य है । यदि 'सम्बन्ध कृतक है' यह पक्ष मानें, तो 'सम्बन्धी के स्वभाव से प्रयुक्त न हो' यह स्वरूप ही असिद्ध है । कारण कार्यमात्र सामग्री से जन्य होता है । अतः देश, काल, अदृष्ट आदि से वह व्याप्तिरूप सम्बन्धप्रयुक्त है, यह अवश्य मानना होगा । षष्ठ पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण उसका निर्वचन नहीं हो सकता । इस रीति से विकल्प कर इस चरम विकल्प का सर्वत्र खण्डन करना चाहिए । अन्यथा न्यूनता हो जायगी । अर्थात् यदि वादी विकल्पित पक्षों से भिन्न पक्ष का आश्रयण करे, तो विकल्प में न्यूनता हो जायगी । किन्तु यदि 'उक्त से अन्यत्व' रूप से भी विकल्प कर दें, तो वादी से अवलम्बित पक्ष का उसमें अन्तर्भाव हो जाने से न्यूनता नहीं होगी । उपाधि-लक्षण का खण्डन अन्य आचार्य कहते हैं कि उपाधिरहित सम्बन्ध व्याप्ति है । उनसे पूछना चाहिए कि वह उपाधि क्या वस्तु है, जिससे शून्य को आप व्याप्ति कहते हैं ? साथ ही ३५

२७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम उपाधिः साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकः । अयञ्च— ‘एकसाध्याविनाभावे मिथः सम्बन्धशून्ययोः । साध्याभावाविनाभावी स उपाधिर्यदत्ययः ॥ इत्यस्य व्यतिरेकमुखस्य यदत्ययः, स उपाधिरिति योज्यमानस्य पर्यवसि- तोऽर्थः । तद्धर्मभूता हि व्याप्तिर्जपाकुसुमरक्ततेव स्फटिके साधनाभिमते चकास्तीति उपाधिरसावुच्यते ।’ तदिदमाहुः— ‘व्याप्तेश्च दृश्यमानायाः कश्चिद्धर्मः प्रयोजकः । अस्मिन्सत्यमुना भाव्यमिति यत्सा निरूप्यते ॥ अन्ये परप्रयुक्तानां व्याप्तीनामुपजीवकाः । तैर्दृष्टैरपि नैवेष्टा व्यापकांशावधारणा ॥’ स चोपाधिनिश्चित इवाऽऽशङ्कितश्च, यत्रेदमुच्यते— ‘यावद्व्याव्यतिरेकित्वं शतांशेनापि शङ्क्यते । विपक्षस्य कुतस्तावद्धे तोर्गमनिकाबलम् ॥’ लोहलेख्यत्व का पार्थिवत्व में एकार्थसमवायरूप सम्बन्ध भी व्याप्ति हो जायगा, कारण समवाय सम्बन्धी का स्वरूप है । समर्थन—‘जो साध्य का व्यापक तथा साधन का अव्यापक हो, वह उपाधि है’— ऐसा लक्षण करेंगे । यह उदयनाचार्य के व्यतिरेकमुख से कथित लक्षण-वाक्य का फलितार्थ है । आचार्य के लक्षण-वाक्य का अक्षरार्थ तो यह है कि ‘साधन और उपाधित्व से अभिमत—दोनों के मध्य जिसका अभाव साध्याभाव का व्याप्य हो, वह उपाधि है । वह्नि से धूम के अनुमितिस्थल में आर्द्रेन्धनसंयोग की उपाधि संज्ञा है । जैसे स्फटिक में जपाकुसुम के रक्तत्व के भान के निमित्त जपाकुसुम को उपाधि कहते हैं, वैसे ही आर्द्रेन्धनसंयोगनिष्ठ धूम की व्याप्ति के वह्नि में भान के निमित्त आर्द्रेन्धनसंयोग को भी उपाधि कहते हैं । कहा भी है कि अन्य ( सोपाधिक ) हेतु उपाधिनिष्ठ व्याप्ति का अवलम्बन करते हैं, वे सोपाधिक हेतु पक्ष में देखे भी जायँ, तो भी व्यापक की सिद्धि नहीं होती । वह उपाधि निश्चित के तुल्य आशङ्कित भी होती है । यह भी कहा है कि ‘जब तक विपक्ष में हेतु के शतांश से भी अर्थात् उपाधि की शङ्का से भी शङ्का हो, तब तक हेतु में साध्यगमन की सामर्थ्य कैसे हो सकती है ?

परिच्छेद ] उपाधि-लक्षण का खण्डन २७५ इति चेत् ; साध्यव्यापके पक्षेतरत्वेऽपि प्रसङ्गात् । तद्व्यतिरिक्त इत्यपीति चेन्न । बाधोन्नीतस्य तस्याव्यापनात् । अन्यथा निरुपाधिसम्बन्धित्वे बाधासिद्धेः । यदाह—'बाधेन वोपाधिरुन्नीयताम्, अन्येन वेति न कश्चिद्विशेषः ।' एतदर्थमपि विशेषणीयमिति चेन्न । तथापि साधनाव्यापकत्वे सतीति तद्व्याप्त्यनवधारणे न शक्यावधारणम् । एवं साध्यव्यापक इत्यपि । अथ मन्यसे अदृष्टव्यभिचारसाध्यत्वं साध्यव्यापकत्वम् । न; वस्तुगत्या व्यभिचारिसाध्यस्यापि आपाततोऽदृष्टव्यभिचारसाध्यत्वसम्भवात् तस्याप्युपाधि- खंडन— साध्य का व्यापक तथा साधन का अव्यापक 'पक्षेतरत्व' भी उपाधि हो जायगा । 'पक्षेतरत्व उपाधि ही है' यह आप नहीं कह सकते, कारण पक्षेतरत्व- रूप उपाधि का सर्वत्र सम्भव होने से अनुमानमात्र का उच्छेद हो जायगा । समर्थन— उपाधि के लक्षण में 'पक्षेतरत्व से भिन्न हो' ऐसा निवेश करने पर पक्षेतरत्व उपाधि न कहलायेगी । खण्डन—ऐसा निवेश करने पर 'वह्निः अनुष्णः कृतक- त्वात्' इस अनुमान में वह्नीतरत्व उपाधि न कहलायेगी । 'यहाँ बाध ही दोष है, उपाधि नहीं' यह नहीं कह सकते । कारण यदि व्यभिचार न हो, तो हेतुमत् पक्ष में बाध ही अप्रमाणित सिद्ध होता है । यह भी कहा है कि बाध से अथवा व्यभिचार से उपाधि की अनुमिति होती है, इसमें कोई विशेष नहीं है । समर्थन—'उपाधि-लक्षणघटक बाधोन्नीत पक्षेतरत्व से अतिरिक्त पक्षेतरत्व-भिन्नत्व' का निवेश करने पर कोई दोष नहीं होगा । खंडन —तब भी जब तक साधन में उपाधि की व्याप्ति का ज्ञान न हो, तब तक साधन के अव्यापकत्व का ज्ञान न होने से अन्योन्याश्रय आदि दोष हो जायेंगे । इसी प्रकार साध्य में उपाधि की व्याप्ति की अज्ञानदशा में साध्यव्यापकत्व का ज्ञान भी नहीं हो सकता । समर्थन—'साध्य में जिसका व्यभिचार अदृष्ट हो, वह साध्यव्यापक है।' खण्डन— यह कथन भी युक्त नहीं, कारण वस्तुतः जिससे साध्य व्यभिचारी है, वह भी आपाततः अव्यभिचारी साध्यस्वरूप से ज्ञात हो सकता है । एवञ्च वह भी उपाधि हो जायगी । जैसे 'क्षित्यादिकं कर्तृजन्यं कार्यत्वात्' यहाँ 'रूपित्व' उपाधि हो जायगी । यदि कहें कि 'अन्य काल में भी साध्य जिससे अदृष्ट-व्यभिचार हो, वह साध्यव्यापक है',

२७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्यं [ प्रथम त्वापत्तेः । न द्रक्ष्यत इति च निरूपयितुमशक्यम् , व्याप्तिग्रहकाले च साध्यत्वा- भावेन तदव्यभिचारः कथमवधार्यः ? साध्यं व्यापकमपेक्षितमिति चेन्न । व्याप्त्यनवगमे व्यापकार्थानवगमात् । सम्भावितव्यापकभावो व्यापकोऽपेक्षित इति चेन्न । व्यापकस्यानिरुक्तौ किंरूप- तया सम्भावनाऽपि स्यात् । अथ साध्यव्यापक इत्येव भद्रम्, तदानीं साध्यत्वाभावेऽपि साधयितुमर्हत्वस्य विवक्षितत्वात् । न; कथं ह्यवगन्तव्यमिदमेव साधयितुमर्हमिदं नेति । व्यापकत्वादिति वक्तुमशक्यत्वात् । तो वह्नि से धूम के साधनस्थल में 'आर्द्रेन्धन-संयोग भी उपाधि न होगी । कारण 'आर्द्रेन्धनसंयोग में धूमरूप साध्य का व्यभिचार नहीं देखा जायगा, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । अर्थात् कालान्तरभावी व्यभिचार संप्रति ज्ञेय न होने से सुतरां उसका अभाव दुर्निरूप्य हो जायगा । किञ्च—व्याप्तिग्रहकाल में साध्यत्व ( सिद्धिकर्मत्व ) ही न होने से साध्य के साथ व्यभिचार का अभाव भी कैसे जाना जायगा ? समर्थन—साध्यत्व सिद्धिविषयत्व नहीं, किन्तु व्याप्तिंकर्तृत्व ( साध्य का व्यापकत्व ) ही है । एवञ्च उसका व्यभिचार व्याप्तिग्रह-काल में भी निरूप्य हो ही सकता है । खंडन—यह भी नहीं कह सकते, कारण जबतक व्याप्ति का ज्ञान न हो, तबतक व्यापकत्व का ज्ञान भी अशक्य है । 'जिसके व्यापकत्व की सम्भावना हो, वह व्यापक है' यह कथन भी युक्त नहीं। कारण जबतक व्यापकत्व की निरुक्ति न हो, तबतक उसकी सम्भावना भी कैसे होगी ? समर्थन—'साध्यव्यापक' ही युक्त है, कारण व्याप्तिग्रह-काल में साध्यत्व का अभाव होने पर भी साधन-योग्यता तो है ही। हम साध्यत्व सिद्धिविषयत्व नहीं, किन्तु तद्योग्यता ही मानते हैं, जो यावद्द्रव्यभावी है। खण्डन—यह कथन भी युक्त नहीं । कारण व्याप्ति के अज्ञान-काल में यह कैसे जाना जायगा कि यह साधन-योग्य है और यह साधन-योग्य नहीं है । व्यापकत्व से साध्य का निश्चय नहीं हो सकता । अर्थात् व्याप्य-व्यापकभाव धूम-वह्नि का साध्य-साधनभाव नहीं कहा जा सकता । कारण जबतक व्याप्ति का लक्षण न हो, तबतक यह व्याप्य है और यह व्यापक—यह निश्चय कैसे होगा ?

परिच्छेद ] उपाधि-लक्षण का खण्डने ३७७ न च साधनाव्यापकत्वं सर्वत्र निश्चेतुं शक्यम्, 'स श्यामो मैत्रतनयत्वा- दि'त्यत्र शाकाद्याहारपरिणतिपरम्पराया मैत्रतनयेऽभावस्य दुरधिगमत्वात् । यत्रोक्तलक्षणस्य निश्चायकं प्रमाणमस्ति तत्र निश्चितोपाधित्वम् ; अन्यत्र शङ्कितोपाधित्वम् । मैत्रतनयत्वव्याप्यशाकाद्याहारपरिणतिपरम्परया स्थातव्य- मित्यत्र नियामकाभावादिति चेन्न । मैत्रतनयत्वेनैव हेतुना तस्यापि प्रसाधने तच्छ- ङ्काया अपि छेत्तुमशक्यत्वात् । तत्रापि तत्तत्सामग्रीत्युपाधिपरम्पराभिधाने च तस्या अपि मैत्रतनयत्वेनैव प्रसाधनस्य कर्तुं शक्यत्वात् । किञ्च—इसी तरह उपाधिलक्षणघटक साधनाव्यापकत्व का भी सर्वत्र निश्चय नहीं हो सकता । कारण 'स श्यामः मैत्रतनयत्वात्' इस स्थल में शाकाद्याहार-परिणति- परम्परारूप उपाधि के अभाव का ज्ञान मैत्रतनय में हो नहीं सकता । समर्थन—जिस उपाधि के साध्यव्यापकत्व और साधनाव्यापकत्व में प्रमाण हो, वह निश्चित उपाधि है और जिस उपाधि के उक्त उभय रूपों में प्रमाण न हो, उसे हम शङ्कित उपाधि ही मानेंगे । शाकाद्याहारपरिणतिपरम्परा मैत्रतनयत्व की व्याप्य है, इसमें कोई नियामक नहीं है । अर्थात् गौर मैत्रतनय में शाकाद्याहार-परिणतिपरम्परा नहीं है, अतः यह शङ्कित उपाधि ही है । खण्डन—'मैत्रतनयः शाकाद्याहार-परिणतिपरम्परावान् मैत्रतनयत्वात्' इस प्रकार मैत्रतनयत्वरूप हेतु से ही मैत्रतनय में शाकाद्याहार-परिणतिपर- म्परारूप उपाधि की अनुमिति होने से साधनाव्यापकत्व की शंका का उच्छेद हो सकता है । समर्थन—मैत्रतनयत्व से शाकाद्याहार-परिणतिपरम्परा के साधन में शाकाद्याहार- सामग्रीसत्त्व उपाधि है। अतः उक्त अनुमिति न होने से 'स श्यामः मैत्रतनयत्वात्' इस स्थल में शाकपाकजत्व शंकित उपाधि हो सकती है। खण्डन—शाकाद्याहारसामग्री की भी मैत्रतनयत्व से ही अनुमिति होने के कारण वह साधन की अव्यापक न होने से उपाधि नहीं है। यदि शाकाद्याहारसामग्री की अनुमिति में भी शाकाद्याहारसामग्री की सामग्री को उपाधि कहें, तो मैत्रतनयत्व से शाकाद्याहारसामग्री की सामग्री का अनुमान होने से वह भी साधनाव्यापक न होने के कारण उपाधि न कहलायेगी । इसी तरह तत्सामग्री के उपाधित्व के उपन्यास में भी मैत्रतनयत्व द्वारा तत्सामग्री के अनुमान से साधनाव्यापकत्व जानना चाहिए ।

· २७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अनवस्थैवं स्यादिति चेत् । न; उपाध्युपन्यास एव कुतोऽनवस्था न स्यात् ? साध्यसामग्र्या उपाधित्वे धूमानुमानसाधारण्यात् । एवं च साध्ये सामग्र्यु- पाधित्वव्यवच्छेदार्थमपि लक्षणं विशेषणीयम् । श्यामत्वादौ साध्ये शाकाद्याहारपरिणतिपारम्पर्यादेस्तस्मिन्साध्ये श्यामत्वादे- रुपाधित्वसम्भवेन कथमुपाधिरपि साधयितुं शक्यत इति चेत् । मैवम्; प्रत्येकं द्वयोरपि मैत्रतनयत्वादिना साधने साधनाऽव्यापकत्वस्य शङ्कितुमशक्यत्वात् । अन्यथा सकर्तृकत्वे साध्येऽदृष्टजत्वं अदृष्टजत्वे च सकर्तृकत्वमुपाधिरित्युभयासिद्धिः स्यात् । एवं बुद्धिमत्पूर्वकत्वे प्रयत्नवत्पूर्वकत्वं प्रयत्नवत्पूर्वकत्वे बुद्धिमत्पूर्वकत्वम्, एवं वह्नित्वजात्याक्रान्तवत्त्वेऽपि इन्धनत्वजात्याक्रान्तत्वं तस्मिन् वह्नित्वजात्या- क्रान्तवत्त्वमुपाधिः स्यादित्यत्राऽपि विश्वमनुमानं व्याकुलं स्यात् । यदि कहें कि 'तत्सामग्री से तत्साधनाव्यापकत्व का अनुमान करेंगे, तो साधन की अनवस्था है, तो उपाधि के साधनाव्यापकत्व के साधन में उपाधि एवं उस उपाधि के साधनाव्यापकत्व के साधन में उपाधि—इस रीति से उपाधि के उपन्यास में भी अनवस्था हो जायगी । किञ्च—यदि साध्यसामग्री को भी उपाधि मानें, तो 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' यहाँ भी वह्निसामग्री उपाधि होने से अनुमितिमात्र का उच्छेद हो जायगा । अतः उपाधि के लक्षण में साध्यसामग्रीभिन्नत्व का निवेश करना होगा । एवञ्च मैत्रतनयत्व से शाकपाक- जत्व के अनुमान में 'शाकपाकसामग्री' उपाधि न हो सकने से शाकपाकजत्व साधन का व्यापक हो जायगा, तो वह उपाधि नहीं हो सकता । समर्थन—मैत्रतनयत्व से श्यामत्व के साधन में शाकपाकजत्व उपाधि है तथा शाकपाकजत्व के साधन में श्यामत्व उपाधि है । अतः उपाधि का अनुमान न हो सकने से उपाधि में साधनाव्यापकत्व युक्त ही है । खंडन—दोनों का एक काल में ही मैत्रतनयत्व से साधन होने से शाकपाकजत्व में साधन-व्यापकत्व है ही । अतः साधनाव्यापकत्व की शङ्का हो ही नहीं सकती । ऐसे स्थलों में यदि एक साध्य की सिद्धि में अन्य उपाधि दें, तो क्षिति में कार्यत्व से सकर्तृकत्व के साधन में 'अदृष्टजत्व' तथा अदृष्टजत्व के साधन में 'सकर्तृकत्व' भी उपाधि होने से दोनों की असिद्धि हो जायगी । एवं बुद्धिमत्पूर्वकत्व के के साधन में प्रयत्नपूर्वकत्व तथा प्रयत्नपूर्वकत्व के साधन में बुद्धिमत्पूर्वकत्व उपाधि होने से दोनों की असिद्धि हो जायगी । एवं वह्नित्वरूप से वह्नि की अनुमिति में इन्धनज तेज को तथा इन्धनज तेजस्वरूप से वह्नि के साधन में वह्नित्वरूप से वह्नि उपाधि होने से

परिच्छेद ] उपाधि-लक्षण का खण्डन २७६ अत एव साध्यसाधनसम्बन्धं प्रति व्यापकत्वं साध्यव्यापकत्वमिष्टमित्यपि प्रयुक्तम् । यत्राप्युपाधिर्निश्चीयते, तत्राप्यतीन्द्रियोपाधिविषये तदभावस्य साधनाव्याप्त्यर्थ- मनुमेयतायां सोपाधीक्रियमाणेेन साधनेनैव सत्प्रतिपक्षस्य कर्तुं शक्यत्वात् । तथा सति तत्र शङ्कितोपाधित्वमेव निर्व्यूढं स्थास्यतीति चेत्; एवं ब्रुवाणो नियतमजैषीः । परं मन्द ! मन्दाक्षम् , न प्रतिपक्षम् । तथा हि—स्वीकृतनिश्चितो- पाधिभावे शङ्कितोपाधित्वमापतदनुकूलं मन्यते कोऽन्यो जितलज्जात् ? न च क्वचिन्निश्चितोपाध्यनभ्युपगमे तच्छङ्का शक्या ।

किसी भी रूप से वह्नि का अनुमान न होगा । तथा च अनुमानमात्र का उच्छेद हो जायगा । 'साध्य तथा साधन के सम्बन्ध का व्यापक तथा साधन का अव्यापक उपाधि है' यह लक्षण भी युक्त नहीं । कारण व्याप्ति, साध्य और साधन के निर्वचन के बिना इस लक्षण की निरुक्ति ही नहीं हो सकती । व्याप्ति की घटक उपाधि के निर्वचनकाल में इनका निर्वचन ही नहीं हैं । किञ्च—जहाँ उपाधि निश्चित है, वहाँ भी अतीन्द्रिय ( शाकपाकजत्व ) उपाधि के विषय में साधनाव्यापकत्व की उपपत्ति के लिए पक्ष ( मैत्रतनय ) में गौरव से शाकपाकजत्वाभाव की अनुमिति होती है । अतः गौरव से शाकपाकजत्वाभाव की अनुमिति में जिस हेतु को उपाधि से युक्त बनाते हैं, उसी हेतु से पक्ष में उपाधि का अनुमान कर हम सत्प्रतिपक्ष भी दे सकते हैं । समर्थन—यदि सत्प्रतिपक्ष होने से साधनाव्यापकत्व की सिद्धि न हुई, तो वहाँ शङ्कित उपाधि ही रहे, हानि क्या है ? खण्डन—ऐसा कहकर तूने अवश्य विजय पा ली । किन्तु हे मन्द ! वह विजय मन्दाक्ष ( लज्जा ) पर, शत्रु पर नहीं । देख— निश्चितरूप से स्वीकार कर पीछे वादी द्वारा खण्डन करने पर उपाधि को शङ्कितरूप में मानना निर्लज्ज से सिवा के अन्य कौन पुरुष अनुकूल मानेगा ? किञ्च—कहीं भी निश्चय न हो, तो उपाधि का सन्देह भी नहीं हो सकता । कारण सामान्यदर्शन से कोटिद्वय का स्मरण होने पर सन्देह होता है और अनुभूत का ही स्मरण होता है । अतः उपाधि के निश्चय के बिना सन्देह ही कैसे होगा ?

यत्र प्रत्यक्षेणोपाधिनिश्चयस्तदेव तद्दर्शनस्थानं भविष्यतीति चेन्न । ऐन्द्रियकबाधे तज्जातीयस्य अतीन्द्रियस्याप्रयोजकीक्रियमाणेन हेतुनैव साधयितुं शक्यत्वात् । न च यदेकत्रैकजातीयमैन्द्रियकं तदन्यत्रैन्द्रियकबाधे हेतुबलादतीन्द्रियं न प्रसाध्येत, पाकदर्शनात् जठरानलादि । साधनाव्यापकत्वे सति साध्यव्यापक इति च न शाकाद्याहारपरिणतिपर- म्परासाध्यं व्याप्नोतीत्यव्यापकतादोषः । न हि शाकादित्वं नाम किञ्चिदेकमस्ति, यत्साध्यं व्याप्नुयात् । अस्तु वा कथमपि, तथापि श्यामत्वं न व्याप्नोति, इन्द्रनीलशिलादि- श्यामत्वस्य आहारजन्यत्वात् । शरीरश्यामत्वं साध्यम्, तच्च व्याप्नोत्येवेदमिति चेन्न । व्याप्तावुपाधेरभि- समर्थन—वह्नि से धूम के साधनस्थल में जहाँ साधनभूत वह्नि के अधिकरण अयो- गोलक में आर्द्रेन्धनसंयोग न होने से उसमें धूमरूप साध्य का व्यापकत्व तथा वह्निरूप साधन का अव्यापकत्व प्रत्यक्ष है, वहाँ निश्चित उपाधि है । खंडन—यद्यपि अयोगोलक में आर्द्रेन्धन संयोग का ऐन्द्रियक ( चाक्षुष ) बाध है; तथापि आर्द्रेन्धनजातीय अतीन्द्रिय आर्द्रेन्धनसंयोग की अनुमिति तो उसी वह्नि हेतु से हो सकती है, जिस हेतु को आप सोपाधिक बनाते हैं । जिसका एक स्थल में प्रत्यक्ष होता हो, उसका अन्य स्थल में प्रत्यक्ष-बाध होने पर भी हेतु के बल पर अतीन्द्रियत्व सिद्ध हो ही सकता है । जैसे— पाक से जाठर अग्नि । किञ्च—'साध्य की व्यापक होकर जो साधन की अव्यापक हो, वह उपाधि है' इस उपाधि-लक्षण में शाकाद्याहार-परिणतिपरम्परास्वरूप उपाधि श्यामत्वरूप साध्य की व्यापक नहीं है, अतः लक्षण में अव्याप्ति दोष है । साथ ही शाकादि एक अनुगत भी नहीं हैं, जो साध्य के व्यापक हों । किसी प्रकार शाकादि को अनुगत मान लें, तो भी वह श्यामत्व का व्यापक नहीं है, कारण इन्द्रनीलशिला का श्यामत्व आहारजन्य नहीं है । समर्थन—यहाँ यद्यपि साध्यत्व श्यामत्वरूप से है, तथापि उसका पर्यवसान पुरुषगत श्यामत्व में ही है और उसका व्यापक शाकपाकजत्व है ही । खण्डन—व्याप्ति में उपाधि होती है, अतः जिसकी जिस रूप से जिसमें व्याप्ति हो, उपाधि में उसी रूप से साध्य का व्यापकत्व तथा साधन का अव्यापकत्व होना चाहिए । प्रकृत में श्यामत्वरूप से व्याप्ति है । उसी रूप से उसे साध्य का व्यापक होना चाहिए । वह है

[परिच्छेद ] उपाधि-लक्षण का खण्डन २८१

ध्येयत्वात् । न च पुरुषश्यामत्वेन व्याप्तिः । हेतुपक्षधर्मतयैव हि साध्यं पक्षधर्मः सिद्ध्यति न व्याप्त्या, अन्यथा पुरुषपदस्य व्यवच्छेदकस्याविशेषणत्वापातात् । परम्परासम्बन्धिकज्जलादिलेपश्यामत्वव्यवच्छेदकत्वे च संयुक्तश्यामपुरुष- समवेतश्यामत्वस्य परम्परासम्बन्धिनः कथं व्यवच्छेदः स्यात् । न च साध्यसाधनसम्बन्धादृष्टव्यभिचारत्वं साध्यव्यापकत्वं मारूपसाक्षात्कृति- करणादेस्तैजसादित्वे साध्ये भूद्भूतरूपवत्त्वादेरुपाधित्वम् । साधनेनापि च विशेषणतया निवेश्येन यदि केवलसाध्यव्यापकं व्यवच्छेद्यम्, तदा तस्य व्यभिचारशङ्काधानक्षमस्याप्युपाधित्वं न स्यात् । अथ न किञ्चिद्व्यव- च्छेद्यं तदा विशेषणत्वासिद्धिरेव । न हि प्रयोजनमात्राद्विशेषणमर्थवद् भवति, नहीं, कारण मैत्रतनयत्वरूप हेतु पक्ष का धर्म है, इसीसे पक्षभूत मैत्रतनयरूप पुरुष में साध्य की सिद्धि होने से साध्यत्व का पुरुष-श्यामत्व में पर्यवसान है, व्याप्ति के बल से नहीं । अन्यथा (यदि पुरुष-श्यामत्वरूप से व्याप्ति मानें, तो) 'मैत्रतनयः पुरुषश्यामः मित्रातनयत्वात्' इत्यादि पञ्चावयव होने से साध्यदल में पुरुषीयत्व के निवेश का [ व्यव- च्छेद्य न होने से ] वैयर्थ्य हो जायगा । समर्थन--कज्जल-लेप से जात श्यामत्व की व्यावृत्ति के लिए पुरुषीयत्व का निवेश है । खंडन—यदि ऐसा हो, तो संयुक्त पुरुषनिष्ठ श्यामत्व की परम्परासम्बन्ध से व्यावृत्ति के लिए भी विशेषण देना चाहिए । समर्थन---साध्य-साधनसम्बन्ध का व्यभिचार जिसमें दृष्ट न हो, वह साध्यव्यापक है । शाकपाकजत्व श्यामत्व और मैत्रतनयत्व के सम्बन्ध का व्यापक है, अतः दोष नहीं । खंडन—ऐसा मानने पर 'चक्षुः तैजसम्, साक्षात्कृतिकरणत्वात्' इस सत्-अनुमिति में उद्भूतरूपवत्त्व उपाधि हो जायगी । कारण तैजसत्व और साक्षात्कृतिकरणत्व दोनों के सम्बन्ध का व्यापक उद्भूतरूपवत्त्व है । किञ्च—'साध्य-साधनसम्बन्ध का व्यापक' यहाँ सम्बन्ध द्वारा जो साधन का निवेश है, उससे केवल साध्यव्यापक का व्यवच्छेद होता है या नहीं ? यदि होता है, तो 'अध्वरे पश्वालम्भः अधर्मसाधनं हिंसावत्' इस स्थल में निषिद्धत्व केवल अधर्मसाधनत्वरूप साध्य का व्यापक होने से उपाधि न होगी । यदि केवल साध्यव्यापक का व्यवच्छेद नहीं होता, तो विशेषण व्यर्थ हो जायगा । कारण=केवल प्रयोजन होने से विशेषण सफल नहीं होता, किन्तु किसीका व्यवच्छेद होने से ही सफल होता है। अन्यथा जैसे 'क्षित्यङ्कु- ३६

केन्तु किञ्चिद्व्यवच्छेदादिति । अन्यथा शरीरजन्यत्वमिव अकर्तृकत्वे व्यक्त- प्रसिद्धौ पर्यवस्येदिति । किञ्च—आभासे व्यतिरेकिणि पक्षधर्महेतौ जीवच्छरीरं पृथिव्याद्यष्टद्रव्या- तिरिक्तानेकद्रव्यवत्, प्राणादिमत्त्वादित्यादौ कथमिदमुपाधिलक्षणं व्यवस्थाप्यम् । न ह्याभासे व्यतिरेक्यनुमानात्मनि यत्साध्यं तदुपाधिना व्याप्तमिष्यते, तस्य पराभिमतस्य क्वचित् सिद्ध्यापत्तेः । व्यतिरेकयोर्व्याप्तावुपाधिश्चेत्, तर्हि व्यतिरेके यद्व्याप्यं तस्य व्याप्य उपाधि- र्वश्यं मन्तव्यः । अन्यथोपाधेरन्वये साध्यान्वयापत्तिरिति उपाधिव्यतिरेकव्याप्त्य- वश्यम्भावस्य अभ्युपगम्यतया उपाधेर्यद्व्यापकं तद्व्यतिरेक उपाधिव्यतिरेक य रादिकं कर्तृजन्यं शरीराजन्यत्वात्' इस स्थल में शरीररूप विशेषण के व्यवच्छेदक न होने से व्याप्यत्वासिद्धि होती है, वैसे ही 'मैत्रतनयत्वम् , श्यामत्वव्यभिचारि, मैत्रतनय- त्वावच्छिन्नश्यामत्वव्यापक-शाकपाकजत्वव्यभिचारित्वात्' इस उपाधिव्यभिचार से साध्य- व्यभिचार के अनुमितिस्थल में भी हेतुदल में मैत्रतनयत्वरूप विशेषण के व्यवच्छेदक न होने से व्याप्यत्वासिद्धि हो जायगी । किञ्च—केवलव्यतिरेकी हेत्वाभास में जहाँ पक्ष में हेतु है, वहाँ अर्थात् 'जीवच्छरीरं पृथिव्याद्यष्टद्रव्यातिरिक्तानेकद्रव्यवत् प्राणादिमत्त्वात्' इस स्थल में इस लक्षण की व्यवस्था कैसे होगी । अर्थात् वहाँ अव्याप्ति हो जायगी । केवल व्यतिरेकी आभास में जो साध्य है, वह उपाधि ( भोगायतनत्व ) से व्याप्त नहीं है, कारण ऐसा मानने पर पराभिमत साध्य की कहीं ( पक्ष या सपक्ष में ) सिद्धि हो ही जायगी । अर्थात् यदि पक्ष से व्यतिरिक्त स्थल में साध्य में उपाधि-व्याप्यत्व कहें, तो सपक्ष प्रसिद्ध हो जाने से केवल- व्यतिरेकित्व का व्याघात हो जायगा । यदि पक्ष में मानें, तो वहाँ हेतु के रहने से फिर व्यभिचार ही नहीं दिया जा सकेगा । एवञ्च वह सत्-हेतु होने लगेगा । समर्थन—व्यतिरेकी हेत्वाभास में व्यतिरेकव्याप्ति में ही उपाधि होती है, अन्वय में नहीं । अतः उपाधि के व्याप्त होने से साध्य की कहीं सिद्धि नहीं हो सकती । खंडन—व्यतिरेकव्याप्ति भी 'यत्र यत्र पृथिव्याद्यष्टद्रव्यातिरिक्तानेकद्रव्यत्वं नास्ति, तत्र तत्र प्राणादिमत्त्वं नास्ति' यही है । उसमें पृथिव्याद्यष्टद्रव्यातिरिक्तानेक- द्रव्यत्वस्वरूप साध्य का जो अभाव है, उसका व्याप्य अभोगायतनत्वरूप उपाधि है—ऐसा अवश्य बोलना होगा । अन्यथा यदि उपाधि को साध्याभाव का व्याप्य न मानें, तो

परिच्छेद ] पक्षता-लक्षण का खण्डनं २८३ व्याप्यतया मन्तव्य इति परसाध्यापत्तिः । असमव्याप्तिकयोरन्वयव्याप्तिसाध्य- साधनभाववैपरीत्येन व्यतिरेकव्याप्तेरिति । न च दोषान्तरमेव तर्हि वाच्यमिति वाच्यम् ; हेतोः पक्षधर्मत्वस्थितौ व्याप्तिच्युत्यर्थं त्वयोपाध्युपगमध्रौव्यात् । भवतु वा या काचिद् व्याप्तिर्नाम । तत्सत्त्व एवानुमितिभावात्, तस्याश्चानु- मितेश्च व्याप्तिरेष्टव्या, ततश्चाऽऽत्माश्रयः । तद्भेदे चाऽनुगमाविनिगमौ स्यातामिति । पक्षता-लक्षण-खण्डनम् व्याप्तिपक्षधर्मते अनुमिति भावयत इति वदन्ति । कश्चायं पक्षो नाम, यद्धर्मत्वं पक्षधर्मत्वम् ? अभोगायतनत्वरूप उपाधि के अन्वय में साध्य का अन्वय हो जायगा । एवञ्च उपाधि में व्यतिरेकव्याप्ति अवश्यम्भावी होने से उपाधि-व्यापक के व्यतिरेक को उपाधि-व्यतिरेक (भोगायतनत्व) का व्याप्य अवश्य मानना होगा। अतः पराभिमत साध्य की कहीं सिद्धि हो जायगी। असमव्याप्तिक व्याप्य-व्यापकस्थल में ('जीवच्छरीरम्, अष्टद्रव्यातिरिक्तनेक- द्रव्यवत् प्राणादिमत्त्वात्' इत्यादि स्थल में) अन्वयव्याप्ति में जो साध्य-साधनभाव है, व्यतिरेकव्याप्ति में उसके विपरीत साध्य-साधनभाव होता है। व्यतिरेकी हेत्वाभास में उपाधिरूप दोष नहीं, किन्तु अन्य ही दोष है, यह तो नहीं कह सकते। कारण हेतु के पक्ष में होने पर व्याप्ति की क्षति के लिए आपको उपाधि मानना ही पड़ेगी। इस तरह उपाधि का निरूपण संभव न होने से 'निरुपाधिकः सम्बन्धो व्याप्तिः' यह जो व्याप्ति का लक्षण करते थे, वह भी असिद्ध ही है। अस्तु, व्याप्ति कुछ भी हो; किन्तु उसके होने पर ही अनुमिति होती है। अतः अनुमिति के व्याप्तिजन्य होने तथा जन्यत्व के व्याप्तिघटित होने से व्याप्ति की व्याप्ति अनुमिति में अवश्य माननी होगी। वह यदि वही व्याप्ति हो, तो आत्माश्रय है। यदि भिन्न मानें, तो उस व्याप्ति की अनुमिति में भी अन्य व्याप्ति; इस प्रकार अनवस्था, अनेक व्याप्तियाँ होने से अननुगम तथा कौन-सी व्याप्ति अनुमिति का अङ्ग है, इसमें विनिगमक का अभाव हो जायगा। पक्षता-लक्षण का खण्डन कुछ आचार्य कहते हैं कि व्याप्ति और पक्षधर्मता, दोनों अनुमिति के कारण हैं। किन्तु उस पक्षधर्मता का घटक पक्ष क्या वस्तु है ?

२८४ सानुवादे खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम

सिषाधयिषितधर्मा धर्मीति चेन्न । सिषाधयिषा हि प्रतिपिपादयिषा वा स्यात् प्रतिपित्सा वा ? आद्ये स्वार्थानुमित्यनुदयप्रसङ्गः । द्वितीये चासुरभिगन्धानुमेय- कुत्सितरसविषयस्वार्थानुमित्यनुदयप्रसङ्गः । न चानवधारितधर्मा धर्मी पक्षः । हेतुमत्तयाऽप्यनवधारणे अनुमानोदय- निदानभावासम्भवात् । अवधारणे चानवधारितधर्मत्वानुपपत्तेः । न चाऽनवधारितहेतुविषयधर्मा धर्मी पक्षः । तथाहि—केन अनवधारितधर्मा ? न तावदनुमानप्रयोक्त्रा, स्वयमज्ञाते परं प्रत्यप्रयोगात् । प्रतिवादिनेति चेन्न । प्रतिवादिविदिते ऽप्यर्थे वादितया परस्परविद्योत्कर्षापकर्षनिरूपणार्थमनुमानदर्शनात् । निर्वचन—जिस धर्मी में साध्यरूप धर्म की सिषाधयिषा हो, वह पक्ष है। खंडन— ‘सिषाधयिषा’ कथन की इच्छा है या ज्ञान की इच्छा ? यदि प्रथम पक्ष मानें, तो स्वार्था- नुमिति ही नहीं होगी । कारण स्वार्थानुमिति में पञ्चावयवात्मक प्रतिपादन की इच्छारूप पक्षता नहीं रहती और अनुमितिमात्र में पक्षधर्मता कारण है । द्वितीय पक्ष में ‘सटित- मांसं ( सड़ा मांस ) कुत्सितरसवत्, असुरभिगन्धवत्त्वात्’ यह स्वार्थानुमान नहीं कहलायेगा । कारण यहाँ प्रतिपित्सारूप पक्षता नहीं है । निर्वचन—जिस धर्मी का धर्म ज्ञात न हो, वह धर्मी पक्ष है । ‘पर्वतो वह्निमान् धूमात्’ इत्यादि स्थल में पर्वतरूप धर्मी का धर्म साध्यरूप वह्नि अज्ञात है । अतः पर्वत पक्ष हुआ । खण्डन—साध्य की तरह हेतु भी पक्ष-धर्म है । एवञ्च एतादृश पक्षता रहने पर अर्थात् हेतुमत्तया पक्ष का अवधारण न होने पर हेतुमत्तावगाहि परामर्श नहीं हो सकता, जो कि अनुमिति की उत्पत्ति का निदान या कारण है। यदि हेतुमत्तया अवधारण हो, तो उक्त परामर्श हो सकने पर भी उक्त पक्षता नहीं बनती । उभयथा अनुमिति न हो सकने से उक्त लक्षण असम्भवग्रस्त हो जायगा । समर्थन—‘हेतु का विषय ( व्यापक ) साध्यरूप धर्म जिस धर्मी में, अज्ञात हो वह पक्ष है’ ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च उपर्युक्त कोई दोष नहीं होगा । खंडन—यह लक्षण भी युक्त नहीं; कारण किससे अज्ञात कहेंगे ? यदि न्यायप्रयोक्ता द्वारा अज्ञात कहें, तो परार्थानुमान में अनुमानप्रयोक्ता द्वारा पर्वत में वह्नि ज्ञात ही होने से वह पक्ष न कहलायेगा । स्वयं बिना जाने दूसरे के लिए प्रयोग ही नहीं हो सकता । यदि प्रतिवादी द्वारा अज्ञात कहें, तो भी युक्त नहीं । कारण प्रतिवादी द्वारा साध्य के ज्ञात होने पर भी परस्पर विद्योत्कर्ष के बाधनार्थ प्रतिवादी अनुमान का प्रयोग करते ही हैं ।

परिच्छेद ] पक्षता-लक्षण का खण्डन २८५ तथा अनवधारणं यत्किञ्चिद्धेतुविषयधर्मगोचरम्, वादिप्रयोक्तव्यहेतुविषय- गोचरं वा ? न तावदाद्यः ; अग्निमत्त्वनिश्चयदशायामपि तत्तद्धेतुविषयबहुतरापर- धर्मानवधारणात् धूमं प्रति पर्वतस्य पक्षत्वप्रसङ्गात् । न द्वितीयः ; तथापि तत्र प्रसङ्गात् । तद्धेतूनामपि वादिप्रयोज्यत्वात् । असाधारणविवक्षायाश्च अननुगमात्, इतरेतराश्रयदोषारच । पक्षधर्मत्वेन हेतुत्वनिरूपणात्, व्याप्तपक्षधर्मत्वस्य हेतुत्वात्, हेतुना च पक्षनिरूपणात् । स्वार्थानुमाने च हेतोरप्रयोज्यत्वात्, पक्षाभावेनानुमानानुदयप्रसङ्गात विरुद्ध- हेतौ पक्षस्याभासत्वप्रसङ्गात् । तत्र साध्यस्य तद्धेतुविषयत्वाभावात्, हेतोरेव च साध्य- विपरीतव्याप्त्या दुष्टत्वात् । एतेन सन्दिग्धसाध्यधर्मा धर्मी पक्षः ; साध्यस्त्वञ्च स्वपरार्थानुमानसाधारण- मुत्पाद्यज्ञानत्वमिति निरस्तम् । इसी तरह यत्किञ्चित् हेतुविषय धर्म का अनवधारण अपेक्षित है या वादिप्रयोक्तव्य हेतुविषय धर्म का अनवधारण ? प्रथम पक्ष में अग्नि का निश्चय होने पर भी तत्-तत् अन्य हेतुविषय बहुत-से धर्मों का अनिश्चय होने से धूम के प्रति पर्वत पक्ष हो जायगा । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण अग्नि की निश्चय दशा में भी वादिप्रयोक्तव्य धूमरूप हेतु के विषय श्यामत्व-प्रदेशवत्त्व आदि धर्मों का अज्ञान है ही । अथवा अन्य हेतु भी कदाचित् वादी से प्रयोक्तव्य है ही । यदि कहें कि 'वादिप्रयोक्तव्य धूमरूप हेतु के विषय वह्निरूप धर्म का अनवधारण जहाँ हो, वह पक्ष है,' तो साध्य-साधनभेद से पक्ष-लक्षण का भेद होने से लक्षण में अननुगम दोष हो जायगा । किञ्च—अन्योोन्याश्रय दोष भी होगा । कारण व्याप्ति-पक्षधर्मताविशिष्ट को ही हेतु कहते हैं, अतः पक्ष से हेतु का और हेतु से पक्ष का निरूपण है । किञ्च—स्वार्थानुमान में हेतु का प्रयोग भी नहीं होता, अतः पक्ष न होने से अनुमिति नहीं होगी । किञ्च—विरुद्ध हेतु में पक्षधर्मत्व का अभाव हो जायगा; कारण वहाँ साध्य हेतु का विषय ( व्यापक) नहीं होता, किन्तु साध्यभाव से व्याप्य होने से ही हेतु दुष्ट होता है । 'जहां साध्य का सन्देह हो, वह पक्ष है' और साध्य वही है, जो स्वार्थ-परार्थ अनुमिति-साधारण जायमान ज्ञान का विषय हो'—ऐसा कुछ लोग कहते थे । किन्तु