भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] पक्षता-लक्षण का खण्डनं २८३ व्याप्यतया मन्तव्य इति परसाध्यापत्तिः । असमव्याप्तिकयोरन्वयव्याप्तिसाध्य- साधनभाववैपरीत्येन व्यतिरेकव्याप्तेरिति । न च दोषान्तरमेव तर्हि वाच्यमिति वाच्यम् ; हेतोः पक्षधर्मत्वस्थितौ व्याप्तिच्युत्यर्थं त्वयोपाध्युपगमध्रौव्यात् । भवतु वा या काचिद् व्याप्तिर्नाम । तत्सत्त्व एवानुमितिभावात्, तस्याश्चानु- मितेश्च व्याप्तिरेष्टव्या, ततश्चाऽऽत्माश्रयः । तद्भेदे चाऽनुगमाविनिगमौ स्यातामिति । पक्षता-लक्षण-खण्डनम् व्याप्तिपक्षधर्मते अनुमिति भावयत इति वदन्ति । कश्चायं पक्षो नाम, यद्धर्मत्वं पक्षधर्मत्वम् ? अभोगायतनत्वरूप उपाधि के अन्वय में साध्य का अन्वय हो जायगा । एवञ्च उपाधि में व्यतिरेकव्याप्ति अवश्यम्भावी होने से उपाधि-व्यापक के व्यतिरेक को उपाधि-व्यतिरेक (भोगायतनत्व) का व्याप्य अवश्य मानना होगा। अतः पराभिमत साध्य की कहीं सिद्धि हो जायगी। असमव्याप्तिक व्याप्य-व्यापकस्थल में ('जीवच्छरीरम्, अष्टद्रव्यातिरिक्तनेक- द्रव्यवत् प्राणादिमत्त्वात्' इत्यादि स्थल में) अन्वयव्याप्ति में जो साध्य-साधनभाव है, व्यतिरेकव्याप्ति में उसके विपरीत साध्य-साधनभाव होता है। व्यतिरेकी हेत्वाभास में उपाधिरूप दोष नहीं, किन्तु अन्य ही दोष है, यह तो नहीं कह सकते। कारण हेतु के पक्ष में होने पर व्याप्ति की क्षति के लिए आपको उपाधि मानना ही पड़ेगी। इस तरह उपाधि का निरूपण संभव न होने से 'निरुपाधिकः सम्बन्धो व्याप्तिः' यह जो व्याप्ति का लक्षण करते थे, वह भी असिद्ध ही है। अस्तु, व्याप्ति कुछ भी हो; किन्तु उसके होने पर ही अनुमिति होती है। अतः अनुमिति के व्याप्तिजन्य होने तथा जन्यत्व के व्याप्तिघटित होने से व्याप्ति की व्याप्ति अनुमिति में अवश्य माननी होगी। वह यदि वही व्याप्ति हो, तो आत्माश्रय है। यदि भिन्न मानें, तो उस व्याप्ति की अनुमिति में भी अन्य व्याप्ति; इस प्रकार अनवस्था, अनेक व्याप्तियाँ होने से अननुगम तथा कौन-सी व्याप्ति अनुमिति का अङ्ग है, इसमें विनिगमक का अभाव हो जायगा। पक्षता-लक्षण का खण्डन कुछ आचार्य कहते हैं कि व्याप्ति और पक्षधर्मता, दोनों अनुमिति के कारण हैं। किन्तु उस पक्षधर्मता का घटक पक्ष क्या वस्तु है ?